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कार्यस्थलों में यौन शोषण रोकने वाले विधेयक से गोपाल कांडा जैसों पर कुछ फर्क पड़ेगा..?

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संसद ने महिलाओं के साथ कार्यस्थलों पर होने वाले यौन शोषण रोकने के लिए विधेयक पास कर दिया है और इसी के साथ एक नयी बहस शुरू हो सकती है कि क्या ताकतवर लोगों, जैसे गोपाल कांडा, जो हरियाणा का गृह राज्य मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर रहते अपनी कम्पनी में काम करने वाली युवतियों का ना केवल यौन शोषण ही करता रहा बल्कि उन्हें अपने और अपने राजनैतिक तथा व्यापारिक हितों के लिए भी इस्तेमाल करता रहा, पर कोई अंकुश लग पायेगा? गौरतलब है कि कोर्पोरेट क्षेत्र में एक ऐसी संस्कृति विकसित हो चुकी है, जिसमें ऐसी बातें कोई बड़ा मुद्दा नहीं. खैर, इस बारे में हम बाद में बहस करते रहेंगे. फिलवक्त विधेयक के पक्ष में एक रपट पेश है.

 

-प्रणय विक्रम सिंह||

आखिरकार बहुप्रतीक्षित “कार्यस्थलों में यौन शोषण” रोकने का विधेयक संसद में पारित हो गया है. कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीडन से संरक्षण दिलाने वाले बिल, 2010 के कानून की शक्ल अख्तियार करने से स्त्री-अधिकारों व सशक्तिकरण को बल मिलेगा. निश्चित रूप से ऐसे कानून देश में समतामूलक वातावरण निर्मित करने में सहायक होंगे. स्त्री सदियों से समाज की वंचना को झेलने के लिए अभिशप्त रही है. पुरुष की अधिनायकवादी मानसिकता नें सदैव ही इसे अपने अधीन रखने के लिए अनुकूल नियम-कानूनों की रचना की है. यह पुरुषों के पौरुष से ही निर्मित दुनिया है, जहां भ्रूण से लेकर भूमि तक महिलाएं असुरक्षित हैं. कभी घर में अपनों के द्वारा शोषित होती हैं तो बाहर दुनिया की तेजाबी निगाहों से जलती है, हद तो तब हो जाती है जब भ्रूण में ही अजन्मी लडकी हमेशा के लिए खामोश कर दी जाती है और वहाँ से बच कर जन्म ले लिया तो पहली कक्षा में आते ही डीपीएस जैसे स्कूल में बस ड्राइवर और खलासी की वासना का शिकार होने लगती है.

स्त्री के प्रति दोयम दर्जे के व्यवहार की बानगी दुनिया के प्रत्येक कोने में मिलती है.  वह युद्घों में विजयी सेनाओं द्वारा लूटी गई सम्पत्ति बनी और बाजारों में नीलाम हुई तो कभी शौकीन मर्दों की ख्वाबगाह की रौनक बनी. गीतिका शर्मा आत्महत्या के बाद में उजागर हुई गोपाल कांडा की कारगुजारियों ने तो सबकों दांतों तले अंगुलियां दबाने को मजबूर कर दिया. उसकी हर महिला कर्मचारी के अपोइंटमेंट लैटर में हर शाम कांडा को रिपोर्ट करना जरूरी होता था. ज्ञातव्य है कि नारी के शोषण की अंतहीन दास्तां से द्रवित होकर महादेवी वर्मा ने कहा था कि अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में दूध और आंखों में पानी. खैर, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है. बदलाव उसका मिजाज है. लंबे संघर्ष के पश्चात कामकाजी महिलाओं को कार्य-स्थल पर यौन उत्पीडन से मुक्ति दिलाने हेतु बहुप्रतीक्षित संशोधित विधेयक पारित हो गया है. दीगर है कि विधेयक केवल कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा की बात नहीं करता, वरन बाकायदा शिकायत दर्ज करने से लेकर उसके निवारण के प्रावधान इसमें मौजूद हैं. अभी तक यौन उत्पीडन को रोकने के लिए संगठित क्षेत्र खास कर सरकारी दफ्तरों में कमेटी बनाई गई थी. असंगठित क्षेत्र में ऐसा नहीं था. अब इसमें संगठित और असंगठित क्षेत्र के साथ-साथ घरेलू काम करने वाली महिलाओं को भी शामिल किया है. इसके दायरे में निजी, गैर सरकारी और व्यवसायिक क्षेत्र के सभी प्रतिष्ठानों को लिया गया है. रोजगार देने वाले को एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना होगा. शिकायत समिति को 90 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी. इस अवधि में उत्पीडि़त महिला को तबादला अथवा अवकाश पर जाने की सुविधा दी गयी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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