भारत के कंधों पर हिंदू राष्ट्रवाद का वेताल..

भारत के कंधों पर हिंदू राष्ट्रवाद का वेताल..

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-सर्वमित्रा सुरजन॥
जब भारत के कंधों पर राष्ट्रवाद का वेताल नहीं बैठा था, जब नया भारत बनाने जैसी सनक राजनीति में नहीं घुली थी, जब गलत, अनैतिक कामों को भी न्यू नार्मल के दायरे में रखकर सही बताने की साजिशें शुरु नहीं हुई थीं, जब धर्म परोपकार का जरिया हुआ करता था, राजनीति का नहीं, जब समाज स्मार्ट फोन और तकनीकी के सहारे खुद को स्मार्ट समझने का मुगालता नहीं पाले हुआ था और उसके सरोकार काफी व्यापक थे, तब रिश्ते काफी सहज हुआ करते थे। समाज एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, यह जुड़ाव भावनाओं के अनदेखे तार के कारण हुआ करता था। तब रिक्शावाला, सब्जीवाला, दूधवाला, कपड़े वाला और चूड़ी वाला सभी तरह के मेहनतकश लोग भैया के संबोधन में बंधे हुए थे और मोहल्ले-गलियों में इन संबंधों का बरसों-बरस निर्वाह हुआ करता था। ऐसा नहीं है कि तब अपराध नहीं होते थे या कोई किसी के भरोसे का गलत फायदा नहीं उठाता था। गलत लोग तब भी थे, गलत लोग अब भी हैं। लेकिन उस वक्त इस गलत और सही के बीच सांप्रदायिक राजनीति के लिए जगह नहीं थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर की काबुलीवाला कहानी ही पढ़ लीजिए। मौका है, दस्तूर भी। उस कहानी में गुरुदेव ने अनजाने लोगों से गहरे रिश्ते और उन रिश्तों के बीच आई दूरियों, अविश्वास और फिर मानवीय संबंधों के निर्वाह को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया है। और इस कहानी को पढ़ने का वक्त न मिले, तो अपने बचपन के दिनों को ही याद कर लीजिए। सबकी यादों में ऐसे किरदार जरूर बसे होंगे, जिनसे आपका कोई सगा संबंध नहीं रहा होगा, लेकिन केवल खरीदार या विक्रेता का रिश्ता भी नहीं रहा होगा। परचून की दुकान पर बैठे भईया सौदा करने आए बच्चे को लाड़ में एक-दो खट्टी-मीठी गोलियां थमा देते थे या रिक्शेवाले यूं ही थोड़ी दूर के लिए अपने रिक्शे पर बच्चों को बिठा लेते थे। मुझे याद है स्कूल से घर के रास्ते में फल और सब्जी लेकर दो बहनें अपने सामान के साथ बैठती थीं, हम कुछ देर के लिए उनकी टोकरियों की रखवाली कर लेते थे और बदले में कभी एकाध अमरूद या ककड़ी वो हमें दे देती थीं। उन लोगों से अरसे बाद मिलने पर भी वे उसी तरह प्यार से मिलती रहीं। ऑनलाइन शापिंग के इस दौर में ऐसा अपनापा मुश्किल है और अगर खरीद-फरोख्त आमने-सामने हो, तब भी परस्पर विश्वास अब लगभग खत्म ही हो गया है। विश्वास की इस खाली जगह को भरने के लिए अब जहर और नफरत से पगी राजनीति आ गई है। इसका एक उदाहरण पिछले दिनों इंदौर में देखने मिला।
इंदौर के बाणगंगा इलाके में एक चूड़ीवाले की पिटाई की गई, उसका सामान और पैसे भी छीन लिए गए। इस घटना का एक वीडियो भी बाकायदा वायरल हुआ। जिसमें न•ार आ रहा है कि उस युवक से उसका नाम और धर्म पूछकर उसे मारा जा रहा है। तस्लीम नाम के इस लड़के पर तरह-तरह के आरोप लगे हैं। पुलिस ने उस पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की है, आरोप है कि उसने एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ की। हालांकि वीडियो में यही न•ार आ रहा है कि कुछ लोग उससे नाम पूछ रहे हैं और उसे हिंदू आबादी वाले क्षेत्र में न आने की धमकी दे रहे हैं। इस घटना पर पुलिस ने पहले कार्रवाई नहीं की, लेकिन बाद में जो एफआईआर दर्ज हुई, उसमें लिखा था, ‘तस्लीम अली जब गोविंद नगर थाना बाणगंगा क्षेत्र में चूड़ियां बेचने गए थे तो 5-6 लोग आए और उनका नाम पूछा और जब उन्होंने नाम बताया तो लोगों ने मारना शुरू कर दिया। उन लोगों ने तस्लीम के पास मौजूद 10,000 रुपये नक़द और मोबाइल फ़ोन भी छीन लिए। इसके साथ ही उनका आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज़ भी ले लिए गए। साथ ही लगभग 25,000 हज़ार रुपये का माल जिसमें चूड़ियां शामिल थीं लूट लिया गया।Ó एफआईआर के मुताबिक़ तस्लीम को मज़हब के आधार पर गालियां दी गईं और उन्हें मारा पीटा गया। हालांकि मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा, वो हिंदू नाम से वहां सामान बेच रहा था। वो दूसरे समुदाय से था। इसी तरह के दो आधार कार्ड भी मिले हैं।
