11 सितम्बर हमले की बरसी पर उपजे कुछ सवाल

11 सितम्बर हमले की बरसी पर उपजे कुछ सवाल

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-सुनील कुमार॥

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार बन गई है और उसके चेहरों को देखकर अमेरिका सहित बहुत से देश तनाव में होंगे क्योंकि कुछ चेहरे अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी हैं। यह भी एक बड़ी अजीब बात है कि जिस 11 सितंबर की बरसी अमेरिका में बड़ी तकलीफ के साथ हर बरस मनाई जाती है, उसके ठीक पहले अफगानिस्तान में ऐसी सरकार बन रही है। न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो आसमान छूती इमारतों को बिन लादेन के विमानों ने 11 सितंबर को ही ध्वस्त किया था, अमेरिकी मीडिया इस बरस उसे कुछ अधिक याद कर रहा है क्योंकि अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान को 20 बरस बाद उसी हालत में छोडक़र एक शर्मनाक हार झेलकर लौटी हैं और थकान उतार रही हैं। ऐसे में अमेरिकी मीडिया 2001 के 11 सितंबर के उस हमले को हर किस्म से याद करने की कोशिश कर रहा है, और उसमें कुछ ऐसे परिवार हैं जिन्हें वह हर बरस खबरों में लाता है, क्योंकि उनमें ऐसे बच्चे हैं जो उस हमले के तुरंत बाद पैदा हुए थे। अमेरिका में ऐसे बच्चों का एक पूरा समुदाय है जिन्होंने वल्र्ड ट्रेड सेंटर के उस हमले में अपने मां-बाप को खोया था। ऐसे करीब 3000 बच्चों की एक फेहरिस्त है जिनके पास उस भयानक हमले की याद है, और जख्म हैं। ऐसे ही पश्चिमी मीडिया को देखते हुए आज लंदन के अखबार गार्डियन के पॉडकास्ट में दो पॉडकास्ट ऊपर-नीचे देखने मिले, और इस वजह से उन दोनों पर एक साथ कुछ सोचने का मौका भी मिला। एक पॉडकास्ट 11 सितंबर के उस हमले के बाद बचे बच्चों के बारे में है, और दूसरा फिलिस्तीन के गाजा में इस्राएली हमले के तुरंत पहले 1 घंटे में इमारत छोडक़र निकलने वाले लोगों के बारे में है, जिनमें बच्चे चाहे कम रहे हों लेकिन फिलिस्तीनी बच्चों के मां-बाप तो वहां थे, और कुछ महीने पहले के इस इजरायली हमले में सैकड़ों मौतें भी फिलीस्तीन ने झेली हैं।

पश्चिमी मीडिया को देखें, और क्योंकि हिंदुस्तान जैसे देश में अधिकतर वही मीडिया हासिल है, इसलिए उस पर आई हुई तस्वीरें, खबरें, और वीडियो देखें तो लगता है कि 11 सितंबर से अधिक बड़ी त्रासदी इस दुनिया में और कोई नहीं हुई। यह सही है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के लिए उससे बड़ी शर्मिंदगी और कोई नहीं हुई, किसी आतंकी का किया उससे बड़ा आतंकी हमला और कोई नहीं हुआ, लेकिन जब हम अमेरिका पर हुए इस हमले के तुरंत बाद अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों पर अमेरिकी फौजियों के अंधाधुंध हमलों को देखें, और उनमें लाखों मौतों को देखें जिनमें मरने वाले अधिकतर बेकसूर नागरिक थे, जिनमें बराबरी से औरत और बच्चे थे, आबादी में बसे हुए लोग थे, शादी के जलसे में इकट्ठा एक साथ मारे जाने वाले दर्जनों लोग थे, तो फिर यह लगता है कि क्या पश्चिम का दर्द दर्द है, और इराक अफगानिस्तान जैसे देशों का दर्द दर्द नहीं है? आज जब न्यूयॉर्क के हमले में मां-बाप खोने वाले बच्चों से एक-एक करके बात की जा रही है, तो क्या उसी वक्त अमेरिका यह सोचने की जहमत भी उठाएगा कि उसकी फौज ने इराक और अफगानिस्तान में कितने बच्चों को मारा है, वे कितने लाख थे, उनके मां-बाप कितने लाख थे? क्या बमों को बरसाने के पहले यह देखा गया था कि उसमें कितने बेकसूर लोगों के मारे जाने का खतरा था? जिस तरह बिन लादेन के कहे जाने वाले विमानों ने जाकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारतों को खत्म कर दिया था, और कुछ हजार लोगों को मार दिया था, उतनी-उतनी मौतों वाले कितने हफ्ते इन 20 वर्षों में इराक और अफगानिस्तान ने झेले हैं?

