मनरेगा के तहत लोग मांग रहे मैला ढोने की इजाजत !

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रोजगार देने के दावे करने वाली सरकार की महत्वाकांक्षी रोजगार योजना ‘मनरेगा’ पर संभल के बेरोजगार परिवारों ने सवालिया निशान लगा दिया है। सलारपुर कलां के सत्रह वाल्मीकि परिवारों ने रोजगार न मिलने पर मैला ढोने की अनु‌मति मांगी है।
गौरलतब है कि भारत में सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा पर प्रतिबंध लगा है और ऐसा करने पर जुर्माना सहित सजा का प्रावधान है, लेकिन संभल के ये परिवार मनरेगा कार्ड मिलने के बावजूद रोजगार न मिलने पर मैला ढोने को तैयार हैं।
संभल के सलारपुर कलां गांव निवासी सत्रह वाल्मीकि परिवारों के पुरुष जॉब कार्ड धारकों ने ब्लॉक कार्यालय आकर एडीओ (एरिया डैवलपमेंट ऑफिसर) याबर अब्बास से मिलकर उनके परिवार की महिलाओं को सिर पर मैला ढोने की अनुमति दिलाने की मांग की। परिवारों की मांग को सुनकर एडीओ सकते में आ गए। एडीओ ने सिर पर मैला ढोने की अनुमति देने से साफ इनकार करते हुए पूछा कि तुम खुद काम क्यों नहीं करते?

ग्रामीणों ने मनरेगा के तहत कार्य नहीं मिलने की बात कही और साथ ही तीन लोगों के पास जॉब कार्ड नहीं होना भी बताया। एडीओ ने सभी वाल्मीकि परिवारों को जाबकार्ड देने और मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया। साथ ही उनसे संकल्प कराया कि वह किसी भी स्थिति में सिर पर मैला ढोने का कार्य परिवार के किसी भी व्यक्ति से नहीं कराएंगे।क्या है मनरेगा..

मनरेगा (महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का उद्देश्‍य ग्रामीण लोगों की आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना है। इसके तहत ग्रामीण परिवारों के बेरोजगार, पर अकुशल काम करने के इच्‍छुक सदस्‍यों को प्रत्‍येक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराया जाता है। वर्ष 2012-13 के लिए मनरेगा के तहत 33 हजार करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की गई है। वहीं वर्ष 2011-12 के बजट में मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था।

आमिर ने भी उठाया था मुद्दा..

अभिनेता आमिर खान ने भी अपने टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ में सिर पर मैला ढोने वाले तीन लाख लोगों के जीवन को दिखाया था। ये लोग आज भी मल-मूत्र की सफाई में लगे हैं और समाज में कई लोग इनको अछूत मानते हैं। आमिर इस प्रथा को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री मुकुल वासनिक से भी मिले थे।

(अमर उजाला)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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21 thoughts on “मनरेगा के तहत लोग मांग रहे मैला ढोने की इजाजत !

  1. हम किया कहते है कुंभ यह मेला ढोने की इजाज़त माँगते है कुंभ नही यह थोड़ा बाहर निकलन छोटे छोटे काम जेसे गाँव में आईस क्रीम बेचना कही पैड पर यहाँ ट्रेफ़िक बहुत आता जाता है बहा मूँगफली रेवड़ी फ़्रूट सब्ज़ी बेचने चार की रेडी लगा कर बेचने का काम करौ किसी से हेल्प कटिग का काम सिखों बौह काम करौ रदी अख़वार पेपर ख़ाली बौतले कुआड का लैहा क़तर करके बेचने काम करौ मेहनत ऐसे भी है सकती है हमें आगे बडने के लिऐ भीख नही मैला ढोने का काम नही दूसरे काम की माँग करना चाहिए जिसे हम अछ् महौल में रहि सके

  2. Kaushal ji Jai Bhim Namo Budhay……..agar ham log swabhiman ki jindagi jina chahte hain to hame Hindu Dharam ki maansik gulami se mukti pani hogi tabhi ham apni jindagi ke maalik ban sakte hain aur yeh mukti Hindu dharam me rehte to nahi mil sakti……agar hamare samaj ke logon ko apna vikas karna hai to dakiyanushi baton ko chhodkar kuchh aisa kaam karna hoga jisse baaki samaj ke log izzat ki nazar se dekhen…… jo log S/C, S/T dusri states se aakar hamare yahan kaam karte hain unka samajik satar kuda uthane walon ki apeksha kafi achha hota hai….iske alawa apne samaj ke logon ko samjhao ki jo refuggee log Pakistan se apna sab kuchh chhod kar aaye the unme jyadatar S/C, S/T aur O B C the jinhone apni jati na bata kat aur apna pushtaini dhandha chhodkar kisi bhi izzat wale kaam ko apnaya aur ab dekho vo kya hai

  3. ये हमारे देश के लिए बडे शर्म की बात् है कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेर रही है. ये परिवार अपना और अपने बच्चों का पॆट भरने लिए ऐस घिनौना कम करने के लिए मजबूर हो गये हैं । क्या वाल्मिकी समाज इतना पंगु हो गया है कि वह अपने अधिकारों के लिए भीख मांगने पर मजबूर हो जाये. क्या किसी भी स्वच्चकार समाज मे इतनी हिम्मत नहीं बची की वह अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर सके. जिन्दगी से इतना लगाव हो गया. कि ये अपनी मांगों के लिए भूख हडताल करे और मैला ढोने का काम तीन दिन के लिए बन्द करके देखे. मै विश्वास दिलाती हुं कि सरकार को हमारी बात मानने के लिए बाध्य होना पदेडा. पर ये समाज गिडगडाने की बजाये हिम्मत कर आगे तो आये. मै आप्के साथ हु.

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