समन्दर में टापू जैसा एक गांव…

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-लखन सालवी||

‘‘एक जाति विशेष के लोग इस गांव में कोई विकास कार्य नहीं होने देना चाहते है. उनका मकसद है कि विकास के अभाव में समस्याओं से जूझते भील समुदाय के लोग कोड़ियों के दामों में अपनी जमीनें बेच कर वहां से चले जाए.’’

भीलवाड़ा जिले की आसीन्द तहसील की करजालिया ग्राम पंचायत के माधोबा का खेड़ा (भील खेड़ा) के बाशिन्दों की दशा अत्यन्त दयनीय है. सरकार की विकास योजनाओं को इस गांव में नहीं पहुंचने दिया जा रहा है.

माधोबा का खेड़ा में भील समुदाय के 40 परिवार है. गांव से सबसे बुजुर्ग 80 वर्षीय माधो बा भील बताते है कि ‘‘कोई 60 साल पहले दूलेपुरा गांव से हमारे 3 परिवार यहां आकर बसे थे. आज यहां 40 परिवार हो गए है जिनमें करीब 160 सदस्य है लेकिन सरकार ने हमारे गांव में आने-जाने के लिए ना सड़क बनवाई है, ना पीने के पानी की व्यवस्था की है और ना ही बिजली की व्यवस्था की है. हम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है.’’

कांग्रेस पार्टी के स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए इस गांव के लोगों ने बताया कि सरपंच का चुनाव हो या वार्ड पंच का, विधायक का चुनाव हो या सांसद का, 80 बरसों से हम लोग कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देते आ रहे है. इस पार्टी के उम्मीदवारों ने गांव में विकास करवाने के लिए कई वादे किए लेकिन एक भी वादा पूरा नहीं किया. बीजेपी के प्रतिनिधि चुनाव जीते, उन्होंने भी हमारी उपेक्षा ही की.

ना सड़क है, ना बिजली है, हेण्डपम्प खराब पड़ा है. गांव के 15-20 बच्चे बीमारी से ग्रस्त है, जिनका ईलाज करने वाला कोई नहीं है. यहां की गर्भवती महिलाएं ना तो आंगनबाड़ी केंद्र के बारे में जानती है ना ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को. टीकाकरण किस बला का नाम है, ये इन्हें नहीं पता.

ग्राम पंचायत में लिए प्रस्ताव, फिर भी नहीं बनी सड़क

माधोबा का खेड़ा में जाने के लिए ग्रेवल सड़क भी नहीं है. बारिस के दिनों में तालाब की पाळ पर से होकर ही जाया जा सकता है. तालाब की रपट से पानी के तेज बहाव की स्थिति में गांव से सम्पर्क बिलकुल टूट जाता है. जगदीश भील ने बताया कि ग्रेवल सड़क निर्माण करवाने के लिए ग्राम पंचायत में प्रस्ताव भी लिए गए लेकिन ग्रेवल सड़क नहीं बनाई.

गांव के मांगी लाल भील ने बताया कि समन्द के बीच एक टापू जैसा है हमारा गांव. बारिस के दिनों में हमारा गांव टापू बन जाता है.

रास्ते के अभाव में हो जाती है गर्भवती महिलाओं की मौतें

बाली बाई भील ने बताया कि 2 वर्ष पूर्व गर्भवती टमू देवी की मौत हो गई. बारिस के दिन थे, रास्ता खराब था, गांव में कोई चौपहिया वाहन नहीं आ सकता था इसलिए उसे प्रसव के लिए अस्पताल नहीं ले जाया जा सका. उसने घर पर ही मृत बच्चे को जन्म दिया, असहनीय पीड़ा के कारण टमू की भी मौत हो गई.

महिलाओं ने बताया कि गांव में सुविधाओं के नहीं होने के कारण हमें अपनी विवाहित बेटियों को प्रसव के लिए पीहर मंे लाने से भी डर लगता है. बारिस के दिनों में प्रसव पीड़ा होने पर हम गर्भवती बेटी को अस्पताल नहीं पहुंचा सकते है. ऐसे में गर्भवती बेटी के साथ कोई अनहोनी हो जाए तो हमारी बदनामी होती है.

 पीने के पानी के लाले

पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है. 4 साल पहले गांव में एक हेण्डपम्प लगाया गया था वो भी 2 साल पूर्व खराब हो गया. खराब हेण्डपम्प को सुधरवाने के लिए कई बार ग्राम पंचायत में आयोजित ग्राम सभा में अवगत कराया. सरपंच व सचिव को बार-बार कहा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.

महिलाओं ने बताया कि वे गांव से दो किलोमीटर दूर खेतों में स्थित कुंओं से पानी भर कर लाती है. कई बार रात में पानी समाप्त हो जाने पर समस्या का सामना करना पड़ता है. उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूल में एक हेण्डपंप लगा हुआ है लेकिन उसका पानी खारा होने से उपयोग में लेते है.

दीपक के उजाले में पढ़ते है बच्चे

आजादी के 65 बरस बीत गए, माधोबा का खेड़ा में रोशनी नहीं हुई है. यहां के लोग अभी भी दीपक के उजाले में रह रहे है. भारत सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युत योजना इस गांव को रोशनी नहीं दे पाई है. इस गांव के बच्चे आज भी दीपक के उजाले में पढ़ रहे है वहीं इनके परिवारजन दीपक की लौ की तरह जल रहे है.

