Home देश सिक्खों पर हमला भारतीय अस्मिता से खिलवाड़..

सिक्खों पर हमला भारतीय अस्मिता से खिलवाड़..

-प्रवीण गुगनानी||
पिछले दिनों अमेरिका में वहाँ के एक नागरिक माइकेल पेज जो कि उत्तरी केरोलिना में फोर्ट ब्रेग्ग सैन्य प्रतिष्ठान में कार्यरत रहा था ने ६ प्रार्थनारत सिक्खों की नृशंस हत्या  कर दी. इस हमले में गुरूद्वारे के अध्यक्ष सतवंत कालका और तीस वर्षीय ग्रंथी प्रकाश सिंह भी मारे गए. अमेरिका के विस्कोंसिन रीजन में मिल्वाऊकी के उपनगरीय इलाके में ओक क्रीक स्थित गुरूद्वारे में जिस प्रकार से एक श्वेत हमलावर ने बर्बरतापूर्वक अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर प्रार्थना के वातावरण में तल्लीन ६ सिक्खों को नरसंहार किया है उस पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का यह कहना कि अमेरिका को आत्म परिक्षण करना चाहिए” यथार्थ, समीचीन और उचित प्रतीत होता है. किन्तु यहाँ यह भी विचार करना चाहिए कि उसे किस प्रकार का आत्म परिक्षण करना चाहिए ?? यदि वे केवल प्रशासनिक नजरिये से यह आत्म परिक्षण की बात कह रहे है तो यह बात निस्संदेह उनके पूर्ववर्ती अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों के चिर परिचित आचरण अर्थात एक पक्षीय और सुपिरियरटी काम्प्लेक्स वाले रवैये के अनुरूप ही होगी.. यदि ओबामा प्रशासनिक नजरिये के आत्म परिक्षण के साथ साथ मानवता, विश्व बंधुत्व, नस्लीय समानता के आधार पर आत्म परिक्षण का संकल्प कर रहे होंगे तो निश्चित ही वे सम्पूर्ण विश्व मे लीक से हटे हुए और सर्व स्वीकार्य अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में पीढ़ियों तक जाने पहचाने जाते रहेंगे.

बराक ओबामा को आत्म परिक्षण का कार्य इस सोच से प्रारंभ करना होगा कि किसी भी धर्म के प्रार्थना घर में घुस कर अंधाधुंध फायरिंग करना और अमानुषिक ढंग से पैशाचिक हत्याकांड करना कोई अचानक की गई या हो गई घटना नहीं है. वस्तुतः ९.११ के बाद से अमेरिका का राष्ट्र्वत आचरण, अमेरिकी के स्थानिक समाज का सामाजिक आचरण और अमेरिकियों का व्यक्तिशःआचरण तीनों में ही आमूल चूल परिवर्तन आया है. अमेरिका में बसे सिक्खों का कहना है कि उन्हें इस प्रकार के किसी घटनाक्रम या दुर्घटना की ९.११ के बाद निरंतर आशंका थी. अमेरिकियों को सिक्खों और तालिबानों में अंतर की पहचान न कर पाने से वहाँ सिक्खों और स्थानीयों के मध्य कई छोटी मोटी दुर्घटनाएं और परस्पर संघर्ष सतत होते रहे है. ओबामा प्रशासन को इस बात का आत्म परिक्षण भी करना होगा कि एक राष्ट्र और विश्व के स्वयम्भू नेता राष्ट्र का जिस प्रकार का आचरण वह करता चला आ रहा है उसके अंतर्गत ९.११ और २६.११ के हमलों में अंतर भी नहीं किया जाना चाहिए.

