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हुड्डा शासन में कैसे पनपा गरम गोश्त का व्यापारी गोपाल कांडा…?

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कुछ सालों में फर्श से अर्श तक पहुँच जाने वाले यानि कुछ साल पहले के कखपति गोपाल कांडा का बिना किसी सफल व्यवसाय के अरबों खरबों का स्वामी बन जाने के पीछे  किसी अलाद्दीन के चिराग के जिन का करिश्मा नहीं है ना ही कांडा के हाथ कोई पारस पत्थर ही लगा है. ऐसे में देश के गृह मंत्रालय के भी कान खड़े हो गए थे कि आखिर कांडा के पास बेशुमार दौलत आ कहाँ से रही है. लेकिन कांडा के हरियाणा सरकार में गृह राज्य मंत्री होने के कारण गोपाल कांडा की फ़ाइल भारत के गृह मंत्रालय में धूल फांकती रही.

सूत्रों का कहना है कि गोपाल कांडा जुत्तों की दुकान करते करते खूबसूरत चमड़ी के व्यापार में पारंगत हो गया तथा धीरे धीरे यही उसका मुख्य व्यापार बन गया. इसीके साथ हाई प्रोफाइल  सोसायटी में कांडा की पूछ बढ़ने लगी. जिसके चलते गोपाल कांडा की तरक्की में लड़कियों का योगदान दिन दूना रात चौगुना बढ़ता गया. जब मांग तेज़ी से बढ़ी तो कांडा को किसी ऐसे शो बिजनस करने की सूझी जिसमें वह खूबसूरत और हसीन लड़कियों  को नौकरी दे सके. इसी के चलते सन 2007 में उसने एमडीएलआर एयरलाइंस कंपनी खोली थी और महज तीन विमानों के लिए 60 एयर होस्टेस रखी गई. सभी एयर होस्टेस की भर्ती में गोपाल कांडा ने खास दिलचस्पी ली तथा सीसीटीवी कैमरे के ज़रिये हर उम्मीदवार की खूबसूरती और सेक्स अपील को अपनी पैनी व्यापारिक निगाहों से जाँच परख कर नौकरी पर रखा. गौर तलब है कि एमडीएलआर एयरलाइंस के कुल 250 कर्मचारियों में 150 से ज्यादा महिलाएं ही थीं. एमडीएलआर एयरलाइंस तो इन लड़कियों को रखने का बहाना भर साबित हुई, ऐसे में साल भर में एयरलाइंस तो बंद हो गई लेकिन रखी गई 60 एयर होस्टेस को कांडा ने नौकरी से नहीं निकाला. उन्हें उसकी विभिन्न कंपनियों में समायोजित कर दिया.

इन्हीं में लड़कियों में से कुछ लड़कियाँ गोवा के कैसीनो में भेजी गई थीं, जिनमें नूपुर मेहता, गीतिका शर्मा, अंकिता सिंह भी थीं. इस बात की पुष्टि अंकिता की बहन श्वेता सिंह ने भी की है, वह भी कांडा की एयरलाइंस में एयर होस्टेस रह चुकी है. श्वेता ने माना है कि अंकिता के पास गोवा में मकान है, उसके एक बेटी भी है. अंकिता से श्वेता की कुछ महीनों पहले मुलाकात भी हुई थी. लेकिन उसने अंकिता के पति का नाम बताने से इंकार कर दिया.

पिछले सप्ताह हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता ओमप्रकाश चौटाला ने गोपाल कांडा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किये और मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी लपेटते हुए चौटाला ने स्वयं हुड्डा पर भी गोपाल कांडा की सेवाओं का लाभ उठाने के गम्भीर आरोप लगाये. गौरतलब है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर जेसिका हत्याकांड के सजायाफ्ता अपराधी मनु शर्मा के पिता और चंडीगढ़ की एक पांचसितारा होटल के मालिक विनोद शर्मा से गहरी दोस्ती के कारण महिलाओं के मामले में हमेशा अंगुलियां उठती रही हैं.

यही नहीं, हुड्डा के गृह नगर रोहतक का अपनाघर कांड अभी ज्यादा पुराना नहीं है. गौरतलब है कि रोहतक अपनाघर की संचालिका जसवंती, हुड्डा परिवार के बेहद नज़दीक रही है और हुड्डा की पत्नी आशा हुड्डा हरियाणा में महिलाओं के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरुस्कार, अपनी घोषणा के बाद पहली बार जसवंती को “महिलाओं के लिए किये गए उल्लेखनीय कार्यों”  (जो कि अब जग ज़ाहिर हैं और अपने उन उल्लेखित कार्यों के कारण अपनी बेटी और दामादों सहित जेल में हैं) के लिए पुरुस्कृत कर चुकी है. ध्यान रहे कि जसवंती और उसका परिवार हरियाणा सरकार के आदेशों की वज़ह से नहीं, बल्कि सीबीआई की जाँच और मीडिया के हो हल्ले के कारण जेल में है. हरियाणा सरकार ने तो इस मामले को रफा दफा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

