कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई वफादार नहीं होता

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई वफादार नहीं होता

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-सुनील कुमार॥

जिन लोगों की अफगानिस्तान के ताजा हाल में दिलचस्पी है, और जो अंतरराष्ट्रीय मामलों में विदेश नीति में दिलचस्पी रखते हैं, वे लोग भारत को लेकर हमारी तरह कुछ फिक्रमंद भी हैं कि आज पाकिस्तान और चीन, अफगानिस्तान के तालिबान के एकदम करीब हैं, और हिंदुस्तान अलग-थलग पड़ गया है, क्योंकि यह पिछली अफगान सरकार के साथ इतना अधिक जुड़ा हुआ था कि वह तालिबान से दूर चला गया था। जब पिछले बरस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ एक लिखित समझौता किया था और अमेरिका की फौज को अफगानिस्तान से वापस बुला लेना तय किया था, उस वक्त भी भारत पीछे रह गया। उसने मौके को समझा नहीं और अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्तों को उसने वहां की मौजूदा सरकार के साथ रिश्तों तक सीमित रखा। उसे यह सूझा ही नहीं कि बाकी कई देश तालिबान को सम्भावना मानकर उसके साथ भी रिश्ते बना रहे थे। खैर जो हो गया सो हो गया, अब भारत सरकार ने अफगानिस्तान से बाहर तालिबान से बातचीत शुरू की है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने करीब 10 दिन पहले ही इसी जगह इस बात को लिखा था कि भारत को तालिबान के साथ बात शुरू करनी चाहिए, क्योंकि और कोई रास्ता नहीं है।

जिन लोगों को यह लग रहा है कि पाकिस्तान आज तालिबान के करीब है और इस नाते भारत, पाकिस्तान, चीन के इस तनावपूर्ण त्रिकोण में वह भारत के मुकाबले बेहतर हालत में है, उन्हें तस्वीर के बाकी पहलुओं को भी देखना चाहिए। पाकिस्तान की जमीन पर बरसों से 40 लाख से अधिक अफगान शरणार्थी चले आ रहे हैं। और इसके भी पहले से अमेरिका की मदद के तलबगार पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच मदरसों का जाल बिछाने की इजाजत देनी पड़ी थी, और पाकिस्तान की जमीन पर ही अफगानिस्तान में मौजूद रूसी फौजियों से लडऩे के लिए हथियारबंद दस्ते तैयार हो रहे थे। पाकिस्तान की जमीन पर धर्मांध और कट्टर लड़ाके तैयार करने वाले मदरसों का नुकसान खुद पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अपने लोगों के बीच कम नहीं हुआ है। पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता और धर्मांधता फैलने के पीछे जो वजहें हैं उनमें से एक यह भी है कि उसकी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच अफगान लड़ाके तैयार किए जा रहे थे। इसलिए आज अगर अफगानिस्तान में इस्लामी कट्टरता के साथ अगर कोई सरकार बन रही है और उसका पाकिस्तान से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है, तो यह रिश्ता कोई दौलत नहीं है, यह रिश्ता एक किस्म से एक बोझ भी है।

आज अफगानिस्तान के पास अड़ोस-पड़ोस के देशों को देने के लिए कुछ नहीं है, और उनसे मदद लेने के लिए उसकी जरूरतें अंतहीन हैं। ऐसे में पाकिस्तान और चीन के अलावा ईरान और रूस से भी अफगानिस्तान की तालिबान सरकार की बड़ी उम्मीदें रहेंगी। यह भी समझने की जरूरत है कि संयुक्त राष्ट्र का अंदाज यह है कि अफगानिस्तान में दसियों लाख लोगों के भूखे रहने का एक बहुत बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है। खबरें बताती हैं कि किस तरह आज अफगानिस्तान के लोग वहां की बेरोजगारी, भुखमरी और वहां पर हिंसा के खतरे को देखते हुए पाकिस्तानी सरहद पर इक_ा हैं, और पाकिस्तान के भीतर जाना चाहते हैं, क्योंकि इस जमीन पर पहले के आए हुए अफगान शरणार्थी बसे हुए हैं, और उन्हें धर्म के नाम पर, जुबान के नाम पर, पाकिस्तान में हमदर्दी और सिर छुपाने की जगह मिलने की उम्मीद है। यह नौबत किसी भी देश के लिए एक बहुत बड़ा बोझ रहती है और पाकिस्तान पहले से यह बात कहते आया है कि वह और अधिक अफगान शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता, उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है। फिर एक बात यह भी है कि आज अफगानिस्तान से जो लोग देश छोडक़र पाकिस्तान आ रहे हैं, ऐसे लोगों के बारे में तालिबान सरकार का क्या रुख रहेगा यह भी अभी साफ नहीं है। अमेरिकी सरकार वहां के अपने मददगार रहे जिन लोगों को अफगानिस्तान से ले जाना चाहती थी, उन्हें भी नहीं ले जा पाई है क्योंकि समझौते के तहत 31 अगस्त तक ही अमेरिका को वहां से हट जाना था। एक अंदाज यह है कि पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद करने वाले करीब 3 लाख अफगान ऐसे हैं जिन्हें अमेरिका खतरे में छोडक़र चले गया है, क्योंकि उसके पास भी और कोई चारा नहीं बचा था। इसलिए पाकिस्तान के आज अफगानिस्तान के साथ बहुत ही करीबी रिश्ते से उसे हासिल कम होना है, इन रिश्तों का बोझ ही उस पर अधिक रहेगा। आज पाकिस्तान की अपनी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वह अफगानिस्तान की किसी तरह से मदद कर सके। चीन और रूस जैसे दो बड़े और सक्षम देशों को अफगानिस्तान की जो मदद करनी होगी वह वहां की तालिबान सरकार को वे सीधे देना चाहेंगे, उसमें पाकिस्तान कहीं तस्वीर में नहीं आता है। इसलिए 15 लाख शरणार्थियों की संख्या और अगर बढ़ती चली जाती है तो यह पाकिस्तान पर बड़ी तकलीफ की बात रहेगी।