इतिहास इस बात का सदा गवाह रहेगा कि अमेरिका ने ९.११ के हमलों के बाद जिस प्रकार के सुरक्षा मानक स्वयं पर लागू किये उसका शतांश भी अन्य देशों के मामलो में लागू होता वह नहीं देखना चाहता. अमेरिका को अपने उस आचरण पर भी आत्म परिक्षण करना चाहिए जिसमें वह अमेरिकी नागरिक के प्राणों को दूसरे किसी भी अन्य समुदाय के प्राणों से अधिक कीमती मानता रहा है.

किन्तु त्वरित खेद इस बात का है कि अमेरिकी प्रशासन कहीं से भी अपने राष्ट्रपति की आत्म परिक्षण वाली बात को चरितार्थ करता नहीं दिख रहा है और कम से कम अमेरिकी खफिया एजेंसी एफ बी आई तो बिलकुल ही नहीं. इस हमलावर के शारीर पर ९.११ का टेटू लगा हुआ था और प्रारंभिक जांच या स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह व्यक्ति कुंठित नवनाजीवादी कार्यकर्ता था फिर भी एफ बी आई इसे नस्लीय हिंसा या नरसंहार न मानते हुए क्या सिद्ध करना चाहती है? ये किस प्रकार का आत्म परीक्षण है??

अमेरिका को यह बात ध्यान में लाने के लिए भी भारतीय नेतृत्व और विदेश मंत्रालय को तैयार रहना चाहिए कि सिक्ख समुदाय एक वीर, जुझारू  और उद्द्यम शील समाज है इसकी रगो में महाराजा रणजीत सिंह का रक्त दौडता है. नई दिल्ली द्वारा अमेरिका को यह भी बताना चाहिए कि सिक्ख समुदाय की अस्मिता, आन, बान,शान पर और स्वाभिमान पर किसी भी प्रकार की चोट आने पर वह चुप नहीं बैठेगी. अभी जिस प्रकार का रस्मी विरोध प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह, वाशिंगटन में राजदूत निरुपमाराव और विदेश मंत्री कृष्णा ने किया है उससे उनका रवैया औपचारिकता निभाने भर का लगता है. दिल्ली का यह आचरण आक्रामक कम सुरक्षात्मक अधिक प्रतीत होता है. दिल्ली क्यों भारतीय मूल के नागरिकों के अधिकारों लिए वैसा रुख अख्तियार नहीं करती जैसा अमेरिका, ब्रिटेन या जर्मनी आदि राष्ट्र करते है. भारत क्यों इस हमले का कूटनीतिक उपयोग नहीं कर रहा है? भारतीय विदेश मंत्रालय इस मुद्दे के मंच से ९.११ और २६.११ के अंतर की बात विश्व मंच पर क्यों नहीं उठा रहा है?? यह पक्ष विचारणीय है.

हमले से बुरी तरह दुखी वर्ल्ड सिख काउंसिल, अमेरिका रीजन (डब्ल्यूएससीएआर) संगठन के अध्यक्ष सतपालसिंह और जस्टिस फॉर सिक्ख संगठन गुर पतवंत सिंग की यह बात बिलकुल ठीक लगती है कि अमेरिकियों में अल्पसंख्यकों की समझ बढाने के लिए जागरूकता फैलाई जानी चाहिए. इस अतिविकसित, धनाड्य किन्तु शुद्ध आत्ममुग्ध व आत्मकेंद्रित अमेरिकी समाज को समझना होगा कि ९.११ के बाद सभी अन्य समुदायों से डरना या उन्हें शंका की नजर से देखना समस्या का समाधान नहीं है. समाधान इस बात में है कि वह विश्व बंधुत्व की भावना से काम ले और त्वरित समाधान इस बात में भी है कि वह सिक्खों और तालिबानों में अंतर को भली भांति समझ ले. सिक्खों के अमेरिका स्थित समाज को भी चाहिए कि वह अपनी पृष्ठ भूमि, इतिहास और कर्म भूमि से प्रेम के अध्यायों से अमेरिकियों को परिचित कराये और भारत वंश का नाम ऊंचा करे. 

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