किसी महिला के साथ अभद्रता, नाबालिग से छेड़छाड़, फर्जी पहचानपत्र रखना, ये सारे ऐसे अपराध हैं, जिन के लिए भारतीय कानून में धाराएं हैं और दोषियों को सजा देने की व्यवस्था भी है। लेकिन इन धाराओं में या न्याय-व्यवस्था में यह कहीं भी वर्णित नहीं है कि इस तरह के अपराधों पर जुर्म साबित होने से पहले ही सजा दी जाए और भीड़ खुद तय करे कि अपराधी कौन है और क्या सजा देना है। लेकिन जिस तरह तस्लीम के नाम पर राजनैतिक खेल शुरु हुआ है, जिस तरह उसका नाम कुछ बहुसंख्यक लोग उसे घेर कर पूछ रहे हैं, जिस तरह के बयान गृहमंत्री की ओर से आए हैं, वो सब यही साबित करते हैं कि समाज में हिंदू-मुसलमान के बीच नए सिरे से तनाव खड़ा करने की कोशिश हो रही है। इस कोशिश का मकसद क्या है, इसकी पड़ताल होनी चाहिए। अक्सर सांप्रदायिक तनाव तभी कायम किए जाते हैं, जब सरकार को अपनी किसी नाकामी से ध्यान हटवाना होता है, या चुनाव में वोट बटोरना होता है या बुनियादी सवालों से जनता को दूर कर दूसरे मसलों में उलझाना होता है, मीडिया अक्सर इस काम में सरकार का सहायक होता है।
तस्लीम अगर तपन होता, क्या तब भी छेड़खानी या दो आधार कार्ड रखने पर भीड़ उसके साथ वैसा ही व्यवहार करती? क्या देश के बड़े-बड़े राजनेता तब भी बयानबाजी करने के लिए उछलते फिरते? गृहमंत्री का कहना है कि वो हिंदू नाम से सामान बेच रहा था। क्या सरकार ने इस बात की गहराई में जाने की कोशिश की कि आखिर किन कारणों से तस्लीम को नाम या धर्म छिपाने की जरूरत पड़ी। याद कीजिए भाजपा के निजाम में कोरोना काल में भी सांप्रदायिक राजनीति के लिए अवसर तलाश लिए गए और मुस्लिम विक्रेताओं के आर्थिक बहिष्कार की मुहिम चलाई गई थी, क्या ऐसे ही किसी कारण से तस्लीम को अपना धर्म छिपाने की जरूरत तो नहीं पड़ी। और ये किस कानून में लिखा है कि हम अपने धर्म की तख्ती गले में लटकाएं फिरें। हिंदुस्तान के हरेक नागरिक को क्या अपने ही देश में निर्बाध, बेखौफ घूमने की आजादी नहीं होनी चाहिए। आजादी का अमृत महोत्सव मनाने वाले अपनी अंतरात्मा से इस सवाल को पूछें, शायद उन्हें न•ार आ जाए कि नया इंडिया बनाते-बनाते हम किस मुकाम पर देश को ले आए हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर ही फिर याद आते हैं- हो चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नत, हो ज्ञान जहां पर मुक्त, खुला यह जग हो, घर की दीवारें बने न कोई कारा, हो जहां सत्य ही स्रोत सभी शब्दों काÓ। क्या ऐसा भारत हम बना पा रहे हैं। या कम से कम बनाने की नीयत दिखला रहे हैं। अभी जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, कम से कम उन्हें देखकर तो ऐसा नहीं लगता।
तस्लीम के साथ जो अब हुआ, कुछ समय पहले कानपुर में ई-रिक्शाचालक अफसार के साथ हुआ था। उसके पहले अखलाक, पहलू खां के साथ यही हिंसा हुई। आरोपी कभी पकड़े जाते हैं, कभी नहीं। कुछ दिनों की चर्चा के बाद फिर समाज अपने में गुम हो जाता है और धर्मांध भीड़ अपनी हिंसा के लिए फिर किसी को तलाश लेती है। तस्लीम गिरफ्तार हो जाता है, लेकिन धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले अमरबेल की तरह बढ़ते जा रहे हैं। सरकारी संस्थाएं और कानून व्यवस्था बनाए रखने के जिम्मेदार लोग इस बेल को और बढ़ा रहे हैं। उनके स्वार्थ इसी से सधते हैं, लेकिन जनता को जागरुक होने की जरूरत है, क्योंकि किसी भी किस्म की हिंसा या नफरत का भुगतान हमें ही करना पड़ता है। अरसे पहले परसाईजी ने लिखा था, मध्ययुग के इतिहास की गलत समझ सांप्रदायिक द्वेष का मूल कारण है। उन्होंने ये बताया था कि कैसे हिंदू या मुस्लिम शासकों को केवल अपनी सत्ता से मतलब था और इसके लिए धर्म का इस्तेमाल उन्होंने किया। परसाईजी ने लिखा था कि इतिहास को ठीक से पढ़ें, समझें। जाति प्रथा खत्म करें। मंदिर और मस्जिद के लिए न लड़ें। सांप्रदायिक राजनीति के चक्कर में ना आएं। द्वेष को खत्म करें। युवक जनता को शिक्षित करें। क्या अब इस सलाह पर अमल करने का सही वक्त नहीं आ गया है।

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