भारतीय प्रधानमंत्री, अंतराष्ट्रीय मीडिया तथा शर्मसार होता आम भारतीय….

बेहुस्न बेपर्दा है तिरा खामोशां, बात सवालात मेरे बड़े नंगे है!

तू क्या समझें अचकन तिरी बड़ी तंग और उस पर बख्तरबंद!! 

 प्रधानमन्त्री की चुप्पी दे रही कई सवालों को जन्म; लोकतांत्रिक, संसदीय मर्यादाओं को भी कर रही तार तार ..यह सब देख भारतीय हो रहे हैं शर्मसार…

 

स्वतन्त्रता के बाद से अब तक भारतीय राजनीति ने तरह तरह के दौर और चक्र देखें है और भारतीय प्रधानमंत्रियों की श्रंखला भी किन्तु जिस प्रकार प्रधानमंत्री विभिन्न मामलों में चुप्पी के कपड़े पहनकर विपक्ष की राजनीति के साथ साथ राष्ट्रहित की भी अनदेखी कर रहे है उसे स्वस्थ लोकतांत्रिक पद्धति तो नहीं ही कहा जा सकता है बल्कि सीधे तौर पर वे लोकतांत्रिक और संसदीय मर्यादाओं को भी तार तार कर रहे है. प्रधानमंत्री की इस प्रकार अतिशय रूप से काँग्रेस के अंदर और बाहर चुप रहने की स्थिति घरेलू स्तर तक थी तो असहनीय ही थी किन्तु अब तो आत्मघाती होती जा रही है, जब अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रधानमंत्री को लानत मलामत झेलनी पड़ रही है और भारतीय अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर उनकी इस जानलेवा अदा का शिकार हो रही है.

पिछले वर्षों में जिस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में अर्थव्यवस्थाएं छिन्न भिन्न होकर चरमराकर ध्वस्त होती गई और इस भीषण वैश्विक मंदी के झंझावात में भारतीय अर्थव्यवस्था अपने पैरों को अंगद पाँव की भांति जमाए रही तब यह दृश्य स्वाभाविक तौर पर अन्तराष्ट्रीय परिदृश्य में इर्ष्या और डाह का एक बड़ा कारण बना. सभी जानते है कि भारतीय बाजारों की चमक और कृषि उत्पादन की खनक से अन्तराष्ट्रीय औद्योगिक घरानें, अन्तराष्ट्रीय कंपनियां, वैश्विक नेतृत्व का तथाकथित खोखला नारा देता अमेरिका, यूनियन जैक और चीनी ड्रेगन आदि आदि सभी भारत की लगभग अक्षुण (यद्धपि भारतीय मापदंडो में यह घोर अपर्याप्त है) रहती विकास दर से घबराकर भारतीय साख को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर घेरने और चोटिल करने का अवसर खोजते रहते है. दुखद है कि सप्रंग 2 के कार्यकाल में निरंतर निरीह और सतत कमजोर होते प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के रहते अब अंतराष्ट्रीय भेड़ियों को भारत की साख पर बट्टा लगानें और आबरू से खेलने के अवसर खोजने नहीं पड़ते बल्कि स्वयं सप्रंग सरकार और सप्रंग नेतृत्व भारत के अंतराष्ट्रीय आलोचकों को यह अवसर सहजता, सुगमता, सुविधा से सदा ही उपलब्ध करा देता है.

कई अन्य घोटालों की श्रंखला में सिरमौर राष्ट्रमंडल खेल, २ जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लाक आवंटन के लाखों लाख करोड़ के मामलों ने सप्रंग सरकार, सप्रंग नेतृत्व और प्रधानमंत्री की छवि को बेतरह दुष्प्रभावित कर दिया है. राजनैतिक खग्रास सूर्यग्रहण के इस दौर में मुझे वे व्यक्तव्य वीर याद आते है जो प्रधानमंत्री को एक बेईमान सरकार का ईमानदार मुखिया बताते थे. मेरे जैसे आम व्यक्ति को तो ईमानदारी की इस सुविधाजनक और नई गढ़ी हुई परिभाषा का अर्थ ही समझ में नहीं आता है.

