क्या कुलदीप विश्नोई ने करवाई थी फिजां की हत्या?

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अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा की मौत में चाँद मोहम्मद उर्फ़ चन्द्र मोहन के छोटे भाई और हजका के अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई का नाम सामने आ रहा है. इस बीच इस मामले की जांच कर रही पुलिस अब भी ठोस सुराग की तलाश में है. पुलिस की टीम ने इसके लिए गुरुवार को भी फिजा के घर की फिर से खाक छानी. घर की तलाशी के दौरान पुलिस को अलमारियों से नोटों के ढेरों बंडल मिले हैं जिन्हें हाथ से गिनना संभव नहीं था. इस पर पुलिस ने नोट गिनने के लिए दो मशीने भी मंगवाई. सूत्रों के मुताबिक पुलिस को फिजा के घर से करीब सवा करोड़ रुपये नकद और एक किलो से अधिक सोने के जेवरात मिले हैं.  पुलिस ने फिजा के चाचा सतपाल को भी पूछताछ के बाद हिरासत में ले लिया है. पुलिस का कहना है कि फिजा का चाचा ना केवल बार बार बयान बदल रहा है बल्कि उसने डुप्लीकेट चाबी से फिजा का घर खोलने की भी कौशिश की थी.

इसी बीच फिजा का अंतिम वीडियो भी सामने आया है जिसे देखने पर पता चला कि फिजा अपने मित्र अजीत हुड्डा के साथ मोहाली के राजश्री रेस्टोरेंट में खाना खाने गई थीं. फिजा ने इस वीडियो में जो कपड़े पहन रखे हैं उन्हीं कपड़ों में उनकी लाश मिली थी. एक अगस्त के इस सीसीटीवी वीडियो फुटेज के मुताबिक फिजा और अजीत शाम पांच बजकर 47 मिनट पर रेस्टोरेंट में दाखिल हुए. शाम 6 बजकर 43 मिनट पर फिजा रेस्टोरेंट से बाहर आती दिख रही हैं. अजीत करीब पांच मिनट बाद 6 बजकर 47 मिनट पर बाहर निकलते दिख रहे हैं. अजीत के हाथ में एक पॉली बैग भी दिख रहा है जिसमें खाने का सामान था. फिजा के घर से पुलिस ने इस पॉलीबैग को भी बरामद किया है. फिलहाल इसे जांच के लिए सीएफएल भेजा गया है जिसकी रिपोर्ट चार दिन के भीतर आ जाएगी.

बुलंदशहर के एक समाजसेवी सलीम अल्वी के सनसनीखेज दावे ने फिजा उर्फ अनुराधा बाली की मौत के मामले में नया मोड़ ला दिया है. अल्वी ने दावा किया है कि फिजा की मौत मे चंद्रमोहन के भाई कुलदीप विश्नोई का हाथ है.

