ईश्वर को तस्करों से लेकर तमाम किस्म के मुजरिमों तक की भागीदारी भाती है..

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सांवलिया सेठ मंदिर के चढ़ावे को देख मजदूर भी कुछ सीखें…

-सुनील कुमार॥

जाने कैसे खबरों में और सोशल मीडिया में पिछले 4 दिनों से एक मंदिर की ऐसी तस्वीरें लगातार घूम रही हैं जिनमें ईश्वर के लिए आया हुआ चढ़ावा गिना जा रहा है। दर्जनों लोग बैठकर नोटों को अलग कर रहे हैं, सिक्कों को अलग कर रहे हैं, उनके बंडल बनाते जा रहे हैं। कुछ खबरें ताजा हैं, कुछ तस्वीरें और आंकड़े पिछले सालों के भी हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश-राजस्थान की सरहद पर राजस्थान के हिस्से के इस मंदिर में हर महीने करोड़ों का चढ़ावा आने की खबरें पिछले वर्षों में लगातार आ रही हैं। देश का प्रमुख मीडिया, देश के प्रमुख अखबार, सभी जगहों पर आंकड़ों के साथ इस मंदिर की कमाई का जिक्र है, और उसकी तस्वीरें भी हैं। अब यह जगह कोई बहुत बड़ा तीर्थ स्थान नहीं है जहां पर तिरुपति या नाथद्वारा या स्वर्ण मंदिर या अजमेर शरीफ की तरह बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लेकिन सांवलिया सेठ का यह मंदिर कई मायनों में बड़ा चर्चित है। और जैसा कि सांवले रंग से समझ में आ जाना चाहिए यह कृष्ण का एक मंदिर है। कृष्ण के अनगिनत रूपों में से एक रूप उनके सांवले रंग की वजह से सांवलिया सेठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। अब इस मंदिर में इतने चढ़ावे की एक वजह यह भी है यह पूरा इलाका अफीम की गैरकानूनी खेती का इलाका माना जाता है और अफीम तस्कर परंपरागत रूप से इस मंदिर के भगवान को अपना भागीदार बनाकर चलते हैं। जब कभी वे अफीम की कोई बड़ी खेप बाहर भेजते हैं, तो हिस्सा देने पहुंचते हैं और चढ़ावे में नोटों के साथ-साथ अफीम भी डाली जाती है। हर महीने अमावस्या को दान पेटी खोली जाती है तो उसमें से करोड़ों रुपए निकलते हैं जो कि जाहिर तौर पर अफीम तस्करों के दिए गए दान की वजह से इतनी बड़ी रकम बन पाते हैं। इस बात को उस इलाके के तमाम लोग अच्छी तरह जानते हैं यह बात खबरों में आती रहती है, इसलिए यह हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोई साजिश भी नहीं है। ये खबरें बड़े धर्मालु हिंदुओं के मालिकाना हक वाले अखबारों और मीडिया में आती हैं, और अफीम को चूंकि काला सोना कहा जाता है इसलिए सांवलिया सेठ को भी काले सोने का देवता कहते हैं।

लोगों को याद होगा कि दक्षिण भारत के विख्यात तीर्थस्थान तिरुपति में भी वहां के देवता को उनके मानने वाले लोग अपने व्यापार में भागीदार मानकर चलते हैं और फिर चाहे उनका व्यापार शराब का ही क्यों ना हो, वे अपने बही-खातों में ईश्वर के नाम का हिस्सा दिखाते हुए उतनी रकम को दान में तिरुपति ट्रस्ट को हर बरस भेजते रहते हैं. उनकी आस्था उन्हें यह भरोसा दिलाती है कि ईश्वर की भागीदारी की वजह से उनका कारोबार खूब पनपेगा। और यह बात बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसे भागीदार लोगों के धंधे में बरकत से ईश्वर का खुद का भी फायदा बढ़ता है, और यही वजह है कि व्यापारी अधिक कामयाब होते हैं, मजदूर बमुश्किल मजदूरी कमा पाते हैं, और बीच के लोग जो कि अधिक चढ़ावा नहीं दे पाते जो कि मुफ्त का लड्डू प्रसाद के रूप में पाकर ही प्रसाद पा सकते हैं, प्रसाद को खरीद नहीं सकते हैं, उनकी जिंदगी भी जस की तस चलती रहती है वह आखिर ईश्वर को किस चीज में भागीदार बना सकते हैं?

जिन लोगों ने गॉडफादर फिल्म देखी होगी या मारियो पूजा की लिखी हुई कहानी पढ़ी होगी, उन्हें पता होगा कि किस तरह दुनिया के सबसे खूंखार मुजरिम और माफिया सरगना अपने दिल की गहराइयों से ईसाई धर्मावलंबी रहते हैं, सुख-दुख के तमाम मौकों पर चर्च जाते हैं, इतवार को चर्च जाते हैं, एक-दूसरे को कत्ल की साजिश चर्च और कब्रिस्तान में करते हैं। लेकिन किसी का ईश्वर उन्हें किसी जुर्म से नहीं रोकता, किसी जुर्म की कमाई से नहीं रोकता। ईश्वर ने अगर जुर्म की कमाई से किसी को रोका होता तो भला मुंबई का एक बड़ा माफिया सरगना और एक सबसे बड़ा तस्कर मस्तान कैसे हाजी बना होता? हाजी तो लोग एक तीर्थ करने के बाद, हज करने के बाद ही बन पाते हैं, और मस्तान जब हाजी बन गया तो जाहिर है कि उसके पीछे भी ईश्वर की मर्जी रही होगी।

