सरकार कुतर्कों का नमक जख्मों पर छिड़क रही है

सरकार कुतर्कों का नमक जख्मों पर छिड़क रही है

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-सर्वमित्रा सुरजन।।

मोदीजी ने सदन में दलित-ओबीसी सहानुभूति कार्ड खेलने के साथ ही इस सत्र में भाजपा की पहली संसदीय दल की बैठक में भाजपा सांसदों से कहा कि वह सच्ची बातों को जनता के बीच लेकर जाएं और बार-बार बताएं। क्योंकि अगर आप सच्ची बातें कहना छोड़ देंगे तो उसकी खाली जगह को झूठ भर देगा। सच के लिए उनके इस आग्रह को केवल भाजपा सांसदों को ही नहीं, देश के तमाम जागरुक नागरिकों को मानना चाहिए। क्योंकि देश ने इस बात को कई बार अनुभव किया है।

संसद के मानसून सत्र का आगाज हंगामों की गरज-बरस के साथ होगा, इसका अंदाजा तो पहले से ही था, लेकिन ये पता नहीं था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले दिन ही रक्षात्मक मुद्रा में दिखेंगे। या ये कहना मुनासिब होगा कि पहले दिन से ही सहानुभूति कार्ड वे चलने लगेंगे। कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की अक्षमता, व्यवस्थागत खामियां, फैसले लेने में देरी और अदूरदर्शिता के कारण देश में लाखों जिंदगियां अकाल मौत का शिकार हुईं। जो बच गए, उनके भविष्य पर कई सवालिया निशान खड़े हो गए। महंगाई की मार देश में इस तरह आम जनता पर पहले कभी नहीं पड़ी। तीन-तीन युद्ध, अकाल और बाढ़ जैसी त्रासदियों के बावजूद जनता की जेब पर इतना अनावश्यक बोझ कभी नहीं पड़ा। न ही कभी सरकार की ऐसी संवेदनहीनता देखी गई। तेल पर टैक्स कम करके सरकार जनता को तत्काल राहत दे सकती है।

लेकिन सरकार इसकी जगह कुतर्कों का नमक जख्मों पर छिड़क रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई इन सब की सबसे अधिक मार समाज के सबसे कमजोर तबकों पर पड़ रही है। दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं की जिंदगी में पिछले दो सालों में तकलीफें कुछ और बढ़ गई हैं। अगर सरकार आत्ममुग्धता का चश्मा निकाल कर देखे तो उसे समाज की हकीकत समझ आएगी।

लेकिन सरकार अब भी अपनी गलतियों और कमजोरियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने में लगी है। सदन के पहले दिन सरकार ने इसी रणनीति पर काम किया और अब तो हद ही हो गई, जब सरकार ने संसद में ये कहा कि आक्सीजन की कमी से कोई मौत ही नहीं हुई। इस बात को सुनकर तो सफेद झूठ भी ये सोच रहा होगा कि अब वो कहां जाकर मुंह छिपाए। मोदीजी ने तो उससे उसका ओहदा ही छीन लिया।

सरकार जानती थी कि मानसून सत्र के दौरान जब सभी सांसद सदन में इकट्ठे होंगे, तो विपक्ष के लोग सरकार से जवाब-तलब करेंगे। सत्र शुरु होने से एक दिन पहले सर्वदलीय बैठक भी बुलाई गई थी, जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा था कि शांतिपूर्ण ढंग से स्वस्थ और सार्थक चर्चा होनी चाहिए। संसद में भाजपा का बहुमत है, एनडीए की सरकार है, जबकि विपक्ष सिमटा हुआ है। सरकार तो विपक्ष को इतना कमजोर मानती है कि उसके साथ अस्तित्वहीन जैसा व्यवहार करती है। उसके बाद प्रधानमंत्री न जाने किससे स्वस्थ और सार्थक चर्चा की उम्मीद रख रहे हैं। अगर वे वाकई ऐसा चाहते हैं तो विपक्ष अब तक जिन मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगता आया है, उनकी उपेक्षा करने की जगह जवाब देना चाहिए। लेकिन तब सरकार के मंत्री निजी दुश्मनी निकालने के अंदाज में प्रेस वार्ताएं करते हैं और विपक्ष को खरी-खोटी सुनाते हैं।

सरकार का अलोकतांत्रिक रवैया जैसा सदन के बाहर है, वैसा ही सदन के भीतर भी दिखता है। इसलिए कई जरूरी विधेयक बिना चर्चा के पारित हो जाते हैं। शायद प्रधानमंत्री के लिए यही स्वस्थ और सार्थक चर्चा है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने सत्र की शुरुआत में ही कहा, ‘विपक्ष जम कर सवाल पूछे लेकिन सरकार को जवाब देने का मौका भी दे’। पता नहीं वो कौन सी अज्ञात शक्तियां हैं, जो सरकार को जवाब देने से रोकती हैं।   

बहरहाल, मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा में मोदीजी ने अपनी मंत्रिपरिषद के नए मंत्रियों का परिचय कराना चाहा मगर इसी दौरान विपक्ष के सदस्य हंगामा करने लगे, तो प्रधानमंत्री ने रक्षात्मक मुद्रा में कहा- ‘मैं सोच रहा था कि आज सदन में उत्साह का वातावरण होगा क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में हमारी महिला सांसद,  दलित भाई, आदिवासी, किसान परिवार से सांसदों को मंत्री परिषद में मौका मिला। उनका परिचय करने का आनंद होता’ज्’लेकिन शायद देश के दलित, महिला, ओबीसी, किसानों के बेटे मंत्री बनें, ये बात कुछ लोगों को रास नहीं आती है। इसलिए उनका परिचय तक नहीं होने देते।’ हद दर्जे की संवेदनहीनता है सरकार की। कोरोना में करोड़ों हिंदुस्तानियों का जीवन बरबाद हो गया, उनके लिए संवेदना के दो बोल बोलने की जगह प्रधानमंत्री को नए मंत्रियों का परिचय और स्वागत अधिक महत्वपूर्ण लगा।