सलीम अल्वी उन लोगों में शामिल हैं, जिनसे फिजा ने मौत से पहले बात की थी. इसी आधार पर मोहाली अपराध शाखा ने फिजा के मोबाइल फोन की कॉल ट्रेस कर सलीम अल्वी से संपर्क साधा और जाँच में सहयोग के लिए कहा है. 31 जुलाई की दोपहर करीब ढाई बजे और एक अगस्त की शाम 4-5 बजे के बीच सलीम अल्वी ने फिजा से मोबाइल पर बातचीत की थी. सलीम का दावा है, ‘तब फिजा बेहद परेशान और डरी हुई थी. अपने को असुरक्षित बता रही थी. तब मैंने कहा कि दिल्ली में रहने से काफी हद तक सुरक्षित रहेंगी. अपनी बात दिल्ली में मीडिया के सामने रखने की सलाह भी दी थी.’ फिजा को ‘बड़ी बहन’ बताने वाले सलीम ने बताया कि फिजा नौ अगस्त को बुलंदशहर आने वाली थी. फिजा बुलंदशहर से विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बना रहीं थी. अल्वी दो वर्ष से अधिक समय से फिजा के संपर्क में था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. नारायण दत्त तिवारी अपनी जवानी के दिनों से ये धतकरम करते आ रहे थे जो ८४ की उम्र तक जवान रहे और जब एक आदमकद ने उन्हें बाप कहना शुरू किया तब उन्हें बुढापा आया.चन्द्र मोहन उर्फ चाँद मोहम्मद और गोपाल कांडा तो अभी जवान ही हैं और अंदर नहीं गए तो इ नके और कुकर्म चले-फिरते नज़र आयेंगे. अनुराधा बाली उर्फ फिजा और गीतिका शर्मा दोनों का आकर्षक चितवन था और उसीको भुनाने उन्होंने इन दोनों दरिदों का दामन थामा. दोनों मृतिकाओं की अक्ल पर कोफ़्त होती है और उनकी मौत पर दुःख. उज्ज्वला शर्मा भी नारायण दत्त को रिझाने अपने नाम और रूप को साकार करती थी. दो ने तो अस्वाभाविक मौत को गले लगाया पर लगता है उज्ज्वला को नारायण दत्त तिवारी से अभी भी अपना हिसाब पूरा करना है.
    चाँद – कांडा -तिवारी -त्रिपाठी सब गुनाहगार हैं समाज के खासकर नारी समाज के , इसलिए कि उन्होंने उनका पत्तलों की तरह इस्तेमाल किया और बेमौत मरने के लिए छोड़ दिया. आदमी की फितरत यही है कि वह औरत के प्रति ईमानदार नहीं रहता. स्खलित हुआ और फिर कुछ नया ढूढने लगता है. मिले न मिले यह अलग बात है लेकिन सड़क चलते उसकी शैतान आँखें शैतानी करने लगती हैं. यह अकाट्य सत्य है और इसीलिए मेरा सुझाव है कि इन प्रकरणों को व्यक्तिगत मत बनाइये. चाँद का हो या कांडा का कांड तिवारी और त्रिपाठी की तरह इन्हें भी न्यायालय नहीं छोडेगा. इन्हें अपने दुष्कर्मों की सज़ा मिलेगी. जरूरत है तो जागरूकता जगाने की और मामले को पूरी शिद्दत से उठाने की जो निश्चय ही फेसबुक पर अपनी पीड़ा और संवेदना व्यक्त कर देने भर से संभव नहीं होगी. फेसबुक से बाहर निकालिए इसे और इस जैसे तमाम कांडों को जिनमें स्त्री का दुरूपयोग उपभोग के लिए किया गया. आपका साथ देने सिर्फ फेसबुकिये ही नहीं वे भी होंगे जो देख रहे हैं लेकिन खून का घूँट पीकर चुप हैं, अपनी अपनी सीमाओं की वज़ह से. उनको सीमाओं से बाहर आप निकालिए. आव्हान कीजिए और अपनी आवाज़ को जन जन की आवाज़ बनाइये. मै आपके साथ हूँ , और भी साथ आयेंगे.
    आज एक और पर्दा उठा है जिसके पीछे सवा करोड की नकदी और एक किलो सोना प्राप्त हुआ है. अगर यह फिजा का अपना पैसा था भले ही चंदमोहन ने छुटकारा पाने उसे दिया हो , इतना था कि वह अपनी रही सही जिंदगी बड़े आराम से काट सकती थी. क्या पैसा और पोजीशन ही वे उद्देश्य थे जिनके चलते वह बाल बच्चेदार चंद्रमोहन से धर्म बदलकर उसकी पत्नी बनीं और २० दिन बाद छोड़ दी गई.यदि ऐसा ही था तो इस गैर सात्विक सम्बन्ध की ऐसी परिणति होनी ही थी. उसे अपनी सुरक्षा के पूरे इंतजाम रखने थे इसलिए कि उसके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी,और एक सुरक्षाकर्मी रखा जा सकता था.

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