ईश्वर और काले कारोबार का यह पूरा सिलसिला दुनिया में कहीं भी एक-दूसरे के साथ कोई टकराव नहीं रखता। हमने दुनिया के सैकड़ों धर्मस्थानों के बारे में पढ़ा है, दर्जनों को रूबरू देखा भी है। किसी एक में भी ऐसी कोई तख्ती नहीं लगी है कि जुर्म करने वाले और पापी यहां पर ना आएं, ईश्वर के सामने ना पड़ें, पाप की कमाई से यहां दान ना दें। सच तो यह है कि जब बड़े से बड़े चर्चित धर्मस्थान पर बड़े-बड़े चर्चित मुजरिम पहुंचते हैं, तो उनके स्वागत के लिए उस जगह के, उस धर्म के पुजारी खड़े रहते हैं। वह तमाम लोगों की भीड़ को चीरते हुए ऐसे मुजरिमों को लेकर ईश्वर तक जाते हैं और फिर जितनी देर ईश्वर और मुजरिम एक दूसरे को देखना चाहते हैं, उतनी देर ये पुजारी बाकी लोगों की भीड़ को रोककर रखते हैं। अलग-अलग धर्मों में रिवाज थोड़ा सा कम-अधिक फर्क वाला हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया का एक भी धर्म पाप की काली कमाई से कोई परहेज नहीं करता। धर्म स्थानों पर यह तो लिखा दिखता है कि यहां दलित भीतर ना आएं, महिलाएं भीतर ना आएं, गैरहिंदू भीतर ना आएं, लेकिन जिस मंदिर से यह चर्चा हमने शुरू की है, सांवलिया सेठ के उस मंदिर में भी ऐसी किसी तख्ती की चर्चा पिछले कई बरस की खबरों में हम न ढूंढ पाए कि क्या वहां पर अफीम तस्करों के लिए आने की कोई मनाही है? क्या वहां पर अफीम की कमाई दान में न देने या दान पेटी में अफीम न डालने की कोई अपील है? ऐसा कुछ भी नहीं है।

जो धर्म अपने भीतर के इंसानों को अछूत और सछूत तो जैसे तबकों में बांटकर चलता है, उस धर्म में भी कोई भी नोट, कोई भी सिक्का, कोई भी गहने, कुछ भी अछूत नहीं हैं. और तो और अफीम की डली और अफीम की पोटली भी अछूत नहीं है। ईश्वर का यह हैरान करने वाला दरबार रहता है जहां किसी मुजरिम के लिए कोई मनाही नहीं है जहां किसी जुर्म की कमाई से कोई परहेज नहीं है। और तो और यह भी याद पड़ता है कि मदर टेरेसा ने भी अपने अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए दुनिया के कुछ ऐसे लोगों से दान लिया था जिन्हें मुजरिम माना जाता था। अब जब ईश्वर को ही परहेज नहीं है, तो ईश्वर का नाम लेकर अनाथ बच्चों को जिंदा रखने का काम करने वाली मदर टेरेसा कैसा परहेज निभा सकती है? इसलिए जिस पैसे को प्रवचनकर्ता हाथों का मैल करार देते हैं, उस पैसे के बारे में एक भ्रष्ट नेता, अधिक बेहतर तरीके से, अधिक सच्चाई के साथ बता सकता है कि पैसा खुदा तो नहीं है, लेकिन खुदा से कम भी नहीं है। बात एकदम सही है, किसी धर्मस्थल की ऐसी हिम्मत हमने आज देखी-सुनी तो दूर, कहानी में भी नहीं पढ़ी है जहां पर यह लिखा गया हो कि इस जगह पर मुजरिमों और पापियों के आने पर रोक है, और जुर्म की काली कमाई दान में डालने पर रोक है।

ईश्वर को तस्करों से लेकर तमाम किस्म के मुजरिमों तक की भागीदारी अच्छी लगती है. अफीम के धंधे में भागीदारी से भी उसे कोई परहेज नहीं है। धर्म में जिनकी दिलचस्पी है उन्हें धर्म की बारीकियों को जानना चाहिए। अगर ईश्वर सिर्फ नेक काम करने वाले, पुण्य करने वाले लोगों का दान मंजूर करने लगेगा तो उसे दिन में दो बार अपनी प्रतिमा से निकलकर पास के गुरुद्वारे में लंगर खाने के लिए जाना पड़ेगा। ईश्वर समझदार है, व्यावहारिक है इसलिए वह किसी किस्म की कमाई को बुरा नहीं मानता और दो नंबर के धंधे में भी अगर उसे भागीदार बनाकर रखा जाता है तो वह उनको भी बरकत देता है। मनरेगा के मजदूरों को जरूर अपनी मजदूरी बढ़वाने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने किसी ईश्वर को अपनी मजदूरी की कमाई में भागीदार बनाया हुआ नहीं है। मजदूरों को भी अफीम तस्करों से दो नंबरियों से लेकर 10 नंबरियों तक से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि वह सीख नहीं पाए हैं इसीलिए हाड़-मांस जलाते हुए रात-दिन मेहनत करते हैं, और आधा पेट खाकर सोते हैं। ईश्वर के तौर-तरीके अलग किस्म के हैं और वहां पर एक अलग ही भाषा चलती है, उस भाषा में पार्टनरशिप-डीड लिखवाना मजदूरों को आना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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