।।-धीरज भारद्वाज।।
भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले ‘ सर ‘ शोभा सिंह के नाम पर नई दिल्ली के विंडसर प्लेस का नामकरण करने की दिल्ली और केंद्र सरकार की कोशिशों के विरुद्ध मीडिया दरबार की मुहिम पर अभूतपूर्व रिस्पॉन्स मिल रहा है। देश भर से लोगों की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ इस वेबसाइट पर बल्कि फेसबुक, ऑरकुट व गूगल प्लस पर भी बड़ी तादाद में आ रही हैं। हजारों लोग हर दिन इन लेखों के तथा उनपर हुई टिप्पणियों को पसंद कर रहे हैं और खुद ही इसे विभिन्न संचार माध्यमों पर प्रचारित कर रहे हैं।
जहां इस सीरीज़ के प्रकाशित होने से आम पाठक सर शोभा सिंह के लिए अपमानजनक टिप्पणियां कर रहा है, वहीं कई ऐसे भी हैं जो खुशवंत सिंह तथा उनके पिता को पाक-साफ ठहरा रहे हैं।
क्योंकि खुशवंत सिंह ने अपने कॉलम में यह दावा किया है कि नई दिल्ली सिख बिल्डरों को उनका कर्ज़ नहीं चुका रही है, इसलिए हमने कुछ नामचीन सिख हस्तियों से इस मसले पर बात की।
कांग्रेस नेता मनिंदर जीत सिंह बिट्टा ने दिल्ली सरकार के इस कदम को बेहद अफसोस-जनक और गैर जरूरी करार दिया। उन्होंने मीडिया दरबार से बातचीत करते हुए कहा कि वे ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे और सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करेंगे। बिट्टा ने कहा कि विंडसर प्लेस से उन्हें खास लगाव है क्योंकि उसी चौराहे पर उनपर हमला हुआ था।
शहीद भगत सिंह सेवा दल के अध्यक्ष व दिल्ली के निगम पार्षद जीतेंद्र सिंह शंटी ने भी सरकार के इस कदम का विरोध किया है। उन्होंने बताया कि
जल्दी ही उनका सेवा दल विंडसर प्लेस और संसद पर धरना देने की तैयारी कर रहा है।
उधर कुछ हस्तियां ऐसी भी हैं जो इतिहास को सिरे से नकारने मं लगी हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटि के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने
कहा कि उन्होंने पूरा इतिहास खंगाल लिया है, लेकिन इस तथ्य में कोई दम नही मिला कि शोभा सिह ने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। हालांकि उन्होंने मीडिया दरबार को यह भरोसा दिलाया कि जैसे ही उन्हें ठोस सुबूत मिल जाएंगे, वह भी इस मुहिम में खुल कर साथ देंगे। यह अलग बात है कि बार-बार संपर्क करने और इतिहास की किताबों के सदर्भ देने के बावजूद सरना ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
दिलचस्प बात यह है कि खुद खुशवंत सिंह ने कुबूल किया है कि उनके पिता ने भगत सिंह के किलाफ गवाही दी थी। उन्होंने यह स्वीकारोक्ति 1997 में मचे ऐसे ही हंगामे के बाद अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की एक प्रशनोत्तरी में की थी। यह स्वीकारोक्ति 13 अक्तूबर सन् 1997 के अंक में छपी थी। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए सवाल-जवाब का हिंदी अनुवाद भी साथ ही प्रकाशित किया जा रहा है:-
Did you know about the existence of records where your father deposed against Bhagat Singh?
(क्या आपको उन दस्तावेज़ों का पता था जिनके मुताबिक आपके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी?)
Of course, I knew.It was an open trial.
(निस्संदेह, मुझे पता था। यह एक खुला मुकद्दमा था।)
Were you aware of these events as they unfolded?
(क्या जो बातें सामने आईं उनका आपको पता था ?)
All this was published openly in the papers.
(यह सबकुछ खुलेआम अखबारों में छप चुका था।)
Did you ever ask your father about it?
