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अभी राष्ट्र का संतुष्ट होना शेष है!

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-प्रणय विक्रम सिंह

देश में हर्ष की लहर है दर्जनों हिंदुस्तानियों के हत्यारे की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई है। देश की सर्वोच्च अदालत ने समस्त गवाहों और सबूतों की रोशनी मे कसाब को हत्या, देश के खिलाफ जंग छेडने, हत्या में सहयोग करने और आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के आरोप में फांसी की सजा सुनायी है। कसाब को महज एक आंतकी मानने की भूल करना स्थिति और समस्या का अति सरलीकरण है। कसाब एक प्रतीक है उस विध्वंसकारी मानसिकता का जो सृजन के विरुद्ध है। विंध्वस जिसका धर्म, अराजकता जिसका उद्देश्य और कट्टड्ढरता उसका आधार है। ज्यादा बड़े गुनहगार उस मानसिकता का पोषण करने वाले हैं। कसाब एक गरीब परिवार नवयुवक है उसकी महत्वाकांक्षाओं में संपन्नता प्राप्त करना हो सकता है पर दर्जनों लोगों को बेवजह मौत के घाट उतारने की ख्वाहिश होना सम्भव नहीं लगता। तो कौन हैं वह शतिर लोग जो भटके हुए नवजवानों के बेलगाम ख्वाबों की ताबीर के लिए, उनके हाथों में हथियार थमा देते हैं। यकीनन इस सवाल के जबाब को तलाशे बैगर मुम्बई हमले में शहीद हुये जवानों को दी गई  श्रद्धांजली पूरी नहीं होगी।

मुम्बई हमले के सूत्रधार आज भी गिरफ्त से बाहर हैं और नये कसाब तैयार करने में मशगूल हैं। दीगर है कसाब की स्वीकारोक्ति को प्राथमिक साक्ष्य मानने वाले न्यायालय ने उसके बयानों के विस्तार पर क्यो गौर नहीं किया? यदि किया भी तो दिए गये निर्णय की अवधारणा में उसका जिक्र क्यो नहीं हुआजिस तरीके से मुम्बई में मौत बरसा रहे आंतकी गिरोह को सेटेलाइट फोन के जरिये निर्देश दिये जा रहे थे, वह व्यवस्था बगैर सता प्रतिष्ठान की सहमति के संपन्न हो नहीं सकती। अबू जिंदाल की गिरफ्तारी और उसके बयान के पश्चात अब  किसी प्रकार का संदेह नही रहना चाहिए । खैर अभी भी कसाब के सामने उच्चतम न्यायालय के समक्ष पुनर्रि्वचार याचिका दायर करने का विकल्प खुला हुआ है। यदि यह याचिका भी खारिज हो जाती है तो वह क्यूरिटिव पिटीशन दायर कर सकता है। महामहीम के पास दया याचिका भेजने का रास्ता भी खुला है। इन सबके पश्चात भी यदि उसे क्षमा नहीं मिलती है तो उसका फांसी पर लटकना तय है। लंबी कानूनी प्रक्रिया और संविधान प्रदत्त विकल्पों के कारण फांसी की सजा को अमली जामा कब पहनाया जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है। विडंबना है कि देश में भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिये आंदोलन करने वाले, देश के अकूत काले धन को विदेश से वापस लाने के लिए राष्ट्रवादियों को अनशन करना पड़ता है और हत्यारे कसाब के खाने-पीने, सुरक्षा व्यवस्था आदि पर करीब २६ करोड़ रुपये व्यय किए जाते हैं। जिस जीवन की कल्पना आम पाकिस्तानी कभी नहीं कर सकता वह विलास, ऐश्वर्य उसे भारत सरकार उपलब्ध करा रही है। शायद उससे जेहाद की राह में फना होने के बाद कुछ ऐसी ही जन्नत के सुख का वायदा किया गया होगा।

