ये लोग पाक का पर्यटन उद्योग चौपट कर भारत को अफगान भेजकर मानेंगे..

ये लोग पाक का पर्यटन उद्योग चौपट कर भारत को अफगान भेजकर मानेंगे..

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-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तान के भीतर नफरतजीवियों-सुनील कुमार का एक तबका एक बार फिर बहुत सक्रिय हो गया है उसे अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से एक बड़ा मुद्दा हाथ लगा है और हिंदुस्तान में ये लोग आज इस वक्त किसी भी वजह से अमेरिकी फौजों की वापिसी के बारे में कुछ कह रहे हैं या दुनिया भर में जाहिर की जा रही ऐसी संभावना पर चर्चा भी कर रहे हैं कि तालिबानियों का नया रुख देखना होगा कि क्या उनमें कोई फेरबदल आया है? ऐसे तमाम खुले दिमाग के लोगों के लिए नफरतजीवियों के पास एक ही फार्मूला है कि सेक्युलर लोग अफगानिस्तान चले जाएं वहां जाकर बसें। कुछ नफरतजीवियों जिन्होंने कुछ अधिक कल्पनाशीलता भी दिखाई है, और वे ऐसे इश्तहार बनाकर पोस्ट कर रहे हैं कि बहुत सस्ते में काबुल में एक बड़ा मकान किराए पर उपलब्ध है और लोग वहां जाकर उसमें रह सकते हैं। अगर अफगानिस्तान के बाद तालिबान से अधिक कट्टर कोई और इस्लामी संगठन दुनिया के किसी और देश में सक्रिय हो जाएगा तो हिंदुस्तान के ये नफरतजीवी यहां के अमनपसंद लोगों को ऐसे किसी देश भी भेज देंगे जहां अलकायदा का राज होगा, जहां तालिबानियों से अधिक कट्टर लोग होंगे।

दुनिया के जटिल मुद्दों की जब न समझ हो, न समझने की ताकत हो, और न समझने की इच्छा हो, तो कुछ इसी किस्म की बात की जाती है। अफगानिस्तान और तालिबान के मुद्दे पर आज दुनिया भर के विश्लेषकों को भी लिखने में दिक्कत जा रही है क्योंकि बहुत सी चीजें अभी भी लोगों की समझ से परे हैं बहुत अधिक जटिल हैं लेकिन जो लोग हिंदुस्तान के कुछ लोगों को अफगानिस्तान धकेलना चाहते हैं उनके लिए हालात का अतिसरलीकरण करना बड़ा आसान है, उसमें दिमाग के इस्तेमाल की जरूरत नहीं पड़ती। उसमें न जानकारी लगती, न कोई विश्लेषण लगता, उसमें सिर्फ एक नीयत लगती है कि कैसे अपने से असहमत लोगों को देश निकाला दिया जाए। यह लोग पहले पाकिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी चला रहे थे, अब उन्होंने अफगानिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी शुरू कर दी है। कुल मिलाकर हालत यह है कि हिंदुस्तान के जिन लोगों को और जितने लोगों को ये लोग पाकिस्तान भेज रहे थे, अब पाकिस्तान का पर्यटन उद्योग भूखा ही मर जाएगा, क्योंकि अब यह तमाम लोगों को अफगानिस्तान भेजने पर उतारू हैं।