(कभी आपने अपने पिता से इस बारे में पूछा था?)
After he came back from the assembly, all that was discussed was the bomb-throwing incident. Of course, at that point he did not know who the two boys were.
(जब वो असेंबली से वापस आए थे तो बम फेंके जाने की खूब चर्चा हुई थी। यकीनन, वे उस वक्त उन लड़कों को नहीं पहचानते थे।)
What was the exact sequence of events?
(उस वक्त क्या घटनाक्रम हुए थे?)
My father, Sir Shobha Singh, was in the visitor’s gallery when the bombs were thrown. He was asked to identify the two men, which is what he did. BhagatSingh pleaded guilty so what could my father do? Anyway they were sentenced for killing Saunders, not for this incident.
(जब बम फेंका गया था उस वक्त मेरे पिता सर शोभा सिंह दर्शक दीर्घा में थे। उन्हें दो लोगों की शिनाख्तकरने को कहा गया था, जो उन्होंने कर दिया। भगत सिंह को दोषी छहराया गया तो इसमें मेरे पिता क्या कर सकते थे? बहरहाल, उन्हें सॉन्डर्स को गोली मारने के लिए फांसी हुई थी, इस घटना के लिए नहीं।)
Did your father in his later years feel any regret about his testimony?
(क्या आपके पिता ने बाद में कभी अपनी गवाही पर अफसोस जताया था?)
There was national regret when Bhagat Singh was hanged. He’d become a hero by then.
(जब भगत सिंह को फांसी लगी थी तो यह राष्ट्रीय शोक था। वह उस समय तक एक नायक बन चुका था।)
Being a British contractor, do you think your father was anti-nationalist?
(एक ब्रितानी ठेकेदार होने के कारण क्या आपको अपने पिता कभी राष्ट्रीयता के विरोधी लगे?)
He was not only a British contractor, he was also the biggest contractor in Delhi.
(वे न सिर्फ एक ब्रितानी ठेकेदार थे, बल्कि वे सबसे बड़े ठेकेदार भी थे।)
Are you angry/embarrassed by what your father did?
(क्या आप अपने पिता के कृत्यों से नाराज़/ शर्मिंदा हैं?)
At that time, we did not feel anything about it. He had only identified them. To insinuate that he got his knighthood for this is rubbish. He was knighted 15 years later.
(उस वक्त हमने इस बारे में कुछ नहीं सोचा था। उन्होंने सिर्फ उनकी (भगत सिंह और राजगुरु) शिनाख्त की थी। कोई अगर ये माने कि उन्हें इसीलिए उपाधि मिली थी, तो यह बकवास है। उन्हें उपाधि (मुकद्दमें के) पंद्रह सालों बाद मिली थी।)
Why do you feel the controversy has been dug up now?
(आपको ऐसा क्यों लगता है कि विवाद को अभी उभारा जा रहा है?)
This entire thing is aimed at me. My father died a long time ago, so it doesn’t affect him. This is at the instigation of the saffron brigade.
(यह सभी कुछ मुझपर निशाना साध कर किया जा रहा है। मेरे पिता की मौत बरसों पहले हो चुकी है, इसलिए उनपर तो कोई फर्क पड़ता नहीं है। यह भगवा ब्रिगेड के बढ़ावे पर हुआ है।)
And your reaction to the timing?
(और इस टाइमिंग पर आपकी प्रतिक्रिया?)
My writing’s become more and more anti-saffron brigade. I’d written a strong piece when the chargesheet was filed in the Babri Masjid case and this story appeared four days later.
(मेरा लेखन भगवा ब्रिगेड के खिलाफ अधिक से अधिक मुखर हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्ज़िद मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ था उस दिन मैंने एक कड़ा लेख लिखा था। यह कहानी उसके चार दिनों बाद सामने आई।)
What do you think of Bhagat Singh?
(भगत सिंह के बारे में आप क्या सोचते हैं?)
I thought very highly of Bhagat Singh. I even managed to get his autograph when he was in jail.
