कर्नाटक : एक अध्याय का अंत..

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कर्नाटक में पिछले कई दिनों से चल रही राजनैतिक उठापटक के एक अध्याय का अंत आज मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा के इस्तीफे के साथ हो गया। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा सरकार बनाने से चूक गई थी और कांग्रेस के साथ जेडीएस ने मिलकर सत्ता हासिल कर ली थी। हालांकि इस गठबंधन का सत्तासुख अधिक दिनों तक नहीं चला और 2019 में भाजपा का आपरेशन लोटस कामयाब हुआ। जिसके बाद राज्य की कमान एक बार फिर बी.एस येदियुरप्पा के हाथ आई। दक्षिण की राजनीति में पैर जमाना भाजपा के लिए हमेशा से एक बड़ा ख्वाब रहा है। कर्नाटक में भाजपा के इस सपने को पूरा करने में बी एस येदियुरप्पा की बड़ी भूमिका रही है। कर्नाटक में सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले लिंगायत समुदाय से आने वाले येदियुरप्पा की इस अहमियत को भाजपा अच्छे से जानती है।

इसलिए 26 जुलाई 2019 को उन्हें ही फिर से मुख्यमंत्री बनाया, जबकि वे भाजपा द्वारा तय उम्र की सीमा यानी 75 बरस के ऊपर वालों को कोई पद या जिम्मेदारी नहीं, वाले मानदंड पर भी खरे नहीं उतरते हैं। 78 बरस के येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पद तो संभाल लिया। लेकिन उन्हें सरकार से ही चुनौती मिलने लगी। खासकर आपरेशन लोटस में कांग्रेस-जेडीएस से आए बागी विधायकों और भाजपा विधायकों के बीच तालमेल बिठाना कठिन था। किसे मंत्री बनाया जाए, किसे कौन सा मंत्रालय दिया जाए, इसमें लाभ-हानि का काफी गणित भाजपा ने किया, लेकिन फिर भी असंतुष्टों को पूरी तरह मना नहीं पाई। नतीजा ये रहा कि सत्ता के दो साल के भीतर ही विरोध के सुर येदियुरप्पा को सुनाई देने लगे। कर्नाटक के ग्रामीण विकास मंत्री केएस ईश्वरप्पा और विधायक बसनगौड़ा यत्नाल जैसे लोगों ने सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए येदियुरप्पा को हटाने की मांग की। धीरे-धीरे कई और विधायक इसमें शामिल होते गए।

चौथी बार मुख्यमंत्री बने येदियुरप्पा के खिलाफ भाजपा नेताओं की ही इस नाराजगी को भाजपा आलाकमान नजरंदाज नहीं कर सकता था। इसलिए उन्हें पद से हटने के संकेत दिल्ली से मिल चुके थे। पिछले कई दिनों से अटकलें लग रही थीं कि उत्तराखंड की तरह कर्नाटक में भी भाजपा मुख्यमंत्री परिवर्तन कर सकती है, क्योंकि उसे सत्ता बचाना है। उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत से विधायकों की नाराजगी के चलते उन्हें हटाने का ऐलान किया गया था। भाजपा नहीं चाहती थी कि 2022 के चुनाव में उसे कोई नुकसान उठाना पड़े। यही बात कर्नाटक पर भी लागू होती है, जहां अगले चुनाव से पहले भाजपा सारे अंतर्विरोध खत्म करना चाहती है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। दरअसल लिंगायत समुदाय ने बैठक करके येदियुरप्पा को हटाने की कोशिशों का विरोध जताया था और उन्होंने बैठक में फैसला लिया कि यदि येदियुरप्पा को पद से हटाया गया तो आंदोलन किया जाएगा। बैठक के बाद लिंगेश्वर मंदिर के मठाधीश शरनबासवलिंगा ने कहा था कि कर्नाटक में चुनाव कैसे जीते जाते हैं, यह दिल्ली के लोगों को नहीं पता है।

राज्य में येदियुरप्पा ने भाजपा की सरकार बनाई है इसलिए अब उन्हें हटाना भाजपा को बड़े कष्ट में डाल सकता है। भाजपा ने इस चेतावनी को गंभीरता से लिया, और येदियुरप्पा को हटने का आदेश नहीं दिया, बल्कि येदियुरप्पा ने खुद ही इस्तीफे का ऐलान कर दिया। संयोग है कि 26 जुलाई 2019 को उन्होंने सत्ता संभाली थी और ठीक दो साल बाद उन्होंने अपने इस्तीफे का ऐलान किया। इस दौरान भावुक येदियुरप्पा ने कहा कि- ‘जब अटल बिहारी वायपेयी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने मुझसे केंद्र में मंत्री बनने के लिए कहा था। लेकिन मैंने कहा कि नहीं मैं तो कर्नाटक में ही रहूंगा। मेरी तो हमेशा ही अग्निपरीक्षा रही है। पिछले 2 साल कोविड 19 से लड़ते हुए गुजरे हैं।’

अग्निपरीक्षा जैसे शब्दों के इस्तेमाल से येदियुरप्पा ने अपनी अहमियत भाजपा हाईकमान के सामने एक बार फिर रेखांकित कर दी। उन्होंने कहा कि वे अपनी मर्जी से इस्तीफा दे रहे हैं, हालांकि यह तय है कि भाजपा नेतृत्व उनकी इस मर्जी के सामने दूसरी मर्जियों पर राजी हुआ होगा। मुमकिन है येदियुरप्पा के बेटे को नए मंत्रिमंडल में स्थान मिल जाए या फिर येदियुरप्पा को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए। क्योंकि इस्तीफे के ऐलान के साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले चुनाव में भाजपा को फिर से सत्ता में लाने का प्रयास करेंगे। बहरहाल, अब येदियुरप्पा की जगह भाजपा किसे मुख्यमंत्री बनाती है, इस पर देश की नजरें टिकी हैं।

क्योंकि नए मुख्यमंत्री के लिए कुछ खास मापदंड माने जा रहे हैं। उसे भाजपा आलाकमान का विश्वासपात्र होना चाहिए। लिंगायत समुदाय या संघ का आशीर्वाद उसे मिलना चाहिए। हिंदुत्व के एजेंडे पर काम करने वाला होना चाहिए और इन सबसे बढ़कर उसे ऐसा प्रशासक होना चाहिए, जो असंतुष्टों को साध सके। अब तक भाजपा के विधायक बागियों के सामने उपेक्षित महसूस कर रहे थे, अब कांग्रेस, जेडीएस से आए विधायकों के सामने अपना राजनैतिक भविष्य बचाने की चुनौती है। इनमें संतुलन नहीं साधा, तो सरकार गिरने का खतरा हो सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा येदियुरप्पा की जगह किसे मुख्यमंत्री बनाती है और कैसे चौतरफा चुनौतियों का सामना करते हुए सरकार बचाती है।

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