म.प्र. सरकार की तीर्थ यात्रा योजना: समीक्षा

मारे देश में, हमारे पुराणों में और व्यवहारिक धरातल पर  हिंदु जीवन शैली में तीर्थ यात्रा  का बड़ा भारी महत्व है किन्तु आज के इस महंगाई और आर्थिक संघर्ष के विकट दौर में कई परिवार और उनके बुजुर्ग अपनी आशाओं के अनुरूप धनाभाव के कारण तीर्थ दर्शन नहीं कर पाते है. शिवराज सरकार ने हाल ही में बुजुर्गो के लिए मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना प्रारम्भ करके और इसके पूर्व कुछ विशिष्ट विदेशी तीर्थों के लिए सब्सिडी देकर एक बड़ा और श्रेयस्कर किन्तु राजनैतिक दृष्टि से दुस्साहसी निर्णय तो लिया ही साथ साथ हिंदु पुराणों में उल्लेखित उस तथ्य को भी साध लिया है जिसमे कहा गया है कि तीर्थ करने वाले को तो पुण्य मिलता ही है किन्तु तीर्थ कराने वाले को उससे भी बड़ा पुण्य, मिलता है.

प्रत्येक समाज और शासन की प्राथमिकताएं और वरीयताएँ उस देश में चल रही परम्पराओं, पद्धतियों, रीतियों, नीतियों और बहुसंख्यकों के धर्म के अनुसार ही निर्धारित होनी चाहिए. अधिकाँश अवसरों पर यह  देखने में आता है कि शासन अपनी नीतियों को वोट छापने की एक मशीन बना लेता है सारे निर्णय केवल चुनावी युद्ध को ध्यान में रखकर इस प्रकार किये जाते है कि किसी वर्ग विशेष के वोट एक मुश्त उसे ही प्राप्त हो भले ही उससे कितना ही वर्ग संघर्ष बढ़ जाए. इस प्रकार के वर्गविशेष केंद्रित निर्णय से लाभ किसी वर्ग विशेष का भी नहीं हुआ बल्कि उसकी आत्मशक्ति और उत्पादकता का ह्रास ही हुआ. छदम निरपेक्षता के इस पिशाच ने भारत के बहुसंख्य हिंदुओं को समय समय पर ऐसा आभास कराया जिससे इस राष्ट्र में हिंदु होना एक दोयम दर्जे के नागरिक होने के जैसा लगने लगा. इस तारतम्य में यहाँ  एक कुत्सित प्रयास का स्मरण हो आता है जिसमे सप्रंग सरकार द्वारा डिजाइन और प्रस्तुत “लक्षित हिंसा एवं  साम्प्रदायिकता विरोधी अधि.” ने तो हम हिंदुओं को नानी ही याद दिला दी थी.

देश में चल रही छदम धर्म निरपेक्षता और कुंठा, निराशा के लंबे कालखंड के बाद शिवराज चौहान की सरकार ने तीर्थ यात्रा योजना लाकर देश के बहुसंख्य वर्ग की मान्यताओं और आशाओं को -अंश रूप में ही सही- म.प्र. में राजकीय मान्यता दी है. इस देश के बहुसंख्य हिंदु समाज की मान्यता है और उसके आदर्श इस बात में निहित रहते है कि वह एक सद्गृहस्थ का जीवन जिए और अपने अंतकाल के पूर्व तीर्थ यात्रा पर जाकर पुण्य अर्जित करे और तत्पश्चात जीवन समाप्त होने पर आत्म मोक्ष की अंतहीन  यात्रा पर चल पड़े.

एक आदर्श व नए अध्याय को लिखते हुए  म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज और उनके सहयोगी धर्मस्व मंत्री लक्ष्मी कान्त शर्मा ने म.प्र. के निवासियों के लिए तीर्थ यात्रा व्यय का आधा खर्चा देने का प्रावधान किया है. तीर्थयात्रा के लिए हिंदुओं को आर्थिक सहायता देनेवाला मप्र संभवत: देश का पहला प्रदेश बना है जहां मुस्लिमों के अलावा अन्य धर्म के लोगों को भी तीर्थयात्रा के लिए रियायत मिलने लगी है. इस योजना में इस वर्ष 60 हजार वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थ यात्राएं कराई जाएंगी. इससे आर्थिक रूप से कमजोर वृद्ध शासन की सहायता से अपने तीर्थयात्रा के स्वप्न को पूर्ण कर पायेंगे. इसमें सर्वधर्म समभाव को ध्यान में रखते हुए सभी धर्मो के तीर्थस्थलों का चयन किया गया है. चयनित तीर्थस्थानों में बद्रीनाथ, केदारनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारकापुरी, हरिद्वार, अमरनाथ, वैष्णोदेवी, शिरडी, तिरुपति, अजमेर शरीफ, काशी , गया, अमृतसर, रामेश्वरम, सम्मेद शिखर, श्रवण बेलगोला और वेलांगणी चर्च, नागापट्टनम शामिल हैं.