(मेरे मन में भगत सिंह के लिए बहुत सम्मान है। मैं तो उनके जेल में रहने के दैरान उनका ऑटोग्राफ भी लेने में कामयाब हो गया था।)
हालांकि खुशवंत सिंह और उनके परिवार के शुभचिंतक इसके बावजूद सर शोभा सिंह का नाम अमर कर देने की सरकारी कवायद का समर्थन करने से नहीं चूक रहे। पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल यह तो मानते हैं कि शोभा सिंह ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी जो राष्ट्रीयता के विरुद्ध था, लेकिन उन्हें विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने में कोई बुराई नहीं दिखती। मीडिया दरबार ने जब गिल से पूछा कि क्या वो इस नामकरण के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को अपना समर्थन देंगे..? तो उनका जवाब खासा चौंकाने वाला था। केपीएस गिल ने अपनी बुलंद आवाज में कहा, “जब दिल्ली में गुलामी का प्रतीक औरंगजेब रोड मौजूद है, तो फिर शोभा सिंह के नाम में क्या बुराई है? आप औरंगजेब रोड का नाम बदलवा कर आइए, फिर मैं आपके साथ खड़ा मिलूंगा।”





May 5, 2012 at 6:18 am
ऐसे लोगों को तो गोली मार देनी चाहिए,
इस देश की जनता कायर है, खुशवंत सिंह अपने बाप की इतनी बड़ाई हांक चूका और भगत सिंह की बुरे कर चूका तो तो उसे इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं …………
October 14, 2011 at 10:59 pm
shobha singh ke naam pe rakhne ki bajaye sarhad pe marne wale jawano ke naam per rakho taki ane wali pidhi deshbhagat bane
July 30, 2011 at 5:24 pm
के पी एस गिल साहब तो अपना अफीम का अन्टा खाकर बेहोश रहते है ! गिल साहब तो अफीमची है , उनकी बात का क्या बुरा मानना !
जय हिंद
July 26, 2011 at 8:39 pm
shame..shame……..
July 26, 2011 at 8:37 pm
shame….shame……
July 24, 2011 at 3:31 pm
K. P. Gill commented quite rightly so and shouldn’t be taken in lighter vain. It has greater meaning.
July 24, 2011 at 2:15 pm
गद्दारोँ को महिमा मँडन करने तथा कुत्सित लेखन के लिये कुख्यात किसी उपाधि और धन के लोभी . , . . . . . से क्या उम्मीद करते हैँ ? नाम शोभा काम कलँकी . . . . मौन मोहन तो बेचारगी का नाम हैं ।
July 24, 2011 at 11:10 am
lagta hai Manmohan Singh ka adarsh yahi khuuswant singh ka baap hai…yeh bhi sirf file par sign karta hai, dekhta hai paisa chori ho raha hai….ab woh ghotala hai yeh nahi pata chal pata bechaare ko….vaise hi is SIR ko pata nahi tha ki unhein fansi par chada diyia jayega….bahut naadan tha bechara….bas jab SIR ki updhi de di to aankhein khul gayi, uska pata chal gaya.
July 23, 2011 at 11:39 am
sir ji,
ye to rashtriya sharm ki baat hai, hai ki sarkar shaheed bhagat singh ke pariwar our anya shaheedo ke pariwaro ke liye to kuch nahi karti our shobha singh urf “jaichand” ke liye pagal hui padi hai,kya kare aaj fir es desh mai raaj ek vedeshi ka hai, or ek or shobha singh (manmohan singh)
“sir” ki upadhi paane ke liye unski har baat pe aadab baja raha hai.
