6 लाख करोड़ की सम्पतियों की बिकवाली या लूट

6 लाख करोड़ की सम्पतियों की बिकवाली या लूट

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पिछले 70 सालों में कुछ नहीं हुआ का रोना रोने वाली मोदी सरकार अपने 7 साल के शासन में भाजपा के असँख्य सात सितारा दफ्तरों के सिवाय कोई संस्थान खड़ा नहीं कर पाई है लेकिन पिछले 70 सालों के दौरान विभिन्न सरकारों और विकास पुरुषों द्वारा खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों को किलो के भाव बेच अपने भारी भरकम खर्च जुटाने में लगी है..

शासकीय संपत्तियों और कंपनियों या उनकी हिस्सेदारियों को बेचने का अनवरत सिलसिला जारी रखते हुए नरेन्द्र मोदी सरकार ने कुछ और परिसंपत्तियों को बेचने का तय किया है। रेलवे, उड्डयन, बिजली, सड़क और यहां तक कि स्टेडियम जैसी संपत्तियों को लीज़ पर देकर सरकार 6 लाख करोड़ रुपये कमाने की आकांक्षा रखती है। केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को इस राशि की राष्ट्रीय मौद्रिकरण (एनएमपी) योजना का ऐलान किया जिसके अंतर्गत विभिन्न बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में संपत्तियों का मौद्रिकरण किया जायेगा।

7 वर्षीय नरेन्द्र मोदी सरकार के विनिवेशीकरण के प्रति अनुराग की ही यह एक कड़ी है- नाम और उद्देश्य चाहे दूसरे हों। सीतारमण ने इस बिकवाली को तर्कसंगत बतलाने के लिए इसे मौद्रिकरण निरूपित करते हुए साफ किया है कि जमीनों की बिक्री इसमें शामिल नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मौद्रिकरण हेतु अनेक कोर सेक्टरों सहित विभिन्न क्षेत्रों में परियोजनाओं की पहचान कर ली गई है। एनएमपी के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2025 तक की 4 वर्षों की अवधि में मुख्य संपत्तियों को बेचकर सरकार यह राशि कमायेगी। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय बजट 2021-22 के अंतर्गत बुनियादी अधोरचना के टिकाऊ वित्त पोषण के लिए मौद्रिकरण की एक उपयोगी साधन के रूप में शिनाख्त की गई थी। इसी के तहत यह फैसला लिया गया है।

पिछले 70 वर्षों में पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा कुछ न किये जाने का सतत आरोप लगाने वाले भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार उन सारी कंपनियों तथा संपत्तियों को बेचने पर आमादा है जिन्हें कड़ी मेहनत और जनता के टैक्स के पैसों से हमारे दूरदृष्टा विकास पुरुषों ने खड़ा किया था। अनेक ऐसी कंपनियां जो लाभ में चल रही हैं और जिनके बल पर न केवल भारत सरकार बजट बनाती है, वरन उन्हीं पैसों से अनेक कल्याणकारी योजनाएं भी कार्यरत हैं, आज बिकने की कगार पर खड़ी हैं या बेच दी गई हैं। प्रारंभ से ही मोदी सरकार और भाजपा ने इस तरह का नरेटिव गढ़ा है, कि सरकार को व्यवसाय नहीं करना चाहिए। यह मान्यता ही उसे परिसंपत्तियों को बेचने की प्रेरणा देती आई है। जनता में भी इस तरह का भ्रम फैलाया गया कि ये कं पनियां सरकार और जनता पर बोझ हैं तथा इनके कर्मचारी निकम्मे व भ्रष्ट हैं। इन तर्कों के आधार पर मोदी सरकार तमाम शासकीय कंपनियों-संपत्तियों को निजी उद्योगपतियों तथा कारोबारियों के हाथों में बेच रही है। अनेक तेल कंपनियां बिक चुकी हैं या उन्हें बेचने की तैयारियां हैं।

एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत सरकारी कंपनियों की सुविधाएं कम कर अथवा वित्तीय सहायता रोक कर या फिर उनमें नवीनीकरण, सुधार व आधुनिकीकरण बंद कर उन्हें पहले घाटे में लाया जाता है। भारत संचार निगम लिमिटेड, एयर इंडिया आदि कंपनियां इसका उदाहरण हैं। इस तरह उन्हें बेचने की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है। तत्पश्चात सरकार गिने-चुने मंत्रियों के माध्यम से कोई निर्णय लेकर या स्वयं मोदी की अनुमति मात्र से ये कंपनियां बेची जा रही हैं। इसका उद्देश्य सत्ता एवं भाजपा के कुछ निकटवर्ती उद्योगपतियों व व्यवसायियों को फायदा पहुंचाना है। विशेषकर, अंबानी और अडानी समूहों की संपत्तियां पिछले करीब 5 वर्षों में जिस हिसाब से बढ़ी हैं, उसके पीछे मुख्य रूप से सरकारी प्रश्रय ही है। इन दोनों ही समूहों को मोदी सरकार के दौरान जबर्दस्त फायदा हुआ है। दूसरी तरफ, विभिन्न शासकीय उपक्रमों में कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं का संकट पैदा हुआ है। कई जगह तो भर्तियां रुकी हुई हैं या फिर कर्मचारियों को घटाया जा रहा है। इनमें भी निजी निवेश बढ़ रहा है और कारोबारियों की हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है।

यह तो सच है कि नई आर्थिक नीति के दौरान निजीकरण की अवधारणा विकसित हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों के नाम पर निजी निवेश को बढ़ावा मिला था। पिछली सदी के अंत में आई अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया था। 2004 से 14 तक की मनमोहन सिंह सरकार ने भी इसे अनुमोदित तो किया था लेकिन वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों ने निजीकरण और सार्वजनिक संपत्तियां बेचने का काम बेहद सतर्कता और नियंत्रित तरीके से किया था। इसके विपरीत मोदी के कार्यकाल में शासकीय उपक्रमों को बेचने का कार्यक्रम अत्यंत अबुद्धिमत्तापूर्ण तथा अनियंत्रित तरीके से चलाया जा रहा है।

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार पूर्व अर्जित सारी परिसंपत्तियां आनन-फानन में बेच देना चाहती है। सरकार ने कभी भी यह स्पष्ट नहीं किया कि जब सारी संपत्ति बेच दी जायेंगी तो शासकीय खजाने में पैसे कहां से आयेंगे? क्या निजी कारोबारियों से सरकार इतना कमा सकेगी जिससे प्रशासकीय जरूरतें और कल्याणकारी कार्यक्रम चलाये जा सकेंगे? यह बेहद दुखद है कि मोदी सरकार की इस नीति का कड़ा विरोध न तो विपक्ष कर पा रहा है और न ही आम जनता। संभवत: नागरिक इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि लाभप्रद शासकीय कंपनियों एवं संपत्तियों की बिक्री से पूंजी का केन्द्रीकरण होगा जिसका खामियाजा अंतत: उन्हें ही भोगना पड़ेगा।

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