पिछले महीनों के ही अंतराल में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को द इंडिपेंडेंट ने सोनिया गांधी की कठपुतली कहा फिर टाइम ने अंडरएचीवर यानी फिसड्डी कहा और अब हाल ही में अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के नई दिल्ली संवाददाता सिमोन डेनियर ने जिस प्रकार भारतीय प्रधामंत्री की भद्द पीट दी है उससे प्रत्येक भारतीय का मन दुखी और क्रोधित भी है किंतु इस दुःख और क्रोध का कारण खोजने पर हमें यह भी साफ़,स्पष्ट दिखाई देता है कि स्वयं सप्रंग नेतृत्व भी प्रधानमंत्री की तार तार होती आबरू के प्रति चिंतित,सचेत और जागृत नहीं दिखाई पड़ता बल्कि मनमोहन की छवि नष्ट भ्रष्ट करने हेतु चल रहे अभियान का अंग दिखाई पड़ता है. प्रधानमंत्री की छविभंजन अभियान के सूत्रधार काँग्रेस के अंदर ही है. स्वयं कांग्रेसी दबी जबां यह स्वीकार करते है कि प्रधानमंत्री पर अंतराष्ट्रीय मीडिया के हमले का विरोध काँग्रेस रस्मी और दिखाऊ तौर ही कर रही है काँग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता अंदरखाने यह स्वीकार करते है कि यदि ऐसा सब किसी “गांधी” के बारे लिखा जाता तो गली गली गावं गावं उस पत्रिका के या लिखने वाले के पुतले जला दिए जाते. पहले टाइम पत्रिका में प्रकाशित और अब वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित लेख से करोड़ो करोड़ भारतीयों की ही भांति मेरे ह्रदय को भी ठेस लगी है किंतु यदि हम ठेस लगने की भावना से उबरकर इस दुखद प्रसंग की मीमांसा करें तो एक क्रूर सत्य यह भी प्रमुखता,सशक्तता और प्रामाणिकता से उभरकर आता है कि नेहरु गांधी परिवार के प्रभाव कुप्रभाव में आजन्म, आकंठ डूबी काँग्रेस स्वयं इस षड्यंत्र में सम्मिलित है. काँग्रेस का चरित्रगत इतिहास भी यही कहता है. यद्दपि भारतीय प्रधानमंत्री की कमजोर होती छवि से अंतराष्ट्रीय बाजारों और पूंजी निवेश की दुनिया में भारतीय हितों पर तीव्र तुषारापात होगा इस नाते से करोड़ो भारतीयों सहित मेरी स्वयं की रूचि, आशा और कामना है कि भारत की और भारतीय प्रधानमंत्री की छवि सुदृढ़, सशक्त और कड़क आर्थिक सूत्रधार की बनी रहे किंतु मैं और मेरे जैसे करोड़ो भारतीय मजबूर और मूक दर्शक बन जाते है जब गांधी नेहरु परिवार के किसी व्यक्ति की राजनैतिक स्थापना पुनर्स्थापना के लिए किसी की बलि देने की बात आती है. यदि टाइम पत्रिका में प्रकाशित लेख के समय ही भारतीय वैदेशिक नीति के सूत्रधार इस बात की नाराजगी अमेरिकी नेतृत्व, समाज, अर्थजगत और मीडिया के सम्मुख स्पष्ट सख्ती से रख देते तो शायद ये दिन नहीं देखना पड़ता. राजे रजवाड़ों की तरह चल रहे सप्रंग के अन्य राजनैतिक घटकों को भी यह समझ में आ जाना चाहिए कि वे भी गांधी परिवार और उसके अंधभक्तों द्वारा चलाये जा रहे छवि भंजक अभियान के अंग बन गए है और एक कमजोर प्रधानमंत्री को अति कमजोर और दया का पात्र प्रधानमंत्री बताने के राष्ट्रद्रोही अभियान के एतिहासिक आरोपी भी. घरेलु देशज राजनीति में प्रधानमंत्री को कमजोर बोलना बताना विपक्ष की एक राजनैतिक आवश्यकता रहती ही है किंतु यदि स्वयं सत्तापक्ष अपने नायक के विरुद्ध दुरभिसंधि करने लगे तो न इतिहास उन्हें माफ करेगा न ही इस देश के निरीह नागरिकों और न ही इस देश की अंतराष्ट्रीय जीवंत छवि को. दुष्परिणाम सभी को भुगतने होंगे..लम्हों की खता सदियों को भुगतनी होगी.. तैयार रहिये.

Facebook Comments

One thought on “भारतीय प्रधानमंत्री, अंतराष्ट्रीय मीडिया तथा शर्मसार होता आम भारतीय….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

जैसलमेर में उर्जा क्षेत्र को लगा बडा झटका...

जैसलमेर से मनीष रामदेव पवन व सौर उर्जा उत्पादन के क्षेत्र में पिछले दिनों अपनी एक विशेष पहचान बनाने वाले जैसलमेर जिले में इन दिनों उर्जा का उत्पादन कर रही कंपनियों को एक बडा झटका लगा है। विगत कुछ समय से वित्तिीय संकट से जूझ रही इन कंपनियों में काम […]
Facebook
%d bloggers like this: