क्या सेक्स और हिंसा की चाशनी में डूबी फ़िल्में दर्शकों को भा रही है ?

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– मीनाक्षी शर्मा||

पिछले दिनों रिलीज़ हुई पूजा भट्ट की फिल्म “जिस्म-२” से फिल्म निर्माण  के क्षेत्र में  एक नयी बहस शुरू हो गयी है कि हम दर्शकों को किस तरह की फ़िल्में दिखा रहे हैं. अश्लील सिनेमा की आड़ में हम युवा दर्शकों को कहीं न्यूडिटी तो नही दिखा रहे ? पहले जब कभी एडल्ट फ़िल्में रिलीज़ होती थी तो उनका कुछ मकसद होता था, कुछ सन्देश भी होता था उन फिल्मों में, जबकि आज के समय एडल्ट फिल्मों का मतलब होता है बेडरूम सीन. अब तो हद ही हो गयी है कि फिल्म निर्माता सनी लियोन जैसी पोर्न फिल्मों की नायिका को बोलीवुड की नायिका बना रहे हैं इस फिल्म से सनी का ग्राफ जरुर बढ़ गया होगा क्योंकि अब वो बोलीवुड की नायिका हैं जबकि दर्शकों ग्राफ जरुर गिर गया है.

क्या अगर कोई ए ग्रेड स्तर का निर्माता “जिस्म-२” जैसी फिल्म बनाए तो उसे हमें किस श्रेणी की फिल्म में शामिल करना चाहिए. समझ नही आता. इसी तरह फिल्म “क्या सुपर कूल हैं हम” भी ऐसी फिल्म है जिसमें ऐसे – ऐसे संवाद हैं जिसे सुनने में भी शर्म आये. इस फिल्म ने तो कुत्तों को भी नही छोड़ा. ऐसी ही एक फिल्म पिछले दिनों रिलीज़ हुई थी ‘हेट स्टोरी’, निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की यह फिल्म भी कुछ ऐसी ही फिल्म थी.

एक समय था कान्ति शाह और दादा कोंडके जैसे निर्माता निर्देशक इस तरह की फ़िल्में बनाते थे तब उनकी फिल्मों के दर्शक बहुत ही सीमित होते थे जबकि आज समय बदल गया है क्या आज प्रचार व माकेर्टिंग का समय है इसलिए ऐसी फिल्मों को दर्शक मिल रहे हैं या आज सेक्स और हिंसा की चाशनी में डूबी फ़िल्में दर्शकों को भा रही है या फिर पैसा कमाने की होड में लगे हैं निर्माता निर्देशक.

भट्ट कैम्प की तो फिल्मे जब भी रिलीज़ होती हैं दर्शकों  को लगता है कि अब सेक्स ही देखने को मिलेगा जबकि एक समय था इसी कैम्प ने एक से एक अच्छी फ़िल्में अपने दर्शकों को दी हैं. आश्चर्य की बात तो तब होती है जब सेक्स से भरपूर फिल्मों को बनाने वाले निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों को क्लासिक फिल्मों का दर्जा देते हैं और कहते हैं इस तरह की फिल्म बना कर वो निर्देशक के तौर पर एक नयी ऊँचाई को छू लेगें.

क्या आगे आने वाले समय में दर्शकों को इसी तरह की फिल्में देखने को मिलेगीं या कुछ बेहतर फ़िल्में देख सकेगें दर्शक ? वैसे तो निर्देशक पूजा भट्ट ने फिल्म “जिस्म – ३” का भी एलान भी कर ही दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “क्या सेक्स और हिंसा की चाशनी में डूबी फ़िल्में दर्शकों को भा रही है ?

  1. मैं सामाजीक और आर्थिक देश का विकाश हो और जनता के मनोबल बड़े देश तरकी करे उस पर हम जोर देते है / हम सम्प्रदायको को बढ़ावा नहीं देना चाहिए आज के दोर मीडिया देश में सम्प्रदायक को बढ़ाने में और देश को बर्वाद करने में सुब से अहम् भूमिका निभाया है / ए मीडिया ही है जो देश में हिन्दू और मुस्लिम को लड़ने में इनका अहम् भूमिका हमेशा ही रहा है / इ मीडिया देश को कभी सन्ति से रहने नहीं दिया है हमे सुब सचाई पता है / सरकार जीस दिन मीडिया पर सिक्न्झा कस ले उस दिन देश में हिन्दू और मुस्लिं का दंगा बंद हो जायगा / जय हिंद .

  2. Aap log ki manshiktaa khtam hogaya hai. bus aap log ke dikhane ke liye ek hi filam hai o hai ldkiya ko nagi str me filam bnaana aap log ko bhut achha lagta hai aap log is desh ke kalankit aadmi ho jo iswar kabhi bhi maaf nhai krega.

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