इसलिए अफगानिस्तान से जुड़े हुए अलग-अलग देशों के बारे में आज जो खबरें आ रही हैं, वे उन्हें अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार के साथ बड़े गहरे रिश्ते वाली बतला रही हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इन तमाम देशों के साथ अपनी घरेलू दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनके चलते हुए तालिबान के साथ बेहतर रिश्ते रखना इनकी मजबूरी भी है। चीन के भीतर उईगर मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो कि चीन की सरकार से बहुत बुरी तरह प्रताडि़त है। चीन पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वह इन मुस्लिम समुदायों के लोगों को बहुत बुरी हालत में रखता है, उनके मानवाधिकार कुचलता है। ऐसे में इस्लामी राज कायम करने वाले तालिबान पर यह नैतिक बोझ भी रहेगा कि वह चीन में मौजूद बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिम क़ैदियों के बारे में क्या करता है, क्या रुख रखता है। इसलिए भी चीन तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है कि कहीं अफगान जमीन से चीन के खिलाफ ऐसी बगावत खड़ी ना होने लगे जो कि चीन में मौजूद उईगर मुस्लिमों को आतंकी बनाने का काम करे। दूसरी तरफ रूस में 50 लाख से अधिक मुस्लिम रहते हैं और उसकी दिक्कत यह है कि वह अपनी इस बड़ी मुस्लिम आबादी के बीच किसी किस्म की राजनीतिक बेचैनी या बगावत देखना नहीं चाहता। अगर पड़ोस के अफगानिस्तान के मुस्लिम हथियारबंद लोगों के हाथों अमेरिका के हार जाने का कोई असर रूस में बसे हुए मुस्लिम समुदाय पर होगा, तो उनके भीतर एक अलग राजनीतिक चेतना आ सकती है, उनमें से कुछ बागी तेवरों वाले भी हो सकते हैं। इसलिए रूस की अपनी जरूरत यह है कि अफगानिस्तान की जमीन से कोई ऐसे हथियारबंद भडक़ाऊ या उकसाऊ काम न हों जो कि रूस में मुस्लिम लोगों को भडक़ायें।

खुद पाकिस्तान आज ऐसी नौबत में खड़ा हुआ है कि अफगान जमीन से पाकिस्तान के कई आतंकी समूहों को मदद मिल रही है, और इस बात को पाकिस्तान ने अभी-अभी औपचारिक रूप से तालिबान के सामने रखा भी है। पाकिस्तान में मौजूद तालिबान समूहों को लेकर अभी अफगान-तालिबान ने यह साफ भी कर दिया है कि उनसे अफगान-तालिबान का कोई लेना देना नहीं है। इसलिए रूस, पाकिस्तान और चीन, इनके बारे में सीधे-सीधे ऐसा मान लेना ठीक नहीं होगा कि इन तीनों ने अमेरिका का विरोध करने के लिए अफगान-तालिबान का साथ दिया है, और आगे देते रहेंगे। इन सबकी घरेलू मजबूरियां भी हैं, जिनके चलते ये तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहते हैं। भारत की जो सरकार तालिबान को आतंकी मानती थी उसने रातों-रात एक तीसरे देश में तालिबान से औपचारिक राजनयिक बैठक की है, और संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए तालिबान को आतंकियों की एक सूची से बाहर भी करवाया है। ऐसा इसलिए भी है कि भारत पर एक खतरा यह है कि कश्मीर में तालिबान समर्थित समूह आतंकी वारदात कर सकते हैं और भारत तालिबान को कश्मीर को महज एक मुस्लिम मुद्दा मानकर उसमें दखल देने से दूर रखना चाहता है। आज हिंदुस्तान में भारत सरकार के तालिबान से बैठक करने के बारे में व्यंग्य से काफी कुछ लिखा जा रहा है। ऐसा लिखा हुआ पढक़र ही हम इस मुद्दे पर लिखने की सोच रहे थे कि विदेश नीति के मामलों को और देश के राष्ट्रीय हित के मामलों का अतिसरलीकरण, नहीं करना चाहिए। एशिया के इस पूरे हिस्से के जो मिले-जुले हित हैं या जो मिले-जुले खतरे हैं, उनको भी देखते हुए बाकी देश तालिबान के साथ तालमेल बिठाने में लगे हुए हैं, और बदले हुए इस हालात में खुद तालिबान ने यह कहा है कि वह अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय देशों के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है। वह चाहता है कि अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद, अमेरिका और यूरोप के देश लौटें, और तालिबान को अफगानिस्तान बेहतर बनाने में मदद करें। लोगों को यह बात भी कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत यही रहती है कि तालिबान का राज्य अफगानिस्तान में एक आतंकी राज्य न बन सके, और वह लोकतंत्र के जितने करीब लाया जा सके, उसके लिए दुनिया के देशों को तालिबान से अपना पुराना परहेज छोडक़र उससे बातचीत करनी ही होगी, जो कि भारत ने भी शुरू कर दी है। भारत के इस बातचीत शुरू करने के 10 दिन पहले हमने इस बात का सुझाव दिया भी था। आगे-आगे देखना है कि क्या होता है।

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