हिंदुस्तान में अकल बिना, और नफरत से लबालब एक तबका ऐसा हो गया है जो दुनिया में कहीं भी होने वाली किसी धर्मांधता, कट्टरता, या सांप्रदायिकता को लेकर हिंदुस्तान के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, और अमनपसंद लोगों पर हमला करना शुरू कर देता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब हिंदुस्तान में धार्मिक कट्टरता और धार्मिक हिंसा सिर चढक़र बोलती है, तो तालिबान सऱीखों की मिसाल देते हुए समझदार लोग यह नसीहत देते हैं कि तालिबान बनने की कोशिश ना करें, क्योंकि उसके बाद मुल्क का जो हाल होता है वह सबका देखा हुआ है। इस नसीहत को समझने के बजाय, क्योंकि समझने से तो धार्मिक हिंसा छोडऩी भी पड़ेगी, ऐसे धर्मांध और हिंसक लोग, अपने ही मुल्क के लोगों को अफगानिस्तान रवाना करने पर उतारू हैं। उन्हें तालिबान से परहेज नहीं है क्योंकि तालिबान के बहुत से तौर-तरीके तो उन्हें हिंदुस्तान में इस्तेमाल करने में भी मजा आ रहा है। लेकिन उन्हें हिंदुस्तान में आईना दिखाने वाले लोगों से दिक्कत है, और वे ऐसे अमनपसंद लोगों को धकेलकर देश के बाहर करना चाहते हैं।

इसमें कोई नई बात भी नहीं है। आईना दिखाने वालों का हर युग में यही हाल होते आया है। यह तो सैकड़ों बरस पहले कबीर के वक्त पर धर्मांधता और धार्मिक हिंसा आज सरीखी हावी नहीं थी इसलिए कबीर धार्मिक पाखंड के खिलाफ सौ किस्म की नसीहतें देकर भी जिंदा रह गए। आज का वक्त होता तो कबीर के हाथकरघे को आग लगा दी गई होती और कबीर की सडकों पर भीड़त्या कर दी गई होती। हिंदुस्तान का सोशल मीडिया इस बात का गवाह है कि आबादी का कम से कम एक तबका किसी भी किस्म की समझ से ठीक उसी तरह परहेज करता है, जिस तरह किसी धार्मिक उपवास के दिन कई चुनिंदा चीजों से परहेज किया जाता है। यह तबका न तो इतिहास को देखना चाहता है, क्योंकि इतिहास का सच उसके लिए बड़ी असुविधा का है, न वह वर्तमान को देखना चाहता है क्योंकि वर्तमान में उसकी खुद की हरकतें शर्मनाक हैं, और न वह भविष्य को देखना चाहता है क्योंकि बेहतर भविष्य के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है।

ऐसे लोगों को तालिबान की वजह से अफगानिस्तान में हुए नुकसान से सबक लेने के बजाय हिंदुस्तान में तालिबानी हरकतें करने में मजा आता है और वे यह मानकर चलते हैं कि उनके बावजूद हिंदुस्तान में कोई नुकसान उन्हें नहीं होगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर अभी कुछ लोगों ने एक तंज कसा है जो कि सच के बहुत करीब भी है कि संसद भवन की नई इमारत बना देने से संसदीय व्यवस्था मजबूत नहीं हो जाती है, संसदीय लोकतंत्र मजबूत नहीं हो जाता है। अफगानिस्तान का संसद भवन तो भारत ने बनाकर दिया लेकिन क्या नतीजा निकला? नए और मजबूत संसद-भवन से अफग़़ान लोकतंत्र मजबूत तो नहीं हो गया? धर्मान्धता ने एक देश को खा लिया। दुनिया के 3 सबसे बड़े साम्राज्यवादी देशों ने अफगानिस्तान की डेढ़ सदी से ज्यादा का वक्त खत्म कर दिया, उस देश का भविष्य खत्म कर दिया, और किस तरह कट्टर धर्मान्ध तालिबानियों ने अपने देश की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया, अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश को यह मौका दिया कि वह अलकायदा को खत्म करने का बहाना बनाकर अफगानिस्तान पर हमला करे, उसे कुचल डाले। इसलिए जिन लोगों को तालिबानी कट्टरता सुहाती है उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसी धर्मांध कट्टरता, ऐसी धर्मांध हिंसा किसी देश की संभावनाओं को तो खत्म करती ही है, उस देश के लोकतंत्र को भी खतरे में डाल देती है, और उसे बाहरी हमलों के लायक तैयार निशाना बना देती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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