क्यों मिली दोगुनी जमीन पर जिंदल को खनन लीज?

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-भंवर मेघवंशी||

बड़े उद्योगों के लिए किसानों से जमीन का अधिग्रहण करके सरकारें अब कल्याणकारी शासन करने वाली जनता की सरकारें नहीं बल्कि ‘प्रोपर्टी डीलर’ बनती जा रही है, देश भर में सरकार के इस गिरते चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे है, सरकार का काम यह नहीं है कि वे किसानों से जमीनें लें और उद्योगों को देती रहे, लेकिन किसानों और मजदूरों के हितैषी होने का पाखंड करके सत्ता में आने वाली सरकारें अक्सर बड़े उद्योगपतियों के गुलामों की भांति काम करती दिखाई पड़ती है। मनमोहन सिंह की पिछली सरकार ने एक विशेष आर्थिक क्षेत्र  का कानून पास किया था, बड़ी-बड़ी कंपनियों को गवर्नमेंट औने-पौने दामों पर हजारों एकड़ जमीनें मुहैया करवा रही थी, सिंगुर से लेकर पोस्को तक, दंतेवाड़ा से लेकर नियमगिरी तक देश के विभिन्न प्रांतों की सरकारों ने किसानों से जबरन भूमि हथियाना प्रारंभ कर दी और फिर उसे बहुराष्ट्रीय व राष्ट्रीय निगमों को आवंटित करना चालू कर दिया था, सरकार की इस खतरनाक नीति के खिलाफ लोग उठ खड़े हुए।

इंडोनेशिया के कुख्यात सलेम समूह को बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार सेज के लिए जमीन देना चाहती थी, वहीं सिंगुर में टाटा को नैनो बनाने का कारखाना खोलने के लिए भी जबरन भू अधिग्रहण किया जाने लगा, तब भी आम लोग भड़क उठे और भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति बना कर एक लंबे जन संघर्ष के जरिए सिंगुर से टाटा को खदेड़ दिया, आज यही परिस्थिति भीलवाड़ा में हो रही है, सात सौ करोड़ की पूंजी के साथ ऊंचे राजनीतिक रसूखात वाला जिंदल ग्रुप भीलवाड़ा शहर के बिल्कुल नजदीक इलाके में खनन का काम कर रहा है। यह पूरी परियोजना प्रारंभ से ही कानूनों की अनदेखी और सत्ता की करीबियत का फायदा पहुंचाने की कहानी है।

उल्लेखनीय है कि जिंदल शॉ लिमिटेड ने खनन लीज हेतु 830 हैक्टेयर भूमि के लिए आवेदन किया था, लेकिन सूबे की कांग्रेस सरकार जिंदल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गई, उसने अवैधानिक रूप से मांगे गए इलाके से लगभग दुगुना 1583 हैक्टैयर जमीन उपलब्ध कराने का रास्ता साफ कर दिया, यह एक बड़ी मेहरबानी थी कांग्रेस समर्थक जिंदल को लाभान्वित करने की, क्योंकि जिंदल ग्रुप के नवीन जिंदल न केवल कांग्रेस के सांसद है बल्कि वे कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के खास सिपहसालारों में से भी एक है, इसलिए उनकी खुशी भारत भाग्य विधाता राहुल जी की भी खुशी है, भले ही राहुल जी भट्टा पारसौल में जमीन अधिग्रहण के विरुद्ध रहे हो, मगर यहां उनके चेले किसानों की जमीनों का धड़ल्ले से अधिग्रहण करने में लगे हुए है, इस तरह यह भूमि घोटाला प्रारंभ होता है।