किसानों के बेटों को मंत्री बनाने की बात कहने वाले मोदीजी अब तक उस एक फोन कॉल की दूरी नहीं मिटा पाए, जो दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों और प्रधानमंत्री आवास के बीच है। आठ महीनों से किसान नए कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मांग पूरा करना तो दूर, अब सुनने भी तैयार नहीं है। मोदीजी ने विपक्ष पर कटाक्ष करने के बहाने खुद को महिलाओं, दलितों, पिछड़ों का हितैषी साबित करने की कोशिश की। उनके बहाने अपने लिए सहानुभूति बटोरनी चाही। लेकिन इस फेर में मोदीजी ये बात भूल ही गए कि दलित शब्द के इस्तेमाल पर उनकी ही सरकार ने रोक लगाने की कोशिश की थी। सितम्बर 2018 में सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों से कहा था कि वो दलित शब्दावली का इस्तेमाल ना करें। मंत्रालय का कहना था कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्दावली है और इसी का इस्तेमाल किया जाए। उससे पहले मार्च 2018 में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी ऐसा ही आदेश सभी राज्यों की सरकारों को दिया था कि आधिकारिक संवाद या पत्राचार में दलित शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया जाए। मंत्रालय का कहना था कि दलित शब्दावली का ज़िक्र संविधान में नहीं है।

दलित शब्द तो बोलचाल से हटाने की कोशिश सरकार ने की, जिसका विरोध भी हुआ। हालांकि इसकी जगह दलितों के दुख-दर्द मिटाने पर सरकार का जोर होता, तो हालात कुछ और होते। मोदीजी के संसद में दलित प्रेम पर भाजपा के पूर्व सांसद और अब कांग्रेस नेता उदित राज ने उन पर तंज कसा कि  ‘मोदी जी आपको दलितों से कितनी नफरत हैं, यह मैं जानता हूं। 5 साल आपके साथ काम किया। मैं संसद में सच बोलता था, वो आपको मंजूर नही था। किस दलित मंत्री को अच्छा मंत्रालय दिया आपने, बताइए जरा। नाटक करने में आपका विश्व में मुकाबला नहीं है। पिछले 4 साल में 40842 ओबीसी की पीजी और स्नातक, मेडिकल और डेंटल की सीटें खत्म कर दीं। आज संसद में पिछड़ों का हितैषी होने का ढोंग कर रहे हैं।’

वैसे यह पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार पर दलितों के दमन और विरोध का आरोप लगा हो। मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद डॉ. यशवंत सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने दलितों के लिए कुछ भी नहीं किया है। उस वक्त बहराइच से भाजपा की दलित सांसद सावित्री बाई फुले ने लखनऊ में रैली कर अपने ही सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज से दलित सांसद छोटेलाल खरवार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शिकायत कर कहा था कि विभिन्न मुद्दों को लेकर वह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने गए थे लेकिन योगी ने उन्हें डांटकर भगा दिया था। भाजपा के दलित सांसदों की अपनी ही सरकार से ये शिकायतें अगर पिछले कार्यकाल का हाल बयां कर रही हैं, तो इस बार भी हालात बहुत बदले नहीं हैं। मोदीजी नए मंत्रिमंडल पर तारीफें चाहते हैं, तो वे ये भी बता दें कि अब उन्हें दलितों, पिछड़ों की याद क्यों आई। क्यों पहली बार में ही इन लोगों को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं दिया। जाहिर है इस बार नजरें ओबीसी-दलित कार्ड की राजनीति पर हैं।

भाजपा जानती है कि अगर बहुमत से चुनाव जीतना है तो 35 प्रतिशत से ज़्यादा वोट शेयर चाहिए। इसके लिए दलित और ओबीसी को अपने साथ रखना जरूरी है। आम चुनावों के पहले भाजपा को उत्तरप्रदेश की सत्ता भी बचाना है। इसलिए मंत्रिपरिषद विस्तार में उत्तरप्रदेश से सबसे अधिक मंत्री लिए गए हैं। सात मंत्रियों में एक ब्राह्मण को छोड़कर बाकी छह का ताल्लुक ओबीसी और दलित समाज से है और वो गैर-यादव और गैर-जाटव हैं। क्योंकि यादव सपा के और जाटव बसपा के वोटबैंक हैं। इसलिए उनके अलावा बाकी तमाम पिछड़ी जातियों को लुभाने पर भाजपा का ध्यान है।

मोदीजी ने सदन में दलित-ओबीसी सहानुभूति कार्ड खेलने के साथ ही इस सत्र में भाजपा की पहली संसदीय दल की बैठक में भाजपा सांसदों से कहा कि वह सच्ची बातों को जनता के बीच लेकर जाएं और बार-बार बताएं। क्योंकि अगर आप सच्ची बातें कहना छोड़ देंगे तो उसकी खाली जगह को झूठ भर देगा। सच के लिए उनके इस आग्रह को केवल भाजपा सांसदों को ही नहीं, देश के तमाम जागरुक नागरिकों को मानना चाहिए। क्योंकि देश ने इस बात को कई बार अनुभव किया है कि सच को जबरन हटाकर कैसे झूठी बातें, झूठे दावे उसकी जगह हड़पने आ जाते हैं। वाकई सच बोलना छोड़ना नहीं चाहिए, फिर चाहे कोई भी रूठे।

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