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जीवन साथी की दुकान….!

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– कुमार रजनीश||

चौकिये मत! यह कोई वयस्कों की समस्याओं का समाधान या इलाज़ करने वाली क्लिनिक या दुकान का नाम नहीं है.

मैं भी जब यह पहली बार उस रिक्शेवाले भैया से इसके बारे में सुना था तो चौक गया था. दरअसल बात यह है कि कल शाम जब मैं ऑफिस से घर लौट रहा था तो मौसम का रूख बहुत सुहाना हो रखा था यानि की बारिश जम कर हो रही थी. मैं जैसे ही सेक्टर-१४, द्वारका मेट्रो स्टेशन, से बाहर निकला, बारिश अपने चरम सीमा पर थी. घर पहुँचते-पहुँचते शायद मैं भींग जाता इसलिए मैंने रिक्शा लेना ठीक समझा. रिक्शेवाले ने हमारे अपार्टमेन्ट तक का किराये बताये बगैर ही मुझे बैठा लिया. जैसे ही हम थोड़ी दूर पहुंचे, मैंने उससे पूछा कि ‘इरोस मेट्रो मॉल’ में ये कौन-सी दुकान खुल गयी है? उसने बड़े ही सरलता से जवाब दिया “सर ये जीवन-साथी की दुकान है”. इससे पहले की मैं कुछ समझता या पूछता, उसने फिर कहा “इसके साथ का जोगाड़ – एम् डी भी खुल रहा है”. रिक्शेवाले भैया कि दोनों बातों को समझने में मैं असमर्थ था, इसलिए उत्सुकतापूर्वक पूछा कि यह ‘जीवन-साथी’ और एम् डी क्या हैं? उसने ह

हँसते हुए अपने रिक्शे की कर्कश घंटी को बजाते हुए बोला ” जीवन-साथी का मतलब – शराब और बियर”. यही एक ऐसी दुकान है जहाँ लोग घंटो लाईन में लगकर दारु (शराब) खरीदते हैं और इसमें ईमानदारी भी १००% है, क्योंकि पूरे पैसे लिए जाते हैं और कोई उधारी नहीं चलता. भगवान् के मंदिर में भी ‘वी. आई. पी. और ऑर्डिनरी’ लाईन होती हैं परन्तु यहाँ इस ‘दरबार’ में सब बराबर. जीवन को अंतिम समय तक ले जाने वाला एवं जीवन के अंतिम समय तक साथ देने वाला एक मात्र साथी यही है. मैं उस रिक्शेवाले भैया की बात सुनते हुए उस मॉल की तरफ भी देखता जा रहा था. मुझे मैक डोनाल्ड की एक बड़ी-सी होर्डिंग दिखी, जिसपे लिखा था – “मैक डोनाल्ड- आई ऍम लविंग इट! कमिंग सून”. मैं अब समझ चूका था की उस एम् डी का मतलब मैक डोनाल्ड से था.अपने आप को और खासकर अपने चमचमाते जूते को बारिश से बचाते हुए, रिक्शे में समेटने की कोशिश कर रहा था. मन कुछ और जानने को इच्छुक था सो मैंने उस रिक्शेवाले भैया से पूछा कि पहले तो आप अपना नाम बताओ और कहाँ के रहने वाले हो यह भी बताओ. मुंह में गुटखा दबाये, बड़े ही अपनेपन में कहा कि “जी हमर नाम सिया राम जी है और घर, बेगुसराय, बिहार परेगा” ( अपने बिहार के एक्सेंट पर मुझे गर्व होता है – उसकी अपनी मिठास है).आज से दिल्ली में गुटखा बंद हो चूका है. उसने अपने एक साथी रिक्शेवाले से एक पुडिया ‘शिखर’ की ली, फाड़ी और पूरा गुटखा मुंह के अन्दर डाल लिया. उसने बिना पूछे फिर बताया की वह सुबह ८:०० बजे से दोपहर २:०० बजे तक सेक्टर-१४ डिस्पेंसरी में काम करता है और फिर दोपहर से रात तक रिक्शा चलाता है. उसका सपना है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर एक बड़ी डॉक्टर बने और गरीब लोगों का मुफ्त इलाज करे. “सर.. बहुत मेहनत करना पड़ता है ना.. इसलिए कभी-कभार इ सब ख़राब चीज (गुटखा) खा लेते हैं…थोडा ताकत मिलता है रिक्शा चलाने में”. कुछ और बातें हो पाती, इससे पहले ही मैं अपने अपार्टमेन्ट के गेट के पास पहुँच चुका था. मैंने उस रिक्शेवाले को १५ रुपये दिए और कहा कि सिया राम जी आपसे बात कर बहुत अच्छा लगा और भगवान् से प्रार्थना करूँगा कि आपकी बेटी बड़ी होकर एक प्रसिद्ध डॉक्टर बने, जरूरतमंदो की इलाज करे और आपकी मेहनत रंग लाये. एक मुस्कान छोड़ते हुए कहा की ये गुटखा खाना बंद कर दो….खराब चीज है, इससे कोई ताकत-वाकत नहीं मिलती .

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