हालांकि जिंदल शॉ लिमिटेड को इस खनन लीज का मिलना ही स्वयं में एक प्रकार का घोटाला ही है क्योंकि जिंदल से पहले जिन लोगों ने आवेदन कर रखे थे, उनके आवेदनों को दरकिनार करते हुए जिंदल शॉ लिमिटेड को खनन स्वीकृति दी गई इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर में एक याचिका भी लंबित है जिसकी 73 बार सुनवाई के बावजूद मामला अभी तक अनिर्णीत है, यह भारतीय न्यायिक पद्धति का वो कृष्ण पक्ष है जिस पर बोलने, लिखने से भी हर कोई डरता है। लेकिन यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि ‘पहले आओ-पहले पाओ’ वाली नीति अख्तियार करने वाला खनन विभाग क्यों पहले आने वाले आवेदकों के बजाय बाद में आने वाले जिंदल पर इतना मेहरबान हो गया, यह बात भी किसी से ढंकी-छिपी हुई नहीं है। पर यह तो कुछ भी नहीं है, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा चरागाह भूमियों को किसी भी कीमत पर खनन हेतु आवंटित नहीं किए जाने के मामले में भी उच्चतम न्यायालय के आदेश की तौहीन करते हुए सैकड़ों बीघा चरागाह जमीन भी जिंदल शॉ लिमिटेड को आवंटित कर दी गई। मजेदार बात तो यह भी है कि भीलवाड़ा शहरी क्षेत्र के नजदीक नगर परिषद की पेराफेरी के गांव होने के कारण और पर्यावरण की दृष्टि से इस क्षेत्र में पूर्व में चल रहे खनन पट्टों के नवीनीकरण पर भी जिला कलक्टर भीलवाड़ा ने रोक लगा दी थी, जिला कलक्टर ने 23 फरवरी 2012 को शासन उपसचिव खान /ग्रुप 2द्ध विभाग राजस्थान सरकार जयपुर को भेजे पत्र में उक्त रोक को यथावत रखे जाने की बात कहते हुए साफतौर पर लिखा कि- ‘‘शहर के निकट बड़े पैमाने पर खनन कार्य किए जाने से ब्लास्टिंग आदि से भूगर्भीय संरचना दृष्टि से भी उचित नहीं होगा और पर्यावरण संरक्षण को पूर्णरूप से नुकसान पहुंचेगा और शहर विस्तार/सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

इस प्रकार छोटे पैमाने पर होने वाले खनन कार्य की स्वीकृति नहीं दिए जाने की मंशा के बावजूद जिंदल जैसे बड़े समूह को हजारों बीघा जमीन खनन और ब्लास्टिंग के लिए दिया जाना अत्यंत विचारणीय प्रश्न है, यह कैसे हो सकता है कि छोटे खदान मालिकों से भीलवाड़ा शहर को खतरा हो मगर जिंदल से नहीं, जबकि जमीनी हकीकत वाकई बहुत बुरी है, जिंदल द्वारा की जा रही ब्लास्टिंग से पुर, धूलखेड़ा, सुरास जैसे कई गांवों में दिन-रात धमाके सुनाई देते है तथा कई लोगों ने अपनी इमारतों में दीवारों में दरारों की शिकायतें की है, मगर कोई सुनने वाला नहीं है क्योंकि यह सरकार जिंदल के खिलाफ कोई कार्यवाही करेगी, ऐसा सोचना भी गलत होगा मगर उसके खिलाफ कुछ भी सुनेगी तक नहीं, यह जरूर तय है।