गांव की महिलाओं ने बताया कि केरोसिन नहीं मिलता है ऐसे में हम चिमनी कैसे जलाए. तिल, मूंगफली या सोयाबीन के तेल से दीपक जलाकर उजाला करती है. उसी दीपक के उजाले में खाना बनाती है और घर का काम करती है.

शहरों में खूब विकास हुआ, लेकिन हमारे गांव में बिजली नहीं पहुंची. ये कहते हुए उदास हो जाते है जगदीश भील. वो कहते है कि ना प्रशासन ने हमारे बारे में सोचा और ना ही स्थानीय राजनीतिक लोगों ने. चुनावों के दौरान बिजली, सड़क, पानी सहित सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने के झूठे वादे ही किए.

40 परिवारों में से महज 4 परिवार ही बीपीएल में शामिल

माधोबा का खेड़ा में एक टूटा फूटा पक्का मकान दिखता है. वो भी कई बरसों पूर्व इंदिरा आवास योजना के तहत बनाया गया था. शेष सभी कवेलूपोष कच्चे मकान है. किसी भी परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं है. इस गांव के केवल 4 परिवारों को ही बीपीएल सूची में जोड़ा गया है. शेष परिवार के लोग बीपीएल श्रेणी में नाम जोड़ने की मांग कर रहे है. 40 में से 18 परिवारों के तो राशन कार्ड ही नहीं बनाए गए है.

3 माह से नहीं मिला भुगतान, 6 परिवारों के नहीं बने मकान

गरीब की सूनने वाला कोई. यह कहावत चरितार्थ होती है माधोबा का खेड़ा के मजदूरों की दास्तां सुनकर. यहां के मजदूरों ने अप्रेल व मई 2012 में 4 पखवाड़े तक काम किया. 3 माह गुजर गए लेकिन अभी तक मजदूरों को भुगतान नहीं हुआ है. मजदूरों ने बताया कि भुगतान के लिए बैंक के कई चक्कर लगाए लेकिन भुगतान नहीं हुआ.

6 परिवारों को आज तक महानरेगा के तहत काम नहीं मिला. इन परिवारों के लोगों ने बताया कि हमने कई बार ग्राम पंचायत में काम के लिए आवेदन करना चाहा लेकिन हमारे आवेदन नहीं लिए गए. ये कहते हुए आवेदन पत्र लौटा दिए कि ‘‘तुम्हारा जॉब कार्ड नहीं है.’’

गांव के अन्य मजदूरों के पास जॉब कार्ड नहीं है जबकि उन्होंने महानरेगा के तहत कार्य किया है. उन मजदूरों से जब जॉब कार्ड मांगा तो उनका जवाब चौंका देने वाला था. उन्होंने कहा कि ये क्या होता है ? हमारे पास जॉब कार्ड नहीं नहीं है, हमें ऐसा कोई कार्ड नहीं दिया गया. बैंक की पासबुकें मजदूरों के पास पाई गई. इस बारे में ग्राम सेवक ने बताया कि मजदूरों के जॉब कार्ड मेट अपने पास रख लेता है लेकिन आगे से ऐसा नहीं होगा, जॉब कार्ड मजदूरों को दिलवा दिए जाएंगे.

टूटने लगे है रिश्ते, नहीं ब्याहते बेटियां

ग्रामीणों ने बताया कि गांव में सुविधाओं को कमी को देखते हुए समाज के लोग रिश्ते करने से कतराने लगे है. गांव मंे बिजली नहीं, पानी नहीं है, आने-जाने के लिए सड़क मार्ग नहीं है. इसलिए लोग अपनी बेटियों को हमारे गांव में नहीं ब्याहना चाहते है. मांगी लाल भील ने बताया कि गांव में सुविधाओं के नहीं होने से अब तक 3 लड़कों की सगाईयां टूट गई है.

यह है मूल जड़

ग्रामीणों ने बताया कि एक जाति विशेष के लोग हमारे गांव में विकास नहीं होने दे रहे है. हमारे गांव के चारों और उनके खेती की जमीनें है. वो चाहते है कि हम अपनी जमीनें सस्ते दामों में बेचकर यहां से चले जाए.

अब जिला कलक्टर करेंगे सुनवाई

माधोबा का खेड़ा के लोगों ने 7 सितम्बर को जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर ग्रेवल सड़क का निर्माण करवाने, घरों में बिजली कनेक्शन करवाने तथा बीपीएल श्रेणी से वंचित परिवारों को बीपीएल सूची में जोड़ने की मांग की है.

जिला कलक्टर ने ग्रामीणों से कहा है कि वे माधोबा का खेड़ा की समस्याओं का समाधान करवाएंगे. अब माधो बा भील के मन में आस जगी है कि गांव के लिए सड़क बनेगी, रोशनी होगी और हेण्डपंप भी ठीक हो जाएगा.

माधोबा का खेड़ा के लोगों को मूलभूत सुविधाएं दिलवाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता देवी लाल मेघवंशी व मुकेश मेडतवाल उनके साथ खड़े है. उन्होंने बताया कि जिला कलक्टर के आदेश के बाद उपखंड अधिकारी गांव पहूंचे और वंचित परिवारों के बीपीएल के आवेदन पत्र भरवाए है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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