कार्टून कला व्यंग होती है, विद्रोह नहीं….

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-प्रणय विक्रम सिंह||

मीडिया दरबार पर इन कार्टून्स को प्रसारित करने के पीछे हमारा उद्देश्य इन राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करना नहीं है बल्कि आपको यह बताना है कि इन्ही कार्टूनों के कारण असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार होना पड़ा.

लोकतंत्र में अपनी बात कहने की सभी को आजादी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राष्ट्र के नागरिकों के मौलिक अधिकारों में शुमार होती हैं। कलाकार, फनकार, चित्रकार आदि जैसी रचनात्मक शैलियों के अनुसरणकर्ता ज्यादा मुखर होकर इस अधिकार का उपयोग करते हैं। वह अपनी कला के माध्यम से जनता को अपने द्वारा समझे गए सत्य से साक्षात्कार कराने की कोशिश करते हैं। दीगर है, उसे सार्वभौमिक व शाश्वत मानने की विवशता नहीं होती है।
यह कलाकार का अपना रचना कौशल होता है कि वह अपनी सुंदर रचना के द्वारा पाठकों और श्रोताओं के मनोमस्तिष्क में अपने भावों को संचारित कर लेता है। जनमानस उसका अनुगमन करने लगती है। उसके संकेतकों से प्रेरणा प्राप्त कर सवाल पूछने लगती है। यहीं से सत्ता पक्ष का स्याह चेहरा तिलमिलाने लगता है क्योंकि सत्ता को सवाल विद्रोह का प्रतिरूप ही नजर आता है। कानपुर के नौजवान कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी भी इसी भावना का परिणाम है। असीम त्रिवेदी का गुनाह यह था कि उसने संसद को माध्यम बनाकर अपने विचारों को कार्टून की विधा में जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया था।

मीडिया दरबार पर इन कार्टून्स को प्रसारित करने के पीछे हमारा उद्देश्य इन राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करना नहीं है बल्कि आपको यह बताना है कि इन्ही कार्टूनों के कारण असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार होना पड़ा.

