गृहमंत्री क्यों नही गए वीआईपी हाउस?

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राजीव के घर यानी होटल मे प्रदेश के प्रभावशाली मंत्री का दो दिनों तक टिके रहना सत्तारूढ़ दल नही पचा पाया. गृहमंत्री का अप्रवासी भारतीय सेम वर्मा के निज आवास यानी वीआईपी हाउस मे न जाना भी सवालों से घिरा है.

 

-दिलीप सिकरवार||

25 करोड़ वैश्यों की एकमात्र संस्था का दावा करने वाले अखिल भारतीय वैश्य महासभा के बैनर तले संभागीय वैश्य बंधुओं की बैठक बैतूल मे हुई, जिसमें प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता उपस्थित रहे. सम्मेलन मे प्रदेश के कई हिस्सों से वैश्य बंधु पहुंचे. सब कुछ सामान्य था. बस, चर्चा रही तो इस बात की जिसमे गृहमंत्री का अप्रवासी भारतीय सेम वर्मा के निज आवास यानी वीआईपी हाउस मे न जाना. आयोजकों ने एक दिन पूर्व प्रेस के लोगो को बकायदा फोन करके वीआईपी हाउस मे भोजन के लिये आमंत्रित किया. इस एक कार्य के लिये तीन-तीन फोन धनघनाते रहे. यकायक प्रोग्राम चेज हो गया! क्यो? कैसे? जवाब, बहुत सारे. जो एक के बाद एक करके सामने आते रहे. हालांकि यह चर्चा से आगे नही बढ़ सका. पहला तर्क यह, पिछले कुछ दिनों से बैतूलबाजार का यह स्थान काफी चर्चा मे रहा. चाहे विवाद भक्तो से दुर्व्यवहार होने का हो. वाहनों की चोरी का हो. किसी कर्मचारी की संदिग्ध मौत का हो. इन सब मे बैतूल बाजार चर्चा मे रहा. इन सभी घटनाओं पर शक की सुई कर्ता-धर्ताओं की ओर घूमी. ईष्वर की दया से सब कुछ सेट हो गया. और जैसा कि होता आया है वैसा बहाना जांच के नाम पर जारी है. इसकी भनक गृहमंत्री को लग गई थी और कहा जा रहा है कि वो नही चाहते थे कि उन्हें ऐसी किसी विवादित जगह जाना चाहिये. दूसरा, भाजपा का एक धड़ा हमेशा की तरह यह नही पचा पा रहा था कि वैश्यों के बहाने राजीव खंडेलवाल की छवि मे निखार आये. स्वाभाविक सी बात है आज राजीव की छवि पार्टी मे वापसी के बाद भी बाहरी जैसी है. उससे ज्यादा की उम्मीद न की जानी चाहिये और न ही की जा सकती है. राजीव के घर यानी होटल मे प्रदेश के प्रभावशाली मंत्री का दो दिनो तक टिके रहना भला सत्तारूढ़ दल नही पचा पाया. सो लाबिंग की गई होगी. इसमे कौन कितना सफल हुआ, अलग बात है. हां तो जो भोज वीआईपी हाउस मे रखा गया था उसके केंसिल होने के पीछे बड़ा रोचक कारण बताया गया. पत्रकारों को जिला पंचायत के मीडिया अधिकारी और सामाजिक बंधु ने अपनी बुद्धि के हिसाब से जो कहा वह हास्यास्पद है. बकौल अधिकारी, यार आप लोग ष्षाम को बिजी रहते हो. टाइम नही मिल पायेगा सो हमने मंत्रीजी का कार्यक्रम चेंज कर दिया. उसे पता नही कि पत्रकार बाल की खाल निकाल लेते हैं. खबर तो यह थी कि भाजपा का एक धड़ा यदि अपनी वाली पर आ जाता तो मंत्री जी का प्रोग्राम सेट ही नही हो पाता. वैसे समाज मे दबंग की भूमिका निभाने वाले राजीव खंडेलवाल भी जिददी किस्म के है. जो ठान लेते है, देर सबेर करके ही दम लेते हैं. जो भी हो गुप्ताजी का यह दौरा चर्चा मे रहा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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