कांग्रेस भय, भ्रम और भटकाव के भंवर से निकले

कांग्रेस भय, भ्रम और भटकाव के भंवर से निकले

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भारतीय जनता पार्टी और उसकी केन्द्र व राज्य सरकारों के खिलाफ सघन रूप से संघर्ष करने में नाकाम और संसद के भीतर व बाहर कमजोर पड़ती कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने जहां भ्रम है, वहीं उसका काडर भ्रमित हो चुका है। इन दोनों से समग्र पार्टी में भटकाव की स्थिति दिखलाई पड़ रही है। इस भंवर से जब तक कांग्रेस बाहर नहीं निकलती, उसके लिए भाजपा से टकराना तथा मोदी सरकार के खिलाफ लड़ पाना असंभव है। कांग्रेस की हाल की घटनाएं कुछ इसी तरफ इंगित करती हैं। 

पार्टी में असमंजस न केवल खड़ा बल्कि क्षितिजीय भी है। शुरुआत तो पार्टी का नेतृत्व करने वाले परिवार से ही प्रारंभ हो जाती है। 90 के दशक में सोनिया गांधी द्वारा पार्टी के सूत्र अपने हाथों में लेने के बाद से पार्टी लगातार संगठित होती गई, जिसने न केवल अटल बिहारी वाजपेयी-लालकृष्ण आडवाणी-मुरली मनोहर जोशी समेत अनेक दिग्गजों द्वारा संचालित भाजपा का मुकाबला किया था, बल्कि 2004 से लेकर 2014 तक अपनी पार्टी के नेतृत्व में यूपीए की सरकार भी चलाई। स्वयं कोई पद न लेकर सोनिया एवं राहुल गांधी ने उदाहरण तो प्रस्तुत किया परंतु वे इस सरकार को 2014 के चुनावों में खो बैठे थे। इसके साथ ही पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई।

2019 में तो वह 44 सीटों पर सिकुड़ गई थी। इसके साथ ही पार्टी के भीतर और बाहर सवाल उठने लगा कि क्या इसका कारण कांग्रेस का परिवारवाद है। बीच में सोनिया गांधी ने अपनी जगह राहुल को दे दी, बाद में वे अस्थायी अध्यक्ष बनीं और अंतत: पूर्णकालिक अध्यक्ष। इस बीच प्रियंका गांधी भी महासचिव के रूप में पार्टी में आईं और उत्तर प्रदेश की वे प्रभारी भी हैं। अलग-अलग समय में कभी सोनिया, कभी राहुल तो कभी दबे स्वरों में प्रियंका को कांग्रेस की कमान देने की मांगें उठती रहती हैं। परिवार के बाहर नेतृत्व की जिम्मेदारी देने की भी चर्चा गाहे-बगाहे होती हैं। इस परिवार या पार्टी के फोरम पर बहुत स्पष्टता से कभी या एकमत से नहीं कहा गया कि अध्यक्ष कौन रहे या न रहे। इस परिवार और पार्टी को यह तय करना होगा कि नेतृत्व किसी ऐेसे व्यक्ति को दिया जाये, तो पार्टी वह भी प्रयोग कर ले परंतु उसके बाद न नेतृत्व पर ऊहापोह रहे और न ही ऐसे अध्यक्ष का कार्यकाल किसी सीताराम केसरी की तरह हो, जिन्हें बीच कार्यकाल में अपमानित कर हटा दिया जाये। 

अन्य दलों से नेताओं को हांककर अपने बाड़े में लाने का खेल भाजपा द्वारा लालच या भय से कराया जाना जगजाहिर हो चुका है। भाजपा के इस खेल से कम से कम गांधी परिवार तो मुक्त हो चुका है और निचला काडर भी। समस्या है बीच वाले उन नेताओं की जिन्होंने कांग्रेस की सत्ता रहते हुए अकूत संपत्तियां बनाई हैं या फिर विभिन्न तरह के ऐसे घोटाले किये हैं, जिनके कारण उन्हें रात को सपनों में उनके बंगलों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर केन्द्रीय जांच एजेंसियों के छापे पड़ते दिखलाई देते हैं। इन नेताओं को भाजपा सरकारों के जनविरोधी कार्यों का या तो विरोध करना संभव नहीं रह जाता अथवा वे सुविधापूर्ण ढंग से चुप्पी साध लेते हैं।

सड़कों पर जनता या सामान्य कार्यकर्ताओं के साथ संघर्षों में पसीना बहाना वे पहले ही भूल चुके हैं। कांग्रेस में ऐसे कई बड़े नेता हैं जो संगठन और संसद में पद काबिज किये बैठे हैं लेकिन उनका योगदान शून्य है। ऐसे लोगों में बड़े उद्योगपति, वकील, डाक्टर आदि हैं जो कांग्रेस के बूते शून्य से शिखर तक तो पहुंचे हैं, लेकिन वे न नागरिकता कानून या कृषि कानून के खिलाफ चल रहे संघर्षों के पीड़ितों को कोई मदद कर सके, न ही सरकार के इशारे पर गिरफ्तार किये गये मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र-युवा आंदोलनकारियों को झूठे मुकदमों से छुड़ा सके; और न ही कोरोना काल में लोगों को मदद पहुंचा सके हैं। 

हालांकि राहुल कह चुके हैं कि जिन्हें डर लगता है वे पार्टी छोड़कर चले जायें। सही बात तो यह है कि कांग्रेस नेतृत्व को ऐसे नेताओं की शिनाख़्त कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए और उनकी जगह पर ऐसे कार्यकर्ताओं को बिठाना चाहिए जो जनसंघर्षों और पार्टी की मजबूती की दिशा में कार्य कर रहे हैं। यह ऐसा वक्त है जब पार्टी की नसों में सच्चे मायनों में युवा खून चढ़ाना होगा। पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह एवं नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जो हुआ वह पार्टी की दुर्दशा बतलाने के लिए काफी है। 

इन दोनों ही आयामों से एक तीसरा आयाम उभरकर आता है- पार्टी के भटकाव का। एक तरह से पूरा संगठन ही भटका हुआ दिख रहा है, जिसे यह नहीं पता कि आखिर उसे जाना किधर है; या फिर जाना भी है कि नहीं। जब तक नेतृत्व का भ्रम और दूसरी पंक्ति के नेताओं में भय का वातावरण रहेगा, कांग्रेस राजनीति के बियाबान में भटकती रहेगी। यही उसका अपना बनाया हुआ भंवर है, जिससे बाहर उसे और कोई नहीं निकाल सकता- सिवाय उसके।

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