बताया गया है कि यह संसद की अवमानना है। राजद्रोह है। राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए बड़ा संकट हो सकते हैं इनके कार्टून। सवाल उठता है कि असीम त्रिवेदी ने ऐसा क्या बना दिया कि वह राष्ट्रद्रोह के दायरे में आ गया?  पहले समझना होगा कि आखिर राष्ट्रद्रोह कानून है क्या? सैडीशन लॉ यानि देशद्रोह कानून एक उपनिवेशीय कानून है जो ब्रितानी राज ने बनाया था। लेकिन भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया था। भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 में राष्ट्रद्रोह की परिभाषा दी गई है जिसमें लिखा है कि अगर कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है। हालांकि ब्रिटेन ने ये कानून अपने संविधान से हटा दिया है, लेकिन भारत के संविधान में ये विवादित कानून आज भी मौजूद है। एक ओर भारतीय संविधान में सरकार की आलोचना देशद्रोह का अपराध है। दूसरी ओर संविधान में भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी भी दी गई है। देशद्रोह के आरोप में हुई गिरफ्तारियों की मानवाधिकार कार्यकर्ता व संस्थाएं आलोचना करती रही हैं। असीम की रचना में भी सरकार की शैली पर सवाल हैं। उन पर राष्ट्रीय प्रतीकों को अपमानित करने का आरोप है।  यहां प्रश्न उठता है कि क्या असीम नें वास्तविक प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। यदि नहीं किया तो भला अपमान कैसे हो गया? दरअसल उसमें तसव्वुर किया गया है कि अगर हम आज के परिवेश में राष्ट्रीय प्रतीकों का पुनर्निर्धारण करें तो हमारे नए प्रतीकों का स्वरुप कैसा होगा? प्रतीकों का निर्धारण वास्तविकता के आधार पर होता है। यदि आप से कहा जाये कि शांति का प्रतीक फौज के धड़धड़ाते हुए टैंक है तो क्या आप मान लेंगे? वही स्थिति है हमारे प्रतीकों की, देश में कहीं भी सत्य नहीं जीत रहा, जीत रहा है भ्रष्ट तो क्या हमारे नए प्रतीक में सत्यमेव जयते की जगह भ्रष्टमेव जयते नहीं हो जाना चाहिए? दरअसल हुकूमत देशद्रोह से जुड़े कानून की आड़ में सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार करती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस कानून की कड़ी आलोचना होती रही है और इस बात पर बहस छिड़ी है कि औपनिवेशिक युग के इस कानून की भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जगह होनी भी चाहिए या नहीं।
यह बात दीगर है कि असीम एक कार्टूनिस्ट है। कार्टून चित्रकला की वह विधा है जिसमें चित्रकार व्यंग्य के माध्यम से किसी विषय पर टिप्पणी करता है। कभी-कभी बड़े ही जटिल विषयों या मुद्दों पर कार्टूनों की चित्रमयी प्रस्तुति अत्यंत सहज ढंग से पाठकों तक  अपने भाव पहुंचाने मे सफल हो जाती हैं। चूंकि कार्टून का जन्म ही व्यंग्यात्मक विधा के गर्भ से हुआ है अत: कभी-कभार कुछ समुदायों, व्यक्तियों की भावना आहत हो जाती है। जैसे हाल ही में एनसीआरटी की पाठ्य पुस्तक में अम्बेडकर पर बने कार्टून ने संसद में काफी घमासान मचाया था। दलित अस्मिता के प्रति एकाएक सभी सियासी जमाते चौकंनी हो गई थी।
यदि वस्तुस्थिति की निरपेक्ष समीक्षा की जाए तो विदित होता है कि इन सब विवादों के पीछे सत्यता कम प्रहसन अधिक होता है। सत्ता पक्ष अपनी शक्ति के अधिनायकवादी चरित्र का प्रदर्शन शासन, गोपनीयता, सुरक्षा आदि की दुहाई देकर सृजनकर्मियों को गिरफ्तार कर, उनकी रचनाओं को प्रतिबंधित कर आजादी के समय से ही करता रहा है। कभी महान फिल्मकार गुरुदत्त की कालजई कृति प्यासा के विचारोत्तेजक गीत, जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां है, को प्रतिबंधित किया गया, जबकि चोली के पीछे क्या है का सवाल पूछने वाले गीत धड़ल्ले से भारतीय संस्कृति को शर्मसार करते हुये आज भी बज रहे हैं। बहुसंख्यक समाज के देवी-देवताओं के अश्लील चित्रों को कला की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति करार देते हुये निजाम खामोश रहा और पाठ्यक्रमों में बने कार्टूनों से संसद से बबाल मचता रहा।
दरअसल सत्ता राजनीति और लोकनीति के अंतर को नहीं मान रही है। उसे सवाल उठाती हुई हर आवाज विद्रोह प्रतीत होती है। उसके दमन को वह अपना प्राथमिक कर्त्तव्य मानती है। बस उससे सियासी नफा होने चाहिए।  पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्रीय अस्मिता के बहाने अलगाववाद की आग भडकाने वाले राज ठाकरे खुले आम तकरीर करते हैं। उन पर राष्ट्रद्रोह की बात तो छोडि़ए सत्ता पक्ष की तरफ से ढंग का विरोध भी नहीं किया गया है। शायद सत्ता नफे और नुकसान के तराजू पर राष्ट्रद्रोह को तौलती है। खैर सत्ता का अधिनायकवादी रवैया लोकतंत्र के भविष्य के लिए ठीक नहीं है, भले ही सत्ता किसी की भी हो। हर लोकतंत्र का अपना एक मिजाज होता है। उसकी अपनी एक गति होती है। उसके अपने गुण होते हैं, उसकी अपनी सीमाएं होती हैं। वैचारिक असहिष्णुता और संस्थाओं की स्वायत्तता का अतिक्रमण हमारे लोकतंत्र की बुनियादी खामियां हैं जिसमें हम मर्यादाएं बना नहीं पाए। किसी भी कृत्य द्वारा मर्यादा का उल्लंघन हुआ या नहीं, उससे पहले ये देखना होगा कि मर्यादा है क्या? जहां हम किसी चीज से असहमत होते हैं, वहीं हम उस चीज पर पाबंदी लगाना चाहते हैं, चाहे कोई किताब हो या कोई नया विचार हो। इस असहिष्णुता को दूर करना हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत गहरी चुनौती है। अभिव्यक्ति की आजादी लोकतांत्रिक कार्य शैली की बुनियाद है। किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भी दायरे है। यह दायरे जब दरकते हैं तो स्वतंत्रता स्वच्छंदता में परिवर्तित होने लगती है। वह भी लोकतंत्र के भविष्य के लिए घातक है। सामाजिक जीवन में हो या संस्थागत स्वरूप में सभी के लिए मर्यादाएं निर्धारित की गई हैं। उनका निर्धारण भी स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार की भाव-भूमि के आधार पर किया गया है।
दीगर है कि स्वतंत्रता किसी भी फोरम से सम्बंधित हो वह स्वयं में ही मर्यादित होती है जैसे प्रेम सदैव ही मर्यादित होता है। मर्यादाओं का उल्लंघन होते ही स्वतंत्रता स्वछंदता में और प्रेम वासना में तब्दील हो जाता है। कलाकारों को भी इन मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। फिलवक्त मुल्क आजाद है, हम सबके लब आजाद हैं। इतिहास साक्षी है कि जब कभी हुकूमतों ने लबो और कलम पर बंदिश लगाई है, जनता ने अपनी शक्ति दिखाई है। खैर सरकार को अवाम द्वारा अभिव्यक्त किए जा रहे चेतावनी संदेश को समझने की जरूरत है कि,