इस चित्र पर क्लिक करें और जाने आम हरियाणवी की हुड्डा के बारे में क्या राय है..
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हम यहाँ यह भी दर्ज करना चाहेंगे कि इतना बड़ा कांड होने और उसमें मुख्यमंत्री परिवार पर सीधे सीधे लांछन आने पर भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा का इस्तीफ़ा ना होना एक आश्चर्य का विषय बन गया है. गैर कांग्रेस प्रशासित प्रदेशों में सदन में मोबाइल पर ब्लू फिल्म देखने पर इस्तीफ़ा पा लेते हैं तो हुड्डा में ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं जो उन्हें अनाथ और मासूम बच्चियों से किये जाते रहे दुष्कर्म का जिम्मेदार ठहराए जाने की बजाय अभयदान प्रदान कर देते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि गोपाल कांडा की सेवाएं हुड्डा की सरकार को अभयदान दिलवाने के लिए भी ली जाती रही हों? अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कई और महानुभाव कांग्रेस आलाकमान के काफी करीब हैं और अपनी बात मनवाने की क़ाबलियत रखते हैं. वरना ऐसा क्या कारण हो सकता है कि गोपाल गोयल कांडा भूपेंद्र सिंह हुड्डा का प्रिय पात्र बना रहता है. यहाँ तक की गोपाल गोयल कांडा की फरारी के समय भूपेंद्र सिंह हुड्डा प्रेस के कैमरे के सामने बोलते हैं कि “कानून अपना काम करेगा. ना हम किसी को बचा रहे हैं और ना ही किसी को पकडवायेंगे” गौर कीजिये उनके शब्दों पर! यह शब्द कैमरे के सामने हरियाणा के मुख्यमंत्री खुद हुड्डा ने कहे थे और यह बाईट कई पत्रकारों के पास सुरक्षित है. क्यों नहीं पकड़वायेंगे आप? क्या आप कानून से ऊपर हैं?? आप मुख्यमत्री होते हुए कानून की मदद नहीं करेंगे??? आखिर आप किस बिनाह पर ऐसा बयान दे रहे हैं??? आप खुद तो इस काबिल नहीं और ना ही आप में इतना दम बूता है कि कांग्रेस को बहुमत से जीता सकें {पिछले विधानसभा चुनाव में आप खुद इसे साबित कर चुके}.

भारतीय दंड सहिंता के अनुसार किसी भगौड़े अपराधी की सूचना होने के बावजूद उसके बारे में पुलिस को सूचित ना करना एक दंडनीय अपराध है फिर एक राज्य का मुख्यमंत्री

ऐसा बयान कैसे दे सकता है कि “हम नहीं पकड़वायेंगे” किस विश्वास के साथ कह डाला हुड्डा ने ऐसा? क्या उनको गोपाल कांडा के बारे में कोई सूचना होती तो वे कानून की मदद नहीं करते? उनके इस बयान से तो यही सन्देश मिला कि गोपाल कांडा को गिरफ्तार करवाने के लिए उन पर कोई जिम्मेदारी आयद नहीं होती. ऐसा बोलने की ताकत आपको देने वाला है कौन? किसकी और क्या सेवा करते हो आप, जो आपको यह ताकत देता है?? कहीं खूबसूरत चमड़ी के ज़रिये हासिल की गई ताकत तो नहीं है यह???

खुद भूपेंद्र सिंह हुड्डा की हरियाणा की जनता में कोई खास छवि नहीं हैं और कुछ लोगों की नज़रों में खुद हुड्डा भी काफी रंगीन तबियत वाले “पुरुष” हैं. ऐसे में गोपाल कांडा जैसे लोगों का पनपना कोई बड़ी बात नहीं. यदि ऐसा नहीं होता तो अच्छी-खासी तनख्वाह और सुविधाओं पर लड़कियों की फौज रखकर कांडा उनसे कौन से हित साधता था? कांडा की हुड्डा के शासन काल में हैरतअंगेज तरक्की सवालों के घेरे में है. इस दौरान उसने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी पूरा किया. हुड्डा सरकार के गठन में भी अहम भूमिका अदा की.

ओमप्रकाश चौटाला ने जो आरोप लगाये हैं उनमें कहीं ना कहीं दम है, इस पूरे मामले की विस्तृत जाँच होनी चाहिये कि कहीं कांडा की तरक्की में इन लड़कियों की ही मुख्य भूमिका तो नहीं थी? कहीं गोपाल कांडा अरुणा चढ्डा, नूपुर मेहता, गीतिका शर्मा और अंकिता सिंह का ओहदा और रुतबा बढ़ाकर वह अन्य लड़कियों को उनका अनुसरण करने के लिए प्रेरित तो नहीं करता था और उनके जरिये वह अपने और अपने राजनैतिक आकाओं के आर्थिक और राजनीतिक हितों को साधने का काम तो नहीं करता था?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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