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नवनिर्माण की नई इबारत की तैयारी..!

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इंजीनियर दिवस पर विशेष

-अब इंजीनियरिंग में बेटियों की उंची उड़ान

बाड़मेर। एक जमाना हुआ करता था जब राजस्थान के दूसरे इलाकों की तरह रेतीले थार में बेटियों को चुल्हे चौके की जद तक ही सीमित रखा जाता था। लेकिन बदले वक्त और बदली बयार में थार की बेटियों ने अपने कदम घर की चौखट से बढाकर हर उस क्षेत्र में रख दिए है जिससे बरसों से पुरुषों के दबदबे का कहा जाता रहा है। चाहे वह प्रशासनिक सेवा हो, राजनीति हो या फिर शनिवार 15 सितंबर को मुल्क पूरा जिस दिवस को मनाने जा रहा है वह इंजीनीयरिंग का कार्य क्षेत्र हो। बेटियों ने देरी से ही सही इस क्षेत्र में अपने कदम रख कर यह साबित कर दिया है कि वह भी किसी से कम नहीं है।

अपनी पढ़ाई की शुरूआत से ही गणित में महारथ हासिल कर अपने सहपाठियों में सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण कैरियर को चुनने वाली स्नेहा राजपुरोहित आज राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड 132 केवी में कनिष्ठ अभियंता पद पर कार्यरत है। इंजीनियर स्नेहा जहां अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के पीछे अपने परिवार वालों की प्रेरणा को आधार मानती है वहीं बाड़मेर को विद्युत संपन्न देखने का इनका सपना है और इस सपने में वह इंजीनियर बनकर सहभागी बन पाई है उन्हें इस बात की खुशी है।

जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के राजस्व वितरण शाखा में कार्यरत इंजीनियर आरती परिहार का मानना है कि बालक-बालिका एक समान की बात को अगर कोई परिजन हर वक्त अपने जेहन में रखे तो बेटियां यह साबित कर सकती है वह किसी से कम नहीं है। अपने विभाग के कार्य में हर वक्त अपना सर्वश्रेष्ठ देने का मानस रखने वाली आरती आने वाले कल को बेटियों का वक्त बताती है।

जोधपुर डिस्कॉम में कनिष्ठ अभियंता पद पर कार्यरत तृप्ति शर्मा अपने पिता के सपने को साकार करने के लिए इंजीनियरिंग के पैसे में आई और आज वह अपनी बहनों के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। तृप्ति बताती है कि अगर कोई बेटी किसी क्षेत्र को अपना कर्म क्षेत्र बनाना चाहे तो बस सच्चे मन से की गई मेहनत और परिजनों का दिया गया हौंसला यकिनन उसे सफल बना देता है।

वहीं जोधपुर डिस्कॉम में ही कार्यरत इंजीनियर प्रगति इस बात को स्वीकारती है कि बीता हुआ वक्त बेटियों पर पाबंदियों का वक्त था, लेकिन आज का समय आजादी का एहसास करवाने वाला है। बेटियों ने जहां हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है वहीं बरसों तक अछुता रहा इंजीनियरिंग का क्षेत्र भी अब बेटियों की सफलता की कहानी कहता है। प्रगति बताती है कि आज का युग मेहनत का युग है और मेहनत करने वाला हर कोई सफल हो सकता है।

बरसों पहले इंजीनियर डे के आधार मोक्षगुंडम विश्वेश्वरइया ने जिस सपने को देखा था वह सपना आज इन बेटियों के होसले को देखकर यकीन सार्थक होता नजर आ रहा है। इन बेटियों के आज के काम की बानगी देखकर मन ही मन इस बात का अहसास होता है कि आने वाला कल इनका ही होगा।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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