जिंदल शॉ लिमिटेड के अभी से खतरनाक इरादे सामने आने लगे है, यहां सुरास गांव के तालाब की ऐतिहासिक पाल को भी जिंदल समूह द्वारा लगभग 200 फीट गहराई तक खोद दिया गया है जिससे आस-पास के कई कुओं का पानी तक सूख गया है, लोगों द्वारा आवाज उठाई जाने पर तालाब की पाल पर किए गए खड्डे को कुछ हद तक तो भरा गया है लेकिन इस क्षेत्र की पुनः खुदाई होने पर सिंचाई एवं मवेशियों के लिए पानी का मुख्य आधार तालाब ही समाप्त हो जाएगा। सभी लोग जानते है कि भीलवाड़ा शहर के निकट सिंचाई एवं पेयजल का एकमात्र मुख्य स्त्रोत मेजा बांध है, जो भूमि अधिग्रहण की जा रही है वह मेजा बांध के कमांड एरिया सिंचित भूमि सेज की है, कृषि के लिए सर्वोत्तम और पशुपालन के योग्य। इस क्षेत्र के किसान बरसों से अपनी आजीविका यहीं से कमाते रहे है, सरकार एक तरफ खाद्यान्न सुरक्षा का रोना रो रही है तथा ‘राइट टू फूड’ भोजन का अधिकार जैसे कानून बनाने जा रही है वहीं मेजा क्षेत्र के पुर, सुरास, धूलखेड़ा, मालोला, समोड़ी सहित दर्जनों अन्य गांवों के हजारों किसानों का निवाला छीनने पर उतारू है क्योंकि जिंदल शॉ लिमिटेड को आवंटित और आवंटन हेतु अब प्रस्तावित 1258 बीघा जमीन के पश्चात् तो इस क्षेत्र के किसान बेरोजगार होकर भुखमरी का शिकार होगा और इनके पास जीने का कोई साधन नहीं बचने पर वे आत्महत्या को मजबूर रहेंगे, इस तरह प्रदेश की सरकार जान-बूझकर किसानों को मौत के मुंह में धकेल रही है।

अब तो प्रदेश का रीको औद्योगिक विकास हेतु जमीनें अधिग्रहण नहीं करता, वह तो औद्योगिक घरानों के विकास के लिए जमीनें अधिग्रहीत करने में लगा हुआ है, छोटे और मझले उद्योगों को खत्म करके बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लिए किसानों से सरकार द्वारा निर्धारित बेहद कम दामों पर जमीनें अधिग्रहीत करना तथा उन्हें जिंदल जैसे समूहों को आवंटित कर देना एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है, जिसके खिलाफ मजदूरों, किसानों को उठ खड़ा होना होगा और इसकी शुरूआत भी हो गई है। सांप्रदायिक रूप से भी तिरंगा माताजी से लेकर कलंदरी मस्जिद तक कई प्रकरण जिंदल की शान में पलीता लगा रहे है, कई मुकदमे दर्ज हो चुके है, किसान धरना लगा चुके है और उच्च न्यायालय में केस लड़ा जा रहा है, स्थितियां काफी हद तक जिंदल के खिलाफ होती जा रही है, उम्मीद की जा रही है कि भीलवाड़ा का किसान सरकार को ‘प्रोपर्टी डीलर’ या ‘भूमाफिया’ की भूमिका से निकाल बाहर करेगा तथा जिंदल के प्रकरण में विभिन्न स्तरों पर हुई अनियमितताओं के विरुद्ध भी उठ खड़ा होगा। अंततः जीत पैसे की नहीं जनता की ही होगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “क्यों मिली दोगुनी जमीन पर जिंदल को खनन लीज?

  1. आखिर सन ऑफ़ इंडिया के करीबी हैं, मुख्यमंत्रीजी जो सुशासन के प्रतीक है, गांधीजी के स्वनाम अनुयाई है, वोह यह सब नहीं करेंगे तो कौन करेगा? बोलो मत, जय बोलो भाई भतीजावाद की, भ्रष्टाचार की, वसुंधरा को कोसो, खुद को चोर न कह कर गाँधीवादी कहो, यही सूराज की मुख्य धारा है.

  2. सेंट्रल गवर्नमेंट की जो भी नीतिया या बजट बनाई जाती है वो पुजीपतियो को

    ध्यान में रखकर बनाई जाती है न की गरीब जनता को ध्यान में रखकर iइयह सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं सेंट्रल में जितनी भी सरकारे बनी या बनेगी वो उद्योगपतियो और वयापरियो के लिए ही होगी आम जनता के लिए नहीं.i

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