कृष्णा विभाजन की खुशी में बने मीनारे पाकिस्तान पर क्यों गए?

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विदेशमंत्री बताएं पाकिस्तान को लेकर देश की आशंकाओं का क्या जवाब मिला?

 पाकिस्तानी विदेशमंत्री हिना की जुबाँ पर यह सच आ ही गया कि “आतंकवाद उनके अतीत का मन्त्र था” 

 

-प्रवीण गुगनानी||

पिछले दिनों अपने भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा पाकिस्तान यात्रा से लौट आयें है. एस एम कृष्णा अनुभवी राजनेता है उन्हें यह स्वाभाविक ही पता है कि अन्य देशों की यात्राओं से कहीं बहुत अधिक रूचि, उत्सुकता, उत्कंठा और चिंता भी हमें हमारें मंत्रियों और राजनयिकों की पाकिस्तान यात्रा में रहती है. पाकिस्तान यात्रा के बाद लौटे विदेश मंत्री जी से पूरे राष्ट्र को यह आशा है कि वह सामान्य, स्वाभाविक भारतीय चिंता के विषयों को वहाँ व्यक्त करके, बोल सुनके और जवाब लेकर आयें होंगे. देश सुनना और देखना चाहता है कि वो सभी विषय जो हम भारतीयों की चिंता में व्याप्त है, वे सभी सरोकार जिनसे हमारे बहुत से धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, कुटनैतिक, राजनयिक, सैन्य और वैदेशिक मामले जुड़े हुए है उनके विषय में हमने क्या पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया. भारतीय विदेशमंत्रियों की पिछली पाकिस्तान यात्राओं की तूलना में कृष्णा की यह पाकिस्तान यात्रा अधिक संवेदनशील और नाजुक समय में हुई है और बहुत से ब्रह्म प्रश्न और यक्ष प्रश्न 26.11 से लेकर सरबजीत तक के मामलो की श्रंखला में अभी अनुत्तरित है. पाकिस्तान के सम्बन्ध में हम भारतीय कितनी छुई मुई सोच रखते है इस बात के विषय में मुझे हाल ही के वर्षों की दो घटनाएं याद आती है. इस देश की विपक्ष की राजनीति में एक लंबी, उर्जावान, यशस्वी  और विचारवान पारी निभा रहे लालकृष्ण आडवानी जब कुछ वर्षों पहले पाकिस्तान गए और उन्होंने जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना के प्रति कुछ विचार प्रकट किये थे तो इस देश भर ने उनके प्रति स्पष्ट, सख्त और मूंहटेढ़ी प्रतिक्रया व्यक्त की थी कमोबेश ऐसा ही कुछ जसवंत सिंह के साथ भी हुआ था. हम भारतीयों की पाकिस्तान के प्रति यह छुई मुई सोच अकारण, अनावश्यक नहीं है यह बताते हुए यदि मैं भूमिका छोड़ मुद्दे पर आऊं तो विदेश मंत्री कृष्णा से यह कहना चाहूंगा कि पाकिस्तान आपको लाहौर स्थित मीनार ए पाकिस्तान पर क्यों ले गया और आप वहाँ गए क्यों यह विचारणीय प्रश्न है? क्या आपको पता नहीं था कि मीनार-ए-पाकिस्तान ही वह स्थान है जहां 1940 में पृथक पाकिस्तान जैसा देशद्रोही, भारत विभाजक प्रस्ताव पारित हुआ था. एक देश का भाषण दूसरे देश में भूल से पढ़कर भद्द पिटवाने वाले हमारे विदेश मंत्री कृष्णा जी को और उनके स्टाफ को यह पता होना चाहिए था कि द्विराष्ट्र के बीजारोपण वाले इस स्थान पर उनके जाने से राष्ट्र के दो टुकड़े हो जाने की हम भारतीयों की पीड़ा बढ़ जायेगी. देशवासियों की भावनाओं का ध्यान उन्हें होना ही चाहिए था. आखिर मीनारे पाकिस्तान से विभाजन के हमारे राष्ट्रीय घाव हरे ही होते है. किंतु यह छोटी सी बात विदेश मंत्री के समझ में न आना विचित्र लगता है.

