आखिर क्‍यों हों समिति के चुनाव

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-कुमार सौवीर||

साथियों। समिति के चुनाव को लेकर माहौल तेज है। मैं इस चुनाव में नहीं हूं, लेकिन इस प्रक्रिया में अपनी भागीदारी जरूर निभाना चाहता हूं। इसी सिलसिले में आपसे एक अपील है। सवालनुमा।
उप्र राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति
आखिर क्‍यों हों समिति के चुनाव
क्‍या इसलिए कि कुछ लोग पूरी पत्रकार बिरादरी के नाम पर अपनी दलाली चमकाएं
मेरा जवाब है कि नहीं।

तो कम से कम हम उन लोगों को पहचान तो सकें कि हमें किन लोगों से खतरा है और इसके बाद ही फैसला किया जाए कि किसी को वोट दिया जाना है और किसे नहीं।

कुछ सवाल हैं आपके सामने। हो सके तो सोच लीजिएगा।

1- सूचना विभाग से मिली पत्रकारों की बीमा की रकम का सदुपयोग सभी सदस्‍यों तक पहुंचाने के बजाय केवल चुने-गिने लोगों तक सौंपने वालों को क्‍यों चुना जाए।

2- जो लोग क्‍यों चुने जाएं जो अपनी करतूतों के चलते सरेआम पिट जाते हैं और इसका खामियाजा पूरी पत्रकार बिरादरी को भुगतना पड़ता है

3- क्‍या हम उन लोगों को चुनना चाहते हैं जो अक्‍सर देर रात तक सड़कों पर शराब पीकर बवाल और तोड़-फोड़ करते हैं। आखिर उन्‍हें क्‍यों चुना जाए जो अपना सरकारी आलीशान मकान लगातार बदलते रहते हैं, क्‍यों उन्‍हें चुना जाए जिनके घर में दलाल ठेकेदार और अफसर रोजाना बैठकें लगाते हैं। क्‍यों उन्‍हें चुना जाए जो रोज सड़क पर शराब पीकर पिट जाते हैं।

4- पुलिस, अफसर और नेताओं की दलाली करने वालों को आखिर हम क्‍यों अपना नेता चुनें

5- पत्रकारिता से तनिक भी नाता न होने के बावजूद खुद को पत्रकार कहने वालों को अपना नेता क्‍यों बनाया जाए

6- क्‍या हम उन लोगों को चुनने जा रहे हैं जो खुद धुत्‍त होकर निर्दोष युवकों को पीटता है और बाद में पुलिस के बल-बूते उनके परिवार के लोगों को प्रताडि़त करते हुए पत्रकारिता को सरेआम सड़क पर बेचता है

7- उसे क्‍यों चुना जाए जो रवि वर्मा समेत दो पत्रकारों की लम्‍बी बीमारी के बाद हुई मौत पर अपनी आंखें नम करने के बजाय पीडि़त परिवारीजनों को आर्थिक मदद वाली अर्जी को फाड़ देता है। जब कि इस अर्जी पर 186 पत्रकारों के हस्‍ताक्षर थे।

8- उन्‍हें क्‍यों चुना जाना चाहिए जो कभी किसी भी पत्रकार की गंभीर बीमारी या दिक्‍कत पर आड़े वक्‍त नहीं आये।

9- उन्‍हें क्‍यों चुना जाए जो खुद को पत्रकारों का रहनुमा बनते घूमते हैं, लेकिन पत्रकारों के हितों को लेकर कोई भी प्रयास उन्‍होंने नहीं किया।

10- हमें क्‍यों उन लोगों को चुनें जो प्रेस कांफ्रेंस में अपनी दलाली चमकाने के लिए जानबूझ कर मूर्खतापूर्ण सवालनुमा जवाब देते हैं और जिससे पूरी पत्रकार बिरादरी की फजीहत होती है

11- अपनी पिटाई को पूरी पत्रकार बिरादरी और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर हमला बताते हुए सत्‍ता के गलियारों में चिल्‍लाने वालों को हम क्‍यों चुनें

12- हम उन लोगों को क्‍यों चुनें जिन्‍होंने कभी भी किसी भी पत्रकार की प्रताड़ना का मामला नहीं उठाया।

13- क्‍यों चुना जाए उन लोगों को जो किसी भी बीमार पत्रकार के काम नहीं आये।

14- पत्रकारों के हितों के लिए कोई भी काम अब तक नहीं करने वाले किसी को हम क्‍यों अपना नेता चुनें।

15- महिलाओं को उत्‍पीडि़त करने वालों, गंभीर आरोपों में घिरे लोगों को क्‍यों चुना जाए।

चुनाव लड़ने के इच्‍छुक श्रीमन, आप हमें आश्‍वासन का कम्‍पट, लेमनज्‍यूस या लालीपॉप मत दीजिए। हम आपके मुंह से हर बार की तरह यह दावा नहीं सुनना चाहते हैं कि आपने पीजीआई में इलाज की दिशा में प्रयास किया है। सीधे-सीधे यह बताइये कि बरसों पहले जो आपने इस बारे में वादा किया है, उसके लिए आपने क्‍या किया है। हम आपसे जवाब चाहते हैं, आपके वादे की कैंडी चूसना नहीं चाहते।

हम यह जानते हैं कि आप वाकई ईमानदार हैं और दलाली करना आपका मकसद नहीं है। लेकिन साफ तौर पर बताइये ना कि किस बीमार पत्रकार के लिए आपने क्‍या किया, केवल वेतनभोगी आर्थिक विपन्‍न पत्रकार की किस बेटी की शादी के लिए क्‍या किया। ऐसे जरूरतमंद पत्रकार के बच्‍चों की शिक्षा की दिशा में आपने क्‍या किया है और कब किया है।

और सबसे बड़ी तो बात यह है कि आप साफ तौर पर बताएं कि आखिर हम आपको क्‍यों वोट दें। यकीन मानिये कि हमें आपके प्रचार वाले ई-मेल और आपकी द्वारा आयोजित की जा रही धमाकेदार पार्टियों की जरूरत नहीं है। बेहतर है कि आप इन सारे सवालों के जवाब हमें दे दें।

मतदाता साथियों, मेरा सुझाव है कि इन और ऐसे सवालों का जवाब हम सब लोगों को खुद अपने से पूछना चाहिए। इतना ही नहीं, इस चुनाव के पहले सभी प्रत्‍याशियों से भी अनिवार्य तौर पर पूछा जाए, बाध्‍य किया जाए कि इन सवालों पर उनका जवाब क्‍या है।

इसके बाद ही तो हम तय कर पायेंगे कि किसे चुनना है और किसे पूरी तरह खारिज। कहीं ऐसा न हो जाए कि—–

इक चीज थी जमीर, जिसे वापस न ला सका,

लौटा तो है जरूर वो, दुनिया खरीद कर—-

About Post Author

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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