और वह तो फिर एक धर्मांध और कट्टर आतंकी बिन लादेन था, लेकिन यह तो दुनिया का सबसे ताकतवर और बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरने वाला अमेरिका था जिसकी फौज ने संसद में मुनादी के बाद, राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद जाकर यह हमले किए थे ! आज जब अमेरिकी फौजों के सीधे हमलों के अलावा इजराइल जैसी ताकतें अमरीकी शह पर फिलिस्तीन की जमीन पर अवैध कब्जा करते हुए, फिलिस्तीनियों को बेदखल करते हुए, उन पर बम भी बरसाती हैं, और उन्हें अमेरिकी फौजियों का सहारा रहता है, अमेरिकी राष्ट्रपति के वीटो का सहारा रहता है, संयुक्त राष्ट्र के सारे प्रतिबंध और आदेश अमेरिकी बुलडोजर कुचल देते हैं, और इजराइल को खुला हाथ देते हैं। इजराइली बमबारी में गिरने वाली फिलिस्तीनी इमारतें, और उनमें मारे जाने वाले हजारों लोग, और खंडहर में तब्दील कर दिया गया एक देश, यह सब मिलकर भी 11 सितंबर के इस मौके पर सवाल बनकर खड़े होते हैं, कि बिन लादेन तो घोषित आतंकी था, लेकिन फिलिस्तीन पर बम बरसाने वाले इजराइली और उसकी पीठ पर हाथ धरकर खड़े हुए अमेरिकी तो अपने आपको लोकतांत्रिक देश करार देते हैं, फिर लादेन और अमेरिका-इजराइल के तौर-तरीकों में कोई फर्क क्यों नहीं है?

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का बनना और 11 सितंबर की बरसी का आना, अमेरिकी फौजों की वापिसी और फिलिस्तीन पर जारी इजरायली हमलों को मिलाकर अगर देखें तो लगता है कि दुनिया में कुछ देश बिन लादेन से भी बड़े आतंकी हैं, जिनमें अमेरिका और इजरायल ऐसे हैं जो कि संयुक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के काबू से भी बाहर हैं, और जिन्हें इंसानियत छू भी नहीं गई है, फिर भी उन्हें संयुक्त राष्ट्र आतंकी करार नहीं दे सकता। अमेरिकी सरगनाई में दूसरे पश्चिमी देशों की फौजों ने जिस तरह इराक और अफगानिस्तान पर हमले किए और जितने लाख बेकसूर नागरिकों को वहां पर मारा, और जिस तरह ब्रिटिश फौजी इस दौर में अफगानिस्तान में बेकसूर नागरिकों को मार-मारकर अपनी फौजी प्रैक्टिस करते रहे, अपने मारे हुए लोगों की उंगलियां काटकर उन्हें इकट्ठा करते रहे, ऐसी तमाम बातों का एक ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण होना चाहिए। तालिबान अपने किस्म के अलग दकियानूसी और कट्टर, धर्मांध और अमानवीय हो सकते हैं, लेकिन अमेरिका और इजराइल ने पिछले दशकों में फिलिस्तीन, इराक, अफगानिस्तान जैसी कई जगहों पर जो किया है, उसे अनदेखा कैसे किया जा सकता है?

गार्डियन के पॉडकास्ट की लिस्ट में इन दो विषयों को ऊपर नीचे देखकर ऐसा लगता है कि दुनिया के ताजा इतिहास को अलग से लिखने की जरूरत भी है। तालिबान का इतिहास तो लिखा जाता रहेगा, लेकिन अभी जरूरत इस बात की है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी कब्जा खत्म होने के बाद कब्जे के इन दो दशकों पर लिखा जाए। चूँकि लिखने वाले अधिकतर लोग पश्चिम के हैं, इसलिए अभी देखा जाए कि हमलावरों के चारण और भाट के जिम्मे यह काम न लगा दिया जाए। दुनिया का यह ताजा इतिहास लिखना जरूरी इसलिए भी है कि बिन लादेन को तो खलनायक साबित करने वाला बहुत बड़ा मीडिया मौजूद था, 20 बरस तक अफगानिस्तान को कुचलने वाला अमेरिका भी खुलासे से दर्ज होता है या नहीं यह देखने की बात है।

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