हिना रब्बानी ने बड़े ही खूबसूरत अंदाज से आशिकाना माहौल में हमारे विदेश मंत्री का स्वागत भोज इस गजल को गाये जाने के वातावरण में दिया  ”दिल में इक लहर सी उठी है अभी, कोई ताजा हवा चली है अभी, शोर बरपा है खान-ए दिल में, कोई दीवार गिरी है अभी”.पाकिस्तान की नौजवान विदेशमंत्री ने अपने भोजन में इस बात का तड़का भी मारा कि “आतंकवाद अतीत का मंत्र था, आतंकवाद भविष्य का मंत्र नहीं है”. अनजाने ही सही पर यह सच हिना रब्बानी की हसीं जुबाँ पर आ ही गया कि  आतंकवाद उनका मन्त्र था. यहाँ तक कहना तो ठीक और सच है किंतु उनका यह कहना कि वे भविष्य में इस मन्त्र को नहीं पढेगी उनके पूर्ववर्ती विदेश और प्रधानमंत्रियों के निरंतर झूठे पड़े वादों की श्रंखला की अगली कड़ी की भांति ही एक हकीकत कम फ़साना अधिक लगता है. पर प्रश्न या यक्षप्रश्न या ब्रह्म प्रश्न यह है कि हम इन आशिकाना गजलों को सुनकर मुंबई के हमलावरों पर पाकिस्तानी अदालत में चल रहे मुक़दमे में देरी और साशय लापरवाही को कैसे भूल जाएँ? हम हमारे सरबजीत और वहाँ की जेलों में कष्ट भोग रहे निर्दोष भारतीय नाविकों, सैनिकों और नागरिकों को कैसे भूल जाएँ?? कसाब और अफजल के पाकिस्तान में हुए प्रशिक्षण को कैसे भूल जाएँ??? हम यह कैसे भूल जाएँ कि अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में प्रति माह 20 से 25 हिंदु कन्याओं को जबरन चाक़ू की नोक पर मुसलमान बना दिया जाता है???? हम यह कैसे भूल जाएँ कि 1951 में 22% हिंदुओं वाला इस राष्ट्र में अब मात्र 1.7% हिंदु ही बच गए है और हम यह भी नहीं भूल सकते कि पाकिस्तान में बचे हिदुओं को जीना तो छोड़ो मरने के बाद दाह संस्कार में भी अडंगे लगाए जाते है!! हम यह भी नहीं भूल सकते है कि हमारे देश में सीरियल ब्लास्टों को करने वालों का प्रशिक्षण पाकिस्तान में ही होता है. हम, भारतीय यह भी नहीं भूल सकते हैं कि हमारे अपराधी न.1  दाऊद  इब्राहिम को पाकिस्तान ने अपने काले बुर्के में छिपा रखा है. पाकिस्तान से निरंतर पीड़ित,प्रताड़ित,परेशान होकर अपनी धन सम्पति छोड़कर पलायन करते हिंदुओं की पीड़ा को हम कैसे अनदेखा करें? भारत से अच्छे संबंधों की आशा का अभिनय कर रही हीना खार के भोज कार्यक्रम में गाई जा रही गजल के जवाब में और खूबसूरत पाकिस्तानी विदेशमंत्री रब्बानी के दोस्ती भरे बयानों के बाद मुझे वह गीत याद आता है कि “तुझे भूल जाऊं ये हक मेरा नहीं, पर तुझे याद न आऊं ये मुमकिन नहीं !!” जब पाकिस्तान यात्रा के दूसरे दिन देर रात के एक आलिशान भोज कार्यक्रम में एक प्रसिद्द गजल के बीच इन दोनों विदेश मंत्रियों ने भोजन किया तब  वहाँ भी एक गजल गाई जा रही थी जो शब्दशः भारत के पाकिस्तान के प्रति प्रश्नों की  एक प्रतीक पंक्ति बन सकती है -”हर एक बात पर कहते हो कि तू क्या है, तुम्हीं कहो के ये अंदाज-ए-गुफ्तगू क्या है.?” कहने की आवश्यकता नहीं कि पाकिस्तान का भारत के प्रति आचरण ठीक इसी प्रकार का है “कि तू क्या है”?

रब्बानी ने मुंबई के हमलों की जल्दी और निष्पक्ष जांच के आग्रह में बड़ा ही सुन्दर किंतु “चक्कू जैसा जवाब” दिया है कि “बार बार दोहराने से मामला सुलझेगा नहीं और भारत को यथार्थवादी ढंग से देखना चाहिए भावनात्मक नजरिये से नहीं”. रब्बानी के इस चक्कू उत्तर का विदेशमंत्री कृष्णा ने क्या प्रत्युत्तर दिया है यह भी हम राष्ट्र वासियों को पता होना चाहिए. आखिर पाकिस्तान की कथनी और करतूतों का स्याह काला इतिहास ही हमारें भविष्य की पाठशाला बनता है.

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praveen gugnani

म.प्र. के आदिवासी बहुल जिले बैतुल में निवास. "दैनिक मत" समाचार पत्र के प्रधान संपादक. समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन. प्रयोगधर्मी कविता लेखन में सक्रिय .
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One thought on “कृष्णा विभाजन की खुशी में बने मीनारे पाकिस्तान पर क्यों गए?

  1. विभाजन प्रस्ताव की बात आपको पता है विदेश मंत्री को नहीं,उन्होंने कब राजनीती विज्ञानं पढ़ा है,कब स्वतंत्रता संग्राम को पढ़ा है,यह पद तो अंधे के हाथ बटेर लगने वाली बात है,वहां के कार्यक्रम बनाने वाले अधिकारीयों को भी शायद इस का ज्ञान नहीं है,वैसे भी हमारे लोग इन बैटन को इतना सर पर नहीं लेते,हम तो पाकिस्तान के लिए उसे खुश करने के लिए पलक पान्वारे बिछाये बैठे हैं,आप किसी भी मुद्दे पर देख लें.
    इधर रब्बानी के आकर्षण में कृष्णासाहब कितने दुबे हें हैं इसकी झलक तो रब्बानी की पहली यात्रा पर उनसे हाथ मिलाने,और स्वागत में पसर जाने पर देखि ही थी.अब भी जब वह आतंकवाद पर जो कह रही थी,उसका उस समय उन्हें विरोध कर अपनी प्रतिकिरिया देनी थी ,पर वोह चुप रहे.
    देश की मलामत करने में हमारे नेता कभी नहीं चूकते.मनमोहन सिंह जी की मजबूरी है कि कोई और नेता कांग्रेस में है भी नहीं.

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