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पत्रकारिता – मिशन या कमीशन…?

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-अब्दुल रशीद ||
“पत्रकार के कलम की स्याही और खून में जब तलक पाक़ीज़गी रहती है तब तलक पत्रकार कि लेखनी दमकती है और चेहरा चमकता है. न तो उसकी निगाह किसी से
सच पूछने पर झुकती है और न ही उसकी कलम सच लिखने से चूकती है. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है के मौजूदा दौर बाजारवाद के हाथों कि कठपुतली है और पूरा नियंत्रण बाजारवाद के पास है. जिसका काम है खरीद-फरोख्त यानी वह हर चीज कि कीमत तय कर बाजार में ला खड़ा कर देता है,जहां आपकी कामयाबी का पैमाना अर्थ होता है. ऐसे हालात में यह सोचना के इस बाजारवाद से पत्रकारिता अछूता है या अछूता रह जाएगा तो यह एक कल्पना मात्र हो सकता है, हकीक़त नहीं.

यह बाजारवाद का असर ही है की अब खबरें विज्ञापन या फिर चाटुकारिता के आधार पर बनाई जाती है. ऐसी खबरें न तो आम जनता के बदतर हालात को दिखाती है, न ही राजनीति के स्याह चेहरे को उजागर करती है और न ही ब्यूरोक्रेट बाबूओं के समाज द्वारा अघोषित लूट के सम्राज्य को बे नकाब करती है. यह सब तो महज एक ऐसा मौका परस्त तंत्र के रुप में स्थापित होता जा रहा है, जो जब तक काली करतूत पर पर्दा पड़ा है तब तक चाटुकारिता की जय और जब सब कुछ बेनकाब हो जाए तब एक्सक्लूसिव कह कर खबरों को ऐसे पेश करते है जैसे मानो यह सब खोजी पत्रकारिता का कमाल है.

दरअसल पत्रकारों का ज़मीर नहीं मरा है बल्कि कार्पोरेट मीडिया द्वारा पत्रकार की जगह ऐसे रंगरूटों को ज्यादा महत्व दिया जाना शुरू कर दिया गया है जो विज्ञापन लाने में महारत रखते हों भले ही दो शब्द लिखना उनके बस में न हो. ऐसे रंगरूटों की अब फौज सी बन गयी है इन रंगरुटों को बस चाहिए प्रेस का कार्ड. फिर क्या, गाड़ी पर प्रेस लिखकर चल पड़ते हैं विज्ञापन के नाम पर रंगदारी वसूलने. जब विज्ञापन के नाम पर रंगदारी वसूला जाएगा तब आम जनता से जुड़े मुद्दों पर खबर लिखना और काले कारनामों से पर्दा उठाना क्या मुमकिन होगा? नहीं,ऐसा सोंचना ही कल्पना मात्र होगा. अब जरा सोचिए आज पत्रकारिता क्या मिशन के वास्तविक रुप में कायम है या फिर मिशन अब कमीशन बन गया है?

यह तो भला हो न्यू मीडिया और कुछ प्रिंट मीडिया का जिनके सहारे पत्रकारिता अब भी हिचकी ले रहा है वर्ना पत्रकारिता कब का अपना अस्तित्व खो चुका होता. कम से कम इन दोनों साधन पर अब तक बाजारवाद पूरी तरह से हावी नहीं हो सका है. क्योंकि जो छप  गया सो छप गया वह अमिट होता है वैसे खबर चलते चलते विज्ञापन आ जाना और फिर खबर का गायब हो जाने की व्यवस्था के विषय में कुछ लिखने की कोई जरुरत नहीं. हकीक़त से हर कोई वाक़िफ़ है. बीते कुछ सालों में खबरों के साथ किस हद तक खिलवाड़ किया गया के न्यायालय को भी कहना पड़ा कि मीडिया अपनी लक्ष्मण रेखा तय करे यानी कुछ तो ऐसा हो रहा है मीडिया जगत में जो गलत है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मर्यादाहीन नहीं हो सकती और मर्यादित अभिव्यक्ति कभी विवादास्पद नहीं हो सकती भले ही वह कड़वे सच के साथ व्यक्त क्यों न किया जाए. महज सनसनीखेज़ खबर के सहारे व्यापार करना पत्रकारिता के मूलरूप से भटकाव को ही दर्शाता है जो बेहद चिंताजनक बात है. पत्रकारिता जगत में आंशिक भटकाव भी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं क्योंकि जब दरबान ही लुटेरों से मिल जाए या लापरवाह होकर सो जाए तो घर को लुटने से भला कौन रोक सकता है.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “पत्रकारिता – मिशन या कमीशन…?

  1. लिखा तो सही है लेकिन क्या लेखक कभी विज्ञापन नहीं लाये हैं……. हम दूसरों की खबर तो प्रमुखता पर छापते हैं पर कभी अपने ऊपर स्टोरी लिखी है अब मिशन से बच्चे नहीं पलते…… वेतन के नाम पर अच्छे और मेहनती पत्रकारों को क्या मिल रहा है कभी आवाज बुलंद की है…नहीं न….. शिर्फ़ चाटुकारों को मनचाहा वेतन मिलता है मिशन वाले पत्रकारों की तो नौकरी भी खतरे मैं पड़ी रहती है ………

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