दुनिया यूं ही नहीं मानती नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की लीडरशिप का लोहा!

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की छवि हमेशा से एक ‘विजनरी और मिशनरी’ नेता के रूप में रही, जिन्होंने न सिर्फ पूर्णतः स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत का स्वप्न देखा बल्कि उसे बतौर मिशन पूरा किया.

उनके नेतृत्व की क्षमता के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि वह ‌आजादी के समय मौजूद होते तो देश का विभाजन न होता और भारत एक संघ राष्ट्र के रूप में कार्य करता. स्वयं महात्मा गांधी ने एक अमेरिकी पत्रकार से बातचीत के दौरान इस तथ्य को स्वीकार किया था.

नेताजी का ‘विजन’ आज भी प्रासंगिक है जो उन्हें आज भी युवाओं के बीच एक आइकन बनाए हुए हैं. उड़ीसा के कटक शहर में उनका जन्म 23 जनवरी, 1897 को हुआ और 18 अगस्त, 1945 में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई जिसे लेकर कई मतभेद हैं. आइए, उनकी पुण्यतिथ‌ि (आधिकारिक) पर उनके नेतृत्व के इन्हीं गुणों को याद करते हैं जो उन्हें एक सच्चा नेता सबित करते हैं.

 सच्चे देशभ‌क्त
सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचारों और देशभक्ति की दृढ़ भावना ने उन्हें तत्कालीन भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा टॉप करने के बावजूद आजादी की लड़ाई में कूदने की प्रेरणा दी.

स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास से प्रभावित सुभाष असहयोग आंदोलन में शामिल हुए. 1922 में जब चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी का निर्माण किया और कोलकाता महापालिका का चुनाव जीतकर महापौर बने तब सुभाष ने प्रमुख कार्यकारी अधिकारी पद की कमान संभाली.

उन्होंने महापालिका का ढांचा बदल दिया. कोलकाता (तब कलकत्ता) के रास्तों के अंग्रेजी नाम बदलकर भारतीय नाम किए और स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वालों के परिजनों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी. अंग्रेजों को उन्हीं की बनाई व्यवस्था से खुली चुनौती देने का यह अंदाज उनके जैसे प्रखर नेता का ही हो सकता था.

अंग्रेजों द्वारा 11 बार जेल भेजे जाने वाले नेताजी तत्कालीन परिस्थितियों में स्वराज के समर्थक थे. यही वजह थी कि उन्होंने खुद को कांग्रेस से अलग कर स्वराज के संघर्ष को एक नई दिशा दी.

युवाशक्त‌ि को आंदोलन से जोड़ना
नेताजी ने युवा वर्ग को आजादी की लड़ाई से जोड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई. सिंगापुर के रेडियो प्रसारण द्वारा नेताजी के आह्वान, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का ही परिणाम रहा जिसने युवाओं को प्रेरणा दी.

बोस का मानना था कि युवा शक्ति सिर्फ गांधीवादी विचारधारा पर चलकर स्वतंत्रता नहीं पा सकती, इसके लिए प्राणों का बलिदान जरूरी है. यही वजह थी कि उन्होंने 1943 में ‘आजाद हिंद फौज’ को एक सशक्त स्वतंत्र सेना के रूप में गठित किया और युवाओं को इससे प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान की सहायता से बनी इस फौज में उन्होंने महिलाओं के लिए ‘झांसी की रानी’ रेजिमेंट बनाकर महिलाओं को आजादी के आंदोलन में शामिल किया.

गीता से प्रेरित कर्म का दर्शन
नेताजी का मानना था कि अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में भागवत गीता प्रेरणा का स्रोत है. वह अपनी युवावस्था से ही स्वामी विवेकानंद से प्रभावित थे.

नेताजी खुद को समाजवादी मानते थे. उनके बारे में इतिहासकार लियोनार्ड गॉर्डन ने उनके बारे में माना, ‘आंतरिक धार्मिक खोज उनके जीवन का भाग रही. यही वजह है जिसने उन्हें तत्कालीन नास्तिक समाजवादियों व कम्युनिस्टों की श्रेणी से अलग रखा.’

 स्वराज के मिशन पर समर्पित जीवन
नेताजी ने हमेशा ही पूर्ण स्वराज का स्वप्न देखा और उसी दिशा में स्वराज के लिए प्रयास भी किए. यही उनके और गांधीवादियों के बीच मतभेद की एक बड़ी वजह रही लेकिन उनके इस स्वप्न ने स्वतंत्रता के प्रयासों को न सिर्फ देश के भीतर बल्कि विदेश में भी सक्रिय करने में काफी मदद की.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजी शासन के विरुद्ध इटली, जर्मनी और जापान जैसे देशों के सहयोग से उनकी आजाद हिंद सेना ने भारतीय स्वाधीनता के लिए कई हाथ जुटाए. एक तरह से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के पीछे स्वराज की यही धारणा प्रेरणा रही.

आदर्श व्यक्तित्व
नेताजी एक आदर्श नेता का सदैव उदाहरण रहेंगे. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज ने भारत पर आक्रमण कर अंडमान और निकोबार द्वीप को अंग्रेजों की गिरफ्त से छुड़ा लिया.

नेताजी ने इन द्वीपों का नाम ‘शहीद’ और ‘स्वराज द्वीप’ रखा और इस जीत से उत्साहित सेना ने इंफाल और कोहिमा की ओर कूच किया. इस बार अंग्रेजों का पलड़ा भारी रहा और उन्हें पीछे हटना पड़ा. इस परिस्थिति में जापानी सेना ने उन्हें भगाने की व्यवस्था की लेकिन नेताजी ने झांसी की रानी रेजिमेंट के साथ मिलकर लड़ना ही पसंद किया.

5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की परेड के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाषण का ‌हिंदी अनुवादः

”वर्तमान में मैं आपको भूख, तृष्णा, अभाव और मृत्यु के अलावा कुछ नहीं दे सकता, लेकिन अगर आप मेरा अनुसरण अपने जीवन व मृत्यु तक करेंगे तो मुझे विश्वास है कि मैं आपको विजय और स्वतंत्रता तक पहुंचाऊंगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम लोगों में से कौन स्वतंत्र भारत को देखने के लिए जीवित रहेगा, इतना काफी है कि भारत स्वतंत्र रहेगा और हम अपना सर्वस्व देकर भारत को स्वतंत्र करेंगे.”

(AU)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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