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फिजा की मौत किसी राजनैतिक साजिश का हिस्सा तो नहीं?

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अनुराधा बाली से फिजा बनी महत्वाकांक्षी युवती की विसरा जाँच में फिजा के पेट में चूहे मारने वाला ज़हर मिलने की खबर के साथ फिजा की मौत पर कई सवाल खड़े हो गए हैं. क्या फिजा ने खुद ज़हर खाया या फिर किसने उसे ज़हर दिया. ज़हर उसके घर में घुस कर उसके खाने में मिला दिया गया या बाहर से लाए गए खाने में पहले से ही ज़हर था? सबसे मौजूं सवाल तो यह है कि फिजा की हत्या का सीधा सीधा राजनैतिक फायदा किसे मिलेगा?

कुलदीप बिश्नोई को तो फिजा की हत्या से राजनैतिक मौत मिलती है, ऐसे में कुलदीप बिश्नोई के इस दशा में आने का सीधा सीधा लाभ कुलदीप बिश्नोई के राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को मिलेगा. यहाँ यह भी देखना होगा कि राजनैतिक मामलों में अपने पिता पर भी विश्वास ना करने वाला कुलदीप बिश्नोई इतना मुर्ख राजनेता है कि परिणाम जानते बुझते फिजा की हत्या करवा कर खुद की कब्र खोद लेगा? जो राजनैतिक समीक्षक कुलदीप बिश्नोई को जानते हैं वे आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि फिजा की मौत के पीछे कुलदीप बिश्नोई नहीं कोई और है. सूत्रों के अनुसार यह वह भी हो सकता है, जिसने स्टार न्यूज़ पर एक खबर चलवाई थी कि स्टार न्यूज़ के पास भजन लाल की कोई आपत्ति जनक सीडी है. जबकि उस सीडी में भजन लाल के खिलाफ कुछ नहीं था. इसके पीछे सिर्फ एक मकसद था कि सोनिया गांधी की नज़रों से गिरा दिया जाये और साजिश करने वाले अपने मकसद में सफल भी हो गए. वह सीडी चली भी नहीं और उस सीडी में कुछ था भी नहीं सिवाय भजन लाल के हाथ में एक शराब के गिलास के. शराब का गिलास हाथ में होना कोई इतना बड़ा अपराध नहीं होता कि पार्टी को भारी बहुमत से जितवा कर लाने वाले को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंका जाये और जिसकी कांग्रेस को जिताने में पांच प्रतिशत भूमिका भी ना हो उसे मुख्यमंत्री बना दिया जाय?

पांच साल बाद 2009 में हुए विधानसभा चुनावों ने यह साबित भी कर दिया कि छल कपट के ज़रिये सत्ता हासिल करने वाले शख्स में इतनी कूब्बत नहीं थी कि किसी पार्टी को बहुमत दिलवा सके. इसके बाद फिर शुरू होता है राजनैतिक छल-कपट का खेल और उसमें गर्म गोश्त के सौदागर गोपाल कांडा से समर्थन लेकर उसे गृह राज्य मंत्री बना दिया जाता है. यह गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा सड़कों पर गुंडागर्दी करता फिरता है मगर मुख्यमंत्री की सेहत पर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता. यहाँ तक कि पूर्व क्रिकेटर अतुल वासन की भी सरे आम इस गृह राज्यमंत्री कांडा के हाथों पिटाई होती है लेकिन फिर भी वह गृह राज्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा रहता है. इस बात से एक यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या गोपाल कांडा मुख्यमंत्री के कुछ निजी हित भी साधता था, जो कांडा के सारे गुनाहों पर भारी पड़ते थे?

यदि हाँ, तो वो कौन से और कैसे हित थे? कहीं मुख्यमंत्री हुड्डा के राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के होश ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी भी कहीं कांडा के कन्धों पर तो नहीं थी?

फिजा के घर से बरामद नकदी भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि इतनी बड़ी रकम उसके पास कहाँ से आई. जबकि उसका कोई व्यापार भी नहीं था और वकालत उसकी कभी चली नहीं. क्या यह संभव नहीं है कि उसे पहले इतनी बड़ी रकम देकर उससे यह बयान दिलवाए गए हों कि उसे कुलदीप बिश्नोई से जान का खतरा है और जैसे ही फिजा के मुह से निकली यह बात उसके नजदीकियों तक पहुँची हो, उसके कुछ दिनों बाद फिजा को उसके किसी नजदीकी के हाथों ज़हर दिलवा दिया गया हो?

गौरतलब है कि हरियाणा के विधानसभा चुनाव फिर सिर पर हैं और कुलदीप विश्नोई ने हरियाणा भाजपा से गठबंधन कर रखा है, जो कि हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के वोट काट सकता है और इसका सीधा फायदा चौटाला को मिलेगा और यदि कुलदीप विश्नोई फिजा हत्याकांड में फंसता है तो जो भजनलाल समर्थक कांग्रेसी वोट कुलदीप विश्नोई के साथ है, वह वोट कांग्रेस की झोली में जायेगा. ऐसे में फिजा की रह्स्यात्मक मौत से कुलदीप बिश्नोई को फंसाने के लिए एक बड़ी साजिश होने की बू आना लाजिमी है.

ऐसे बहुतेरे सवाल हैं जो अपना जवाब ढूंढ रहे हैं. इतना तय है कि फिजा की मौत खुद में कोई गहरी राजनैतिक साजिश समेटे है जिसे कोई राजनैतिक साजिशों का खिलाड़ी ही अंजाम दे सकता है. जिसका खुलना इतना आसान नहीं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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