आज़ादी और समानता के अधिकार पर जबर्दस्त प्रहार

आज़ादी और समानता के अधिकार पर जबर्दस्त प्रहार

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एक ओर तो हम सम्प्रभु राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हर तरह के अधिकार सुनिश्चित करने वाली देश की आजादी की अगले साल 75वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं और इसे यादगार अवसर मानकर केन्द्र सरकार भी अमृत महोत्सव की भव्य पैमाने पर तैयारियां कर रही है; वहीं दूसरी तरफ यह भी विडम्बना है कि भारत के नागरिकों की धार्मिक आजादी और समानता के अधिकार पर जबर्दस्त प्रहार किये जा रहे हैं। सरकार का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह नागरिकों के हर तरह के अधिकारों की रक्षा करे लेकिन यहां उल्टी गंगा बह रही है। केन्द्र सरकार और उस पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के ही प्रश्रय में नागरिकों के इन बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिये यह बेहद दुखद और खतरनाक संकेत है क्योंकि हमारा देश विविधताओं से भरा समाज है। यहां अलग-अलग धर्म, जातियों एवं सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। अगर समय रहते इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया तो पूरे समाज और देश पर इसके बहुत ही नकारात्मक परिणाम होंगे। 

हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी कई दुखद घटनाएं हुई हैं जो बतलाती हैं कि लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को कुचलने के उपक्रम समाज के उन लोगों द्वारा किए जा रहे हैं तो सत्ता के निकट हैं। इसलिए सरकार द्वारा इसकी रोकथाम के कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जो अधिक दुर्भाग्यजनक है। इससे ऐसे लोगों को बढ़ावा मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 15 के प्रावधानों के अनुसार धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव की सख्त मनाही है। इसे ही समानता का अधिकार कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ अनु. 25 देश के सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

इन संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करने वाली कई घटनाएं पिछले कुछ अर्से से उफान पर हैं। हाल ही में इंदौर में एक व्यक्ति के साथ इसलिए मारपीट हुई क्योंकि वह अल्पसंख्यक समुदाय का था और बहुसंख्यकों की बस्ती में चूड़ी बेच रहा था। ऐसे ही, मध्यप्रदेश के नीमच के सिंगौली में एक आदिवासी (भील) व्यक्ति को पीटा गया और उसे वाहन के पीछे बांधकर घसीटा गया। इससे उसकी मृत्यु हो गई। राजधानी दिल्ली में एक पत्रकार अनमोल प्रीतम से जबर्दस्ती धार्मिक नारे लगवाने का प्रयास हुआ। ये वारदातें बतलाती हैं कि देश में समानता और धार्मिक स्वतंत्रता को किस कदर से भीषण खतरा है। इसे लेकर कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने ट्वीट के जरिये पूछा है कि ‘क्या सरकार ने अनुच्छेद 15 एवं अनु. 25 भी बेच दिये हैं?’ राहुल के सवाल को हालांकि कई लोग मजाक में ले सकते हैं परन्तु यह स्वयं से पूछा जाने वाला प्रश्न है कि क्या देश में लोगों की समानता और मजहबी आजादी के हनन की घटनाएं नहीं हो रही हैं? अगर यह सिलसिला ऐसा ही चलता रहा तो किसी के भी इस उन्माद में फंस जाने का खतरा हर वक्त बना रहेगा। 

इसमें तो कोई शक नहीं है कि आज जो कुछ होता दिख रहा है उसका कारण भाजपा और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों द्वारा सामाजिक ध्रुवीकरण के सतत प्रयास करना है। वे जान गये हैं कि इसके जरिये चुनाव जीते जा सकते हैं और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखना संभव है। ऐसा नहीं है कि इसके प्रयास हाल ही में शुरू हुए हों। 1857 में देश में निर्मित हुई साम्प्रदायिक एका को तोड़ने के लिए ही हिंदूवादी संगठनों ने लगभग तभी से प्रयास प्रारंभ कर दिये थे जब से नवजागरण काल के बाद भारत ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता की निर्णायक लड़ाई छेड़ी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण और विस्तार हिंदुत्ववादी विचारों के आधार पर ही किया गया।

हिंदू-मुस्लिम धर्मों के आधार पर भारत को बांटने वाली इस विचारधारा को संघ की राजनैतिक शाखा भारतीय जनसंघ एवं बाद में भाजपा ने अपनी शक्ति बढ़ाने का आधार ही बनाकर रखा हुआ है। 1989 से प्रारंभ हुए रामजन्मभूमि आंदोलन को सफलता मिलती गई और अनेक राज्यों के साथ भाजपा वर्तमान में अभूतपूर्व राजनैतिक एवं सामाजिक शक्ति बटोरे हुए है। भाजपा के शासन काल में इस सामाजिक एकता, समानता के सिद्धांत एवं धार्मिक स्वतंत्रता को बड़ा आघात पहुंचा है। 

देश का यह चित्र हर उस व्यक्ति को भयभीत करने के लिए काफी है जो देश में स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और बन्धुत्व के सिद्धांतों पर आधारित व्यवस्था को कायम करने का आकांक्षी है। यह तो सच है कि लोकतंत्र में बहुमत के आधार पर ही सरकारें बनती हैं लेकिन सरकारों का यह संवैधानिक उत्तरदायित्व है कि वे पार्टी की सोच से ऊपर उठकर हर नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की रक्षा करे। नागरिक आजादी की बुनियाद इन्हीं पर टिकी हुई है। बढ़ती सामाजिक असमानता और धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात देश में आंतरिक असंतोष तो फैला ही रहा है, भारत की वैश्विक छवि को भी बिगाड़ रहा है।

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