डूब गया जौनपुर के फोटो जगत का सूरज

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दो भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों से सम्मानित हो चुके थे महेन्द्र

जौनपुर। चार दषकों तक जौनपुर समेत पूर्वांचल में छायाःपत्रकारिता करने वाला एक सूरज डूब गया। फोटोग्राफर महेन्द्र सिंह ने रविवार की रात ब्रेन हैमरेज के बाद आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु की जानकारी होते ही पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर लोगों का तांता लगा हुआ है।

महेंद्र सिंह ने 40 वर्षों तक विभिन्न समाचार पत्रों में छाया पत्रकारिता के साथ-साथ संवाददाता के तौर पर काम किया। जिले में उनकी पहचान छाया पत्रकारिता के भीष्म पितामह के तौर पर थी। इंदिरा गांधी और चंद्रषेखर तक उनके खींची फोटोज की प्रषंसा की थी। नगर को तबाह करने वाली सन 84 की बाढ का कवरेज महेंद्र सिंह की नायाब उपलब्धि रही है।

वाराणसी से प्रकाशित आज, दैनिक जागरण, दैनिक गाण्डीव, इलाहाबाद से प्रकाशित अमृत प्रभात, एनआईपी सहित जनपद से प्रकाशित होने वाले दैनिक मान्यवर के अलावा तमाम दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्रों तथा स्वतंत्र भारत के वाराणसी प्रकाशन के दौरान लम्बे समय तक के लिये अपनी कलात्मक फोटो देकर ख्याति अर्जित करने वाले श्री सिंह के निधन की सूचना मिलते ही पत्रकारिता जगत से जुड़े तथा समाजसेवी, राजनैतिक व्यापारी आदि वर्गों के लोग अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया। उनकी शवयात्रा जिस समय उनके आवास से चली, जिस रास्ते से भी गुजरी, लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्पवर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दिया। शवयात्रा की समाप्ति आदि गंगा गोमती के पावन तट रामघाट पर हुई जहां मुखाग्नि उनके ज्येष्ठ पुत्र धीरज सिंह गुड्डू ने दिया। जिस समय उनके ज्येष्ठ पुत्र ने उनको मुखाग्नि दी, उपस्थित सभी लोगों की आखें सजल हो गयीं। अपनी वाणी की विनम्रता के चलते वह पूरे जनपद के चहेते बने हुये थे। रामघाट पर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जौनपुर नगर सिमटकर आदि गंगा गोमती के तट पर आ गया है। बताते चलें कि स्व. सिंह के दूसरे नम्बर के पुत्र नीरज सिंह बंटी वर्तमान में अमर उजाला बरेली संस्करण में संवाददाता के तौर पर कार्यरत हैं। बता दें कि स्व. सिंह की कलात्मक फोटो से प्रभावित देश के दो भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी व चन्द्रशेखर सिंह ने इनकी पीठ थपथपायी थी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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