असीम त्रिवेदी पर देशद्रोह का आरोप, जुल्मों सितम की इंतिहा…

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अंग्रेजों द्वारा आज़ादी के दीवाने क्रांतिकारियों के दमन के लिए बनाये गए काले कानून को आज़माया जा रहा है आजाद भारत के नागरिकों पर और देश में भ्रष्ट सरकार के खिलाफ खड़े हो रहे जनसैलाब को कुचलने की रची जा रही है खतरनाक साजिश...खरपतवार की तरह तानाशाहों की बड़ी जमात पनप चुकी  है देश में, जो अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को कुचलने को तैयार बैठी है….असीम त्रिवेदी द्वारा राष्ट्रीय प्रतीक को व्यंग का विषय बनाने पर उनके खिलाफ राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान का मामला जरूर बनता है लेकिन देशद्रोह का तो कतई नहीं….

-सुग्रोवर||

भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने व्यंगचित्रों के द्वारा जनचेतना जागृत करने वाले कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर राजद्रोह की धारा 124A में मुकद्दमा दर्ज करने से केन्द्र व महाराष्ट्र सरकार खुद कटघरे में खड़ी हो गई है. असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी को लेकर देश भर में कड़ी निंदा हो रही है. कानूनविदों का कहना है कि आईपीसी की धारा 124A सिर्फ देश के खिलाफ हिंसात्मक कार्यवाहियां जैसे कि आतंकवाद, उग्रवाद और साम्प्रदायिक दंगों के लिए जनता को उकसाने पर ही उपयोग में लाया जा सकता है. गौरतलब है कि इस कानून का निर्माण अग्रेजों ने आज़ादी के लिए लड़ रहे क्रान्तिकारियों के खिलाफ उपयोग में लाने के लिए बनाया था. आज़ादी मिलने के बाद देश में कई बार इस कानून को खत्म करने की मांग उठी मगर सत्ताधीशों ने अपने स्वार्थों की खातिर इस कानून को बने रहने दिया और अब उसका दुरूपयोग किया जा रहा है.

केंद्र सरकार पिछले महीने भी राज्यसभा में इस कानून के बचाव में कई तर्क रख चुकी है. गौरतलब है कि गृह राज्यमंत्री एम रामचंद्रन ने उच्च सदन में भाकपा के डी राजा के निजी विधेयक भारतीय दंड संहिता :संशोधन: विधेयक 2011 पर हुयी चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A संवैधानिक है और इसके प्रावधान मूल अधिकारों के अनुरूप ही हैं. गृह राज्यमंत्री एम रामचंद्रन ने :आईपीसी: की धारा 124 :ए: को आतंकवाद, उग्रवाद और साम्प्रदायिकता जैसी समस्याओं से निबटने के लिए जरूरी बताते हुए आज राज्यसभा में कहा कि यह संविधानसम्मत है और उच्चतम न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में ऐसी राय व्यक्त की है.

राज्यसभा में ऐसी धाराओं के बारे में अपना पक्ष दूसरे तरीके से रखने वाली सरकार की एक राज्य इकाई इसी धारा का दुरुपयोग अन्य तरीके से व्यंग चित्रकार पर करती है. तुर्रा यह कि देश की सूचना प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी असीम त्रिवेदी और दूसरों को सलाह देती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को विषय बनाने से और व्यंग में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. ऐसा बयान देने से पहले वे यह भूल जाती हैं कि जब शाहरुख खान तिरंगे का अपमान करे या कोई नवोदित अभिनेत्री रातों रात मशहूर होने के लिए नग्न हो तिरंगा शरीर पर पोत सड़कों पर उतर आये या फिर अमीरों की किसी पार्टी में तिरंगा पहन शराब परोसती बालाएँ राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं कर रहे होते? यही नहीं विभिन्न सरकारी समारोहों में छोटी तिरंगी झंडियां इस्तेमाल होती हैं और समारोह के बाद इन्हें सड़कों पर पैरों तले रुन्दते भी देखा गया है. यहाँ तक  कि रेलवे के प्रथम श्रेणी के शौचालयों में जो टॉयलेट पेपर होता है उस पर अशोक स्तंभ छपा आज तक किसी को नज़र नहीं आया? अशोक स्तंभ छपे कागज से अब तक करोड़ों लोगों ने पोट्टी साफ की होगी और हर बार अशोक स्तंभ का अपमान हुआ. इसकी जिम्मेदारी किस पर आयद होगी?

