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भारत की अखण्डता की सर्जरी…

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-राजेश कुमार गुप्ता||

ऐसा लगता है कि राज नेताओं ने भारत को हर तरीके से ख़त्म करने कि ठान ली है. हमारा देश घोटालों का देश जाना जाने लगा है. अंतर्राष्ट्रीय छवि धूमिल हो गयी है. जिस रोज कोई नए घोटाले का पर्दाफाश नहीं होता, अटपटा सा लगता है. और अब तो घोटाला कई सैकड़ों-हजारों-लाखों करोड़ (!!) में न हो तो कोई खास प्रभावी खबर भी नहीं लगती. जहाँ एक राष्ट्रीय दल केंद्र में क़ाबिज़ हो कर भ्रष्टाचार के नए आयाम बना रहा है तो वहीं बाकी राजनीतिक दल अपने अपने राज्यों में घोटाला स्पर्धा में स्वर्ण पदक लाने में लगे हुए है. जनता को अब से पहले यह एहसास भी नहीं था कि हमारा देश इतना धनी है कि यहाँ इतने बड़े घोटाले हो सकते हैं. अब तक के घोटालों का कुल जोड़ निकालें तो एक बारगी अमरीका और चीन भी हिल जायें.

अगर यह घोटाले देश को बर्बाद करने में काफी न थे तो रही-सही कसर पूरा करने का बीड़ा महाराष्ट्र के कुछ नेताओं ने उठा लिया है. महाराष्ट्र के इन नेताओं ने अंग्रेजों को भी मात देने का मन बना लिया है. ब्रिटिश सरकार ने देश का दो टुकड़ों में विभाजन किया था. लेकिन हमारे अपने नेताओं ने देश कि अखण्डता कि पुरी तरह सर्जरी करके इसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटनें का काम शुरू कर दिया है. और घोर आश्चर्य कि बात तो यह है कि इस नापाक इरादे में महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दल या तो एक होते दिखाई दे रहे हैं, या फिर इस असंवैधानिक और नीच कार्य में भी होड़ लगा कर एक दूसरे को मात देने की नापाक कोशिश कर रहे हैं. सिर्फ वोटों की राजनीति के लिए इतना घटिया कदम शायद एक भारतीय (दिल अभी भी महाराष्ट्रियन कहने को तैयार नहीं है) ही कर सकता है…अंग्रेज नहीं. भारत की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानीयों और शहीदों ने कभी शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस देश की आजादी के लिए वे अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं उसी देश के नेता अपने सत्ता लोलुपता के चलते उसकी धज्जियां उड़ा देंगे. एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में घुसपैठिये कहलायेंगे. एक राज्य के लोगों को दूसरे राज्य में जाने के लिए परमिट लेनी होगी या कुछ आगे चल कर पासपोर्ट/वीज़ा जैसी कोई व्यवस्था लागू हो जाएगी. एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में विदेशी कहलायेंगे. और हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के “नागरिक” के लिए महाराष्ट्र के मुकाबले अमरीका जाना ज्यादा आसान हो जाये. या फिर महाराष्ट्र के “नागरिक” का उत्तर प्रदेश या बिहार में आना प्रतिबंधित हो जाये!

कल्पना कीजिये कि आपका बच्चा बेंगलुरु अथवा मुंबई में पढ़ कर आये तो आप कहें कि वो विदेश में पढ़ कर आया है, या आपके लड़के की पत्नी कोलकता से आयी हो तो विदेशी बहु कहलाये! गोवा में वर्क परमिट लेकर काम करें और अपनी कमाई लेकर लौटें तो विदेश में अर्जित किया हुआ धन मान कर देश-प्रत्यावर्तन के अंतर्गत गोवा सरकार और आपके गृह राज्य, दोनों उस कमाई पर टैक्स लगा दे. पंजाब से धान आयात किया जाये और उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश से चावल का निर्यात हो. गंगा को उत्तराखंड रोक ले और यमुना को दिल्ली. पीएसी और पुलिस राज्यों कि सेना में तबदील हो जायें. राजस्थान से गुजरात जाने में सामानों पर सीमा शुल्क देय हो जाये.

वाह, कितनी सुंदर और भयावक तस्वीर बनी है आने वाले भारत की. क्या ठाकरे, चवाहण, शिंदे आदि भूल गए हैं कि जितने मराठी महाराष्ट्र में हैं उतने ही मराठी अन्य राज्यों में रह रहे हैं और व्यवसाय या नौकरी में हैं और उनके इस कृत्य का असर उन लोगों पर भी पड़ सकता है? इस राजनीतिक उठा पटक के दांव कि कीमत उन निरीह और अव्यग्र लोगों को चुकानी पड़ सकती है जिनका इस ओछी राजनीति से कोई सरोकार नहीं? दुःख कि बात तो यह है कि इस घृणास्पद खेल के कुपरिणाम से इन नेताओं के समर्थक भी अनजान बने हुए हैं या फिर अंधों कि श्रेणी में आते हैं.

और केंद्र में बैठी, घोटालों से घिरी, नपुंसक सरकार से यह उम्मीद करना कि वह इस देश विरोधी हरकत पर कोई आपात कदम उठाये तो अनहोनी सा ही लगता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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6 thoughts on “भारत की अखण्डता की सर्जरी…

  1. श्री मान राज ठाकरे साहब आप तो अच्छे भले परिवार से है अच्छा हो की आप कोई और रास्ता निकाले प्रसिद्धी पाने का दुनिया में बहुत से कार्य हैं जो वास्तव में और सही मायनो में प्रसिद्धी मिले तो ठीक है क्योंकि आप ने शायद सुना या पढ़ा भी हो बहुत सीधी बात है शतरंज के सारे मोहरे खेल ख़त्म होने के बाद एक ही बाक्स में रखे जाते है I

  2. क्या फर्क है देश के उसपार बैठे आतंकवादिओं ,तालिबानी आतंकवादियों और हमारे चमकते उभरते नेता राज ठाकरे ,उद्धव ठाकरे में !लोगों की जान वो भी ले रहे हैं ,ये भी ले रहें हैं ?लेकिन वो दो धर्मो के बीच लड़ाकर हमारे देश को तोड़ने की फ़िराक में हैं उनका मकसद तो समझ में आता है पर ये तो अपने ही धरम और समाज को तोड़ने और उसमे नफरत की बीज बोने का कम कर रहे हैं.क्या इनका भी मकसद वही है जो उन आतंकवादियों का है ?क्या ये अपने ही समाज में नफरत का बीज फैलाकर परदे के पीछे से उनकी मदद तो नहीं कर रहे?हम देशह वाशियों को उनका मकसद समझाना होगा,सर्कार तो कुछ करने से रही,वक़्त हमारे हाथ से निकल जाये हम जनता को उनपर ध्यान रखना होगा तथा हमे अपनी [हिन्दू ,मुस्लिम,,सिख,इसी] एकता को और मजबूत करनी होगी जिससे की जरूरत परी तो इन्हें सबक सिखा सकें !,

  3. अच्छा लगा देख कर की अपने देश में भी विदेश बन गया है………. वैसे कभी किसी नेता ने कभी सोचा है की अगर किसी राज्य से उत्तर प्रदेश या बिहार के लोग चले जाये तो उस राज्य का क्या होगा? चाहे मुंबई हो या पंजाब या दिल्ली या कोई भी राज्य………. सारे राज्यों में ज्यादातर मजदूर इसी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य से आता है……….. अगर ये लोग वापस चले गए तो क्या होगा इस पर तथाकथित मठाधीशो का विचार करना परम आवश्यक है.

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