July 22, 2011 at 11:32 am
‘सर’ अबे कुत्त्या तेरा बाप उस दिन तू झूठ बोल देता तो सारा देश उस पर फक्कर करता क्यूंकि किसी के भले के लिए बोला झूठ बहुत बड़ा सच कहलाता है और तेरे बाप के उस दिन बोले झूठ से तो पुर देश का भला होता फिर तेरे बाप नाम लोगो के दिलो पर लिखा होता अब तो तेरे बाप का नाम जी. बी. रोड के किसी कोठे पर लिखवाना चाहिए
July 22, 2011 at 11:27 pm
Very good Comment
July 21, 2011 at 7:21 pm
यह बात मुझे सुखद लगती है कि प्रारंभिक आनाकानी के बाद अंततः खुशवंत सिंह इस बात को स्वीकारते हैं उनके पिता ने ही भगत सिंह की शिनाख्त की थी. मैं व्यक्तिगत रूप में खुशवंत सिंह का बेहद आदर करता हूँ क्यों कि उन्होंने Train to Pakistan ओर Delhi जैसी कालजयी पुस्तकें लिखी हैं. वे मेरे आगे देश के अग्रणी बुद्धिजीवियों में से एक हैं अतः मैं समझता हूँ कि उन्हें आम जनता की भावना की कद्र कर के इस सुझाव से हट जाना चाहिए कि कोई जगह उनके पिता के नाम से रखी जाए. इस से मेरे और देशवासियों के मन में उनके प्रति आदर बढ़ जाएगा और इस का मतलब यह भी नहीं होगा कि वे अपने पिता के प्रति उनके समस्त जीवन काल की संवेदनाओं को झुठला रहे हैं.
July 20, 2011 at 7:42 pm
क्रांतिकारी अपने होठ सी कर अँग्रेज़ का अत्याचार सहन कर शहीद हो गये,मिट्टी में मिल गये, गद्दार होठ खोलकर SIR हो गये,लोगों के सर कुचलने वालों के साथी बन गये,उस गंदे,ज़हरीले खून से पनपे सपोलिए भी बेशर्मी दिखा रहें हैं, गद्दार बाप के नाम से पवित्तर भूमि के टुकड़े का नामकरण करवा रहें हैं|उस शोभा सिंह के नाम पर शौचलया का नाम रख दें तो भी शहीदों को श्रधांजली नहीं दी जा सकती|केंद्र सरकार को भी लानत है|
July 20, 2011 at 12:50 am
आप लोगों द्वारा किया जा रहा प्रयास सराहनीय है . परन्तु इस अंधे बहरे भारत देश में होनेवाला कुछ भी नहीं है. जिस का जीता जागता उदहारण है अन्ना हजारे की लोक पाल बिल मुहीम .कभी -कभी सोचता हूँ की आप लोग अंधों के गाँव में सांप दिखा रहे हैं, बहारों के गाँव में ढोल बजा रहे हैं ऐसे लोगों के लिए महारिषी महेश योगी कह करते थे की सोते हुए को जगाया जा सकता है लेकिन जागते को कभी भी जगाया नहीं जा सकता . जय हिंद
July 19, 2011 at 10:22 pm
Lo Ek aur Gaddar sala aa gaya
July 19, 2011 at 10:03 pm
sahji he apke pitaji ki koi galti hani he galti to shideajm bhagat singh ki he jo vo ham hindostaniyo or hamare desh ke liye lade or sahid ho gye sahi he kash me bhi unke jese sahid ho pata me re leye vo bhagvan ki trha he or jab bhi es desh ko jarurat padi me hamesha bina kici jijak ke sahid hone ko tyar hu par apke pita sahi the glat to ham jese divane hote he jo bina ek pal ruke apne desh pe sahid hone ko tyar he jai hind jai bhagat singh vandematrm
July 19, 2011 at 7:44 pm
मैं खुशवंत सिंह के बारे में बड़ा अच्छा सोचता था। उनके पिता सर शोभा सिंह ने एक बार भी नहीं सोचा कि उनकी निशानदेही पर देशभक्त बच्चों की जान चली जाएगी। एक चाटूकार से और उम्मीद हीं क्या की जा सकती है? सर की पदवी जादा प्यारी लगी उनको। कूर्सी के लालच में आजकल मनमोहन सर भी मौन मोहन सिंह बन गये हैं।और दिग्विजय सिंह की बदतमीजओं को नजरअंदाज कर रहें हैं। आज आम आदमी के आक्रोश और दुख की कोई सीमा नहीं है… ।
July 19, 2011 at 7:25 pm
dekhea sir ji,
windsor park ka naam sir shobha singh ke naam per, jai chand key naam per parliament house,shakuni ke naam per laal kila,our her us deshdrohi,adharmi jin ki vajhe se hum hindustanio ne barso gulami ki jindgi jee, kee yaad me rakhna chahia,kyoki woh to kehne ki baten reh gai
“shahidon ki yaad mein lagege sadio mele”
“watan ki raah per mur gujrane waalo ka bake bus yehi nishan hoga”
July 19, 2011 at 6:50 pm
Gaddaron ko Samman nahi milna Chahia. Turncoat should never be awarded, they deserve nothing but insult. I hate all the greedy flatterer of The English Govt. I love and respect all the “SHAHEED AND PATRIOTS”.