कानूनविदों का मानना है कि असीम त्रिवेदी ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे कि उन्हें देशद्रोह जैसे मामले में फंसा दिया जाये. राजस्थान उच्च न्यायालय  के वरिष्ठ वकील पूनमचंद भंडारी कहते हैं कि “आईपीसी की धारा 124A कोई मजाक नहीं है. इसे सिर्फ देश तोडने के लिए हिंसा करने के लिए भडकाए जाने के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए.” भंडारी का मानना है कि असीम त्रिवेदी को आईपीसी की धारा 124A में गिरफ्तार करना देश में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ बन रहे जनमानस को कुचलने वाली  हरकत है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. Cong k raj me Neta n ek viseh samaj ko sab kuch karne ki ajadi hai….. any body or organisation or party against them will be crused…..vedeshi coach ne politics saas se shikha hai…. turn the pages of history at Indira's era…

  2. हमारे मुल्क में कितने ही राजनैतिक अपराध होते आये हैं, कितने ही घोटाले हो रहे है, बड़े बड़े नेता बलात्कार , हत्या जैसे जघन्य मामलों में लिप्त हैं और जांच के दायरे में फंसे हुए हैं, उन पर देशद्रोह तो छोडिये ऐसी हल्की धाराएँ लगाई जाती हैं क़ि वो आसानी से बाहर निकाल आते हैं| तब कहाँ थे ये जब हमारे ही देश में एक मशहूर चित्रकार ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचाते हुए एक नग्न तस्वीर बना दी थी| भर्ष्टाचार में डूबा लगभग पूरा तंत्र रोज़ मानवीय अधिकारों की हत्या कर रहा है, और ये देश के तारनहार कहलाते हैं| असीम त्रिवेदी को सीधे सीधे देशद्रोह में फ़साना सरासर गलत है अभिव्यक्ति के प्रथम अधिकार का निर्मम हनन है|.

  3. अगर इस धारा को अंग्रेजों ने बनाया था तो आज की सरकार भी उन्हीं अंग्रेजों की वंशज है,फरक यह है कि वे महारानी के प्रतिनिधि थे इन को चुना तो हम ने है पर राज करना इन्होने अंग्रेजों से सीखा है .वैसे भी अंग्रेजों में सत्ता के जाने का डर हर समय लगा रहता था,वे इस अपराध बोध से राज कर रहे थे किजनता के समर्थन बिना राज कर रहें हैं,देश को लूट रहें हैं .यही हालत इन बेचारों की है,घोटाले पर घोटाले कर देश को सब ने दोनों हाथो लूटा है,जनता से चुने जाने के बाद भी आज जनता उनके साथ नहीं है ,अब वे दमन चक्र चलाना चाहते हैं.
    पाकिस्तानी झंडे ले कर प्रदर्शन करना ,राष्ट्रीय ध्वज को चाय की टेबल पर बीछा कर उस पर बैठना,फ़िल्मी तारिकाओं द्वारा अपमान,नगन मोडलों द्वारा अपमान, कूड़े के ढेर में मिलते अनेकानेक ध्वज,उन पर इन अंधों की नजर नहीं जाती,तब इनका उल्लंघन उल्लंघन नहीं लगता,लेकिन जब एक जागरूक नागरिक उसका सही रास्ता दिखने हेतु उपयोग करता है,तब ऐसे कानून याद आते हैं.लगता है अब इस सरकार के दिन लद चलें हैं.

  4. ये सायद यद् हो देश के लोंगो को की टाडा न डी अ सरकार लाई थी तो केवल मुसलमानों ने ही विरोध किया था ओर्र इएसी सरकार ने मुस्लमान वोटो की खतिर देश की सुरक्छा को अनदेखा कर के टाडा वापस किया ये देश दिरोहिता है या वोट के लिए आतंकवादियों को संरक्छां आखिर टाडा बना किस लिए था कांग्रेस सरकार ने महिलायों के हितो की रक्छा के लिए सुप्रीम कोर्ट के उस [सह्वानो ककासे] के केस में अपनी नियति बता ही दी थी ये नियम कायदे कानून सब पैर की जुतिया है जब चाहे जन्हा चाहे बैसे बदल कर कम चला लेते है आम नागरिक तो ठगा ही जाता है

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