स्टेज पर ट्रे लिए खड़ी शोपीस सी लडक़ी

स्टेज पर ट्रे लिए खड़ी शोपीस सी लडक़ी

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-सुनील कुमार॥

छत्तीसगढ़ में अभी खबर वीडियो के साथ तैर रही है कि एक आदिवासी इलाके में महिला सरपंच का पति किस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, और कैसे एक म्युनिसिपल इलाके में महिला नगर पालिका अध्यक्ष का पति गुंडागर्दी कर रहा है। कानून बनने से महिला आरक्षित सीट पर महिला पंच-सरपंच, या पार्षद-महापौर बन जाती हैं लेकिन उनके नाम पर उनके पति ही दफ्तर चलते हैं, गुंडागर्दी करते हैं। महिला की सहमति बिना किस तरह वसूली-उगाही करते हैं। कानून ने गांव और शहर में तो महिला को बराबरी का दर्जा दे दिया है, लेकिन घर के भीतर वह गुलाम ही है।

अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की सोच सचमुच ही हो तो कुछ बातों के बारे में सोचना जरूरी है। हममें से हर कोई अपने बचपन से ही स्कूलों में और दूसरे जलसों में यह देखते आए हैं कि किस तरह स्टेज पर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति को माला पहना रहे हैं या शॉल, या उन्हें कोई किताब, स्मृति चिन्ह भेंट कर रहे हैं। इन सबको एक ट्रे में लेकर वहां सुंदर से कपड़ों में एक लडक़ी या महिला को खड़ा कर दिया जाता है। सौ फीसदी मामलों में इन्हें सजावट के सामान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इनकी और कोई भूमिका नहीं होती, इनका कहीं नाम भी नहीं लिया जाता, और इनकी तरफ कोई गौर से देखते तक नहीं हैं। तो एक मजदूर की ऐसी भूमिका में एक पुतले की तरह सजाकर किसी महिला को ऐसे खड़ा करना तमाम महिलाओं के अपमान से कम नहीं है। इस बारे में सोचना चाहिए कि न तो मुख्य अतिथि की भूमिका में आमतौर पर महिलाएं रहतीं, न ही किसी संस्था या संगठन के प्रमुख के रूप में मुख्य अतिथि का स्वागत करने वाली महिला रहती, और महिलाओं को इस स्टेज पर जगह आमतौर पर सिर्फ ट्रे थामे हुए सजावट के सामान की तरह मिलती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

एक ऐसी तस्वीर की कल्पना क्या की जा सकती है जिसमें मुख्य अतिथि कोई महिला हो, स्वागत करने वाली कोई महिला हो, और कोई पुरुष ट्रे में माला या गुलदस्ता लेकर मदद करने के लिए वहां खड़े हुए हो ? क्या ऐसा किया जा सकता है? इसकी कल्पना भी मुश्किल होगी क्योंकि हमें सांस्कृतिक रूप से यही समझाया गया है कि स्टेज पर दिया जलाने के लिए दीपक लेकर एक लडक़ी को या महिला को खड़े होना है, वह दिया जलाने वाले लोग आमतौर पर पुरुष होंगे। यह एक अलग बात है कि जिस प्रतिमा के सामने दिया जलाया जाएगा वह आमतौर पर एक महिला की होगी सरस्वती की। लेकिन सच तो यह है कि एक महिला को महत्व पाने के लिए हिंदुस्तान में आमतौर पर प्रतिमा बनना जरूरी होता है चाहे वह कोई धार्मिक प्रतिमा हो चाहे वह ओलंपिक से मेडल लेकर या अंतरिक्ष जाकर लौटी हुई भारतवंशी सुनीता विलियम्स हो। प्रतिमा के दर्जे पर पहुंचने के पहले सम्मान की कोई गुंजाइश नहीं है। स्कूल कॉलेज के बच्चों के सामने से स्टेज पर ट्रे