JAI HIND.
July 19, 2011 at 6:40 pm
देश के आज़ाद होने के बाद आज़ादी का फायेदा केवल गद्दारों को ही मिला हैं, देश के लिए कुर्बानी देने वाले देश भक्तों को नहीं .
July 19, 2011 at 6:28 pm
lekin jab aapke pitaji ne shinakht ki tab unhe ye nehi pata tha kya ki jo kaam shahid bhagat singh ne kiya he wo kewal ek deshbhakt or krantikari hi angrejo ke khilaf kar sakta he koi deshddrohi nahi.fir bhi unhe shinakht karne ki kya jarurat thi?
July 19, 2011 at 5:15 pm
अगर ऐसा हुआ तो वह दिन दूर नहीं है जब देश के लिए जान देने वाले बीर जवानो की कमी हों जाएगी क्योकि उस ज़माने में दलालों की संख्या तो काम थी आज तो अथाह समुद्र है…एक माँ का आँचल खाली होगा, उसके दूध सुख जायेंगे, जीवन भर वह तड़प तड़प कर अपने मौत का इंतजार करेगी और इसका भी फायदा उठाकर आज के राज नेता या दलाल अपना उल्लू सीधा करेंगे जैसा कारगिल घटना के बाद हुआ
July 19, 2011 at 12:32 pm
खुशवंत जी की इस स्वीकारोक्ति के बाद साफ है कि उनके मरहूम पिता अंग्रेजों के दलाल और देश के गद्दार थे….
July 19, 2011 at 12:13 pm
देखिये सरना जी के अपने राजनीति और धार्मिक हित है..परमाणु करार पर विश्वास प्रस्ताव के वक्त आकाली मनमोहन के साथ केवल इसलिये थे क्योकि वो एक सिंख है..। इसे धार्मिक अतिवाद कहेगें जो भारत से पहले खालिस्तान को मानें और आप्रेशन ब्लू स्टार करवाने वाली कांग्रेस से पहले एक सिंह पीएम को…दोनो गलत है। और जहां तक बात रही खुशंवत सिंह , शोभा सिंह की तो…शासन चाहे गोरे अंग्रेजों का हो या काले बाबुओं का…चाटुकार ही विकास करते है। बिट्रेन की हुकूमत में सर की उपाधी पाना, दिल्ली के 12 गांव को उजाड़कर, चंद अग्रेजो के घर बनाने का काम…चाटुकार ही कर सकते है..सच्चा सरदार नहीं क्योकि सिहं को गुरु गोविंद के शब्दो में “दिन के हेत ” लड़ने वाला होता है..विदेशियों के मकान बनाने वाला नहीं…हालाकि भगत सिंह को उनकी गवाही के वज़ह से फांसी नहीं हुई थी, ब्लकि भगत को खुद ही समर्पण करना चहाते थे, आज भी सीपी में ट्रेफिक जाम नहीं लगता, भवन कला अच्छी है…वो अच्छे भवन निर्माता हो सकते है पर सच्चे भारतीये नहीं..