वक्त तुम्हे तुम्हारा हर जुल्म लौटा देगा, वक्त के पास कहां रहमो करम होता है।

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5 thoughts on “कार्टून कला व्यंग होती है, विद्रोह नहीं….

  1. अजी, किस चक्कर में पड रहे हैं, अन्ना भक्तों को जरा भी आलोचना पसंद नहीं, आपको अभी सोनिया की नाजायज औलाद, कांग्रेस का खरीदा हुआ गुलाम करार दे दिया जाएगा

  2. कला की प्रशंशा तो होनी चाहिए मगर रास्तिमंबिन्दुयो के साथ खिलवाड़ ठीक नहीं आप अपनी बात किसी अनन्य प्रकार से भी कहासकते हो लेकिन ये भी सही है की कार्टून बनाने से रास्टीय खतरे में आजायेगा ये बात बिलकुल ही गलत है ये कानून का खुला दुरपयोग सरकार ने किया यदि कार्टून के होने से देश को खतरा है तो यंहा तो सरकार की केबेनित में पूरा जिन्दा सरीर ले कर कई कार्टून घूम रहे हे फ़िर देश किये से बचेगा मन्नू मिया को चिंता अपने कार्टूनों की करनी चाहिए अब में नाम लेकर बताना सुरु करूँ किया सब से बड़ा कार्टून और देश को खतरा भी रायाल्बिन्न्ची इटली का पास पोर्ट ले कर घूम रहा है ये देश को खतरे में दल्सकता है एस्की चिन्नता मन्नू मिया को करनी चाहिए

  3. इसका मतलब मीडिया दरबार तो सबसे बड़ा राजद्रोही है और उससे बड़ा राजद्रोही मुखपुस्तक (facebook) के सृजक और उसके प्रयोगकर्ता जो नित्य ही सरकार और उसके कारनामो की बखिया उधेडा करते है वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अतः भारत सरकार को चाहिए की इन सब पर भी राजद्रोह का मुकदमा चलाये………..

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