संभवत: देश मे पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुस्लिम धर्मावलंबियों के अलावा किसी को तीर्थ यात्रा मे लिए कोई सहायता दी जा रही हो. अब म.प्र. के निवासी रामायण व पौराणिक कथाओं में उल्लेखित श्रीलंका की अशोक वाटिका, सीता मंदिर तथा कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर का दर्शन लाभ ले सकेंगे. ऐसा पहली बार हो रहा है कि मप्र सरकार किसी धार्मिक यात्रा के लिए आधा खर्च खुद उठाने को तैयार है. मप्र के धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग ने श्रीलंका के सीता मंदिर, अशोक वाटिका व अंकोरवाट मंदिर, कंबोडिया की यात्रा सबसिडी देने की योजना बनाई है ताकि मध्यप्रदेश के तीर्थयात्रियों को आर्थिक सहायता मिल सकें. राज्यपाल के अनुमोदन के बाद इस आदेश का प्रकाशन गत 13 जनवरी को मध्यप्रदेश के राजपत्र (असाधारण) में भी हो चुका है और इसी दिन से यह आदेश प्रभावी हो गया है.

अनन्त काल से भारत के सांस्कृतिक एकीकरण में  तीर्थों व तीर्थयात्राओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. भिन्न-भिन्न राजाओं द्वारा शासित अनेकों राज्यों में विभाजित रहते हुए व अनेक साम्प्रदायिक समूहों की उपस्थिति के उपरान्त भी तीर्थस्थल सामूहिक श्रद्धा के केन्द्र रहे हैं व तीर्थाटन हिन्दु समाज के जीवन का अभिन्न अंग रहा है. महाभारत वनपर्व (82/9-12) व अनुशासनपर्व (108/3-4) और स्कंदपुराण, पद्मपुराण, विष्णुधर्मित्तरपुराण में तीर्थयात्रा से पूर्ण पुण्य प्राप्ति की चर्चा है. इन सभी ग्रंथो का संक्षेपित आशय यही है कि जब तीर्थयात्रा की जाती है तो पापी के पाप कटते हैं, सज्जन की धर्मवृद्धि होती है; सभी वर्णों व आश्रमों के लोगों को तीर्थ का फल प्राप्त होता है.पुराण व पद्मपुराण में क्रमश:200 व 108 तीर्थों के नाम आये हैं. महाभारत वनपर्व एवम् शल्यपर्व में  3900 के लगभग तीर्थयात्रा विषयक श्लोक है. ब्रह्मपुराण मे 6700 पद्मपुराण में 4000, वराहपुराण में 3182,   मत्स्यपुराण में 1200 श्लोक तीर्थ से सम्बन्धित हैं. अनन्त काल से भारत के सांस्कृतिक एकीकरण में  तीर्थों व तीर्थयात्राओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

जब सम्पूर्ण देश में हिंदुओं की बात करना भी साम्प्रदायिकता माना जा रहा हो, छदम धर्मनिरपेक्षता की सुविधाजनक बयार चल रही हो, तथाकथित बुद्धिजीवी और प्रगतिशीलता के नाम पर हिंदु विरोधी व्यक्तव्य देने वालों को पद्, सुविधाएँ, समितियों की सदस्यता, रेवडियाँ मिल रही हो उस दौर में इस प्रकार हिंदुओं के लिए तीर्थ यात्रा हेतु सुविधा देने की हिमाकत करने से म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और धर्मस्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की दृढप्रतिज्ञ, संकल्पित, समर्पित और शुद्ध मानसिकता का पता चलता है. तीर्थयात्रा के लिए हिंदुओं को आर्थिक सहायता देनेवाला मप्र संभवत: देश का पहला प्रदेश बना है इस सुन्दर कार्य के लिए निश्चित ही म.प्र. की जनता इस सरकार के प्रति आभारी और कृतज्ञ रहेगी.

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