कसाब ही नहीं भारत की अस्मिता को तार-तार करने वाले अनेक मास्टर माइंड और जेहादीसरकार-ए-हिंदुस्तान के मेहमान है। संसद पर हमले का मास्टर माइंड अफजल गुरु अब भी जेल में है। उसकी दया याचिका २००५ से लंबित पड़ी है। फांसी का फंदा उसका भी इंतजार कर रहा है। १९९३ के मुंबई सीरियल बम कांड में लगभग २०० से अधिक निर्दोष लोगों की मौत और करीब ७०० से अधिक व्यक्तियों को घायल करने वाले अभी भी सुप्रीम कोर्ट की लंबी न्यायिक प्रक्रिया का लुत्फ उठा रहे हैं। यही नहीं सन् २००० में हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा के गौरवशाली प्रतिमान लाल किले में घुसकर सेना के तीन जाबांजो की हत्या और ११ लोगों को घायल करने वाले लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मुहम्मद आरिफ की फांसी की सजा पर अभी भी सुनवाई हो रही है। अक्षरधाम मंदिर में सन २००२ में इंसानी खून की होली खेलने वाले हमलावरों की फांसी उच्चतम न्यायालय के निर्णय की बाट जोह रही है। दास्तां यहीं खत्म नहीं होती है। सन २००५ में दीपावली के अवसर पर दिल्ली के बाजारों में छाई खुशियों को मौत के मातम में बदलने वाले जेल में मौज कर रहे हैं। मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन में हुए विस्फोट से मरने वाले हिंदुस्तानी नागरिकों के परिजन आज भी न्याय की आस में निराश बैठे हैं। हो सकता है कि यह सब न्यायपालिका की जटिल प्रक्रिया के कारण हो किंतु सरकार और सियासतदानों को यह समझ लेना चाहिए कि यह महज मुकदमें भर नहीं है वरन, हर हिंदुस्तानी के कलेजे में धंसा हुआ खंजर है। वह जब पीछे मुडकर देखता है तो सवा अरब के मानव संसाधन के मध्य भी स्वयं को असहाय महसूस करता है।

 २६ नवंबर २००८ की वह शाम कोई भारतीय नहंी भूलेगा जब पाकिस्तान से आए आतंकी गिरोह ने भारत की आर्थिक नगरी मुंबई की आबोहवा में मौत का खौफ फैला दिया था। अंधाधुुंध गोलियों की बौछारें हर भारतीय के जिस्म की चाक कर रही थी। मकसद बस एक था। ज्यादा से ज्यादा नागरिकों को मौत के घाट उतार कर आतंकी ताकत की दहशत को समूची आबो हवा में फैलाना। आम अवाम की कानून व्यवस्था के प्रति आस्था को तोड़ कर समूची व्यवस्था को अस्थिर करने की कुत्सित कर्म था कसाब का हमला। एक मायनों में यह भारतीय गणराज्य की प्रभुसत्ता को खुली चुनौती थी। एक युद्घ का ऐलान था दुनिया के सबसे बड़े जम्हूरी मुल्क के खिलाफ। उनको मिल रहे सीमा पार से निर्देशों को समाचार चैनलों पर सभी ने सजीव सुना था। वह रात बड़ी खूनी थी। देश ने हेमंत करकरे जैसा जाबांज अफसर खोया, तो घटनास्थल सीएसटी स्टेशन पर कुछ यात्री ऐसे भी थे जिन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचाना नसीब नहीं हुआ। मौत और दर्द की उस चुनौतीपूर्ण घड़ी में सारा देश एक था। टीवी पर संपूर्ण राष्ट्र ने मुंबई की सडकों पर मौत बांटते इन दङ्क्षरंदों को देखा। ताज होटल में हो रहे धमाकों की आवाजों में देश ने शत्रु राष्ट्र भी छद्म युद्घ की घोषणा को सुना।

लंबी वीरतापूर्ण कार्यवाही के पश्चात स्थिति पुनरू नियंत्रण में आई। मुंबई फिर अपनी गति में लौटी। मुंबई को अपने मिजाज में चलते देख कर देश खुश था, पर उसके साथ समूचे देशवासियों की आंखें डबडबाई हुई थी, हर पलक गीली थी, हर बांशिदें की आंखों के किनारो ने उस वक्त बेवफाई की, जब एनएसजी के शहीद कमांडो मेजर उन्नीकृष्णन और अन्य रणबांकुरे जवानों का पार्थिव शरीर तिरंगें में लिपटा हुआ भारत ही जवानी को शहादत की विरासत सौंप रहा था। कलेजा मुंह को आ रहा था। सारा देश फफक रहा था। पर वह आंसू भय के नहीं थे, न ही बेचारगी के थे। वह आंसू विश्वासघात होने के थे। अपनों को खोने के थे। वह आंसू उस चुनौती को स्वीकारने का संदेश थे जो उसे बिखेरने पर आमादा थी।

ऐसे नृशंस हत्यारे और नरसंहार की कू्रर रचना करने वाले अपराधी के प्रति क्षमा का भाव रखना भी मानवद्रोह है, यह बात फांसी की सजा के विरोधियों और जीवन की अमूल्यता पर विश्वास करने वाले कथित मानवाधिकार कार्यकताओं को समझ लेनी चाहिए।  यूं तो मौत सबसे डरावना भाव है और मौत का इंतजार उससे भी अधिक डरावनी स्थिति। लेकिन राष्ट्र के सवा अरब लोगों की सामूहिक चेतना निर्दयी और नृशंस हत्यारे कसाब को फांसी पर तड़पता देखकर ही संतुष्ट होगी। आशा है  वह दिन शीघ्र ही आएगा।

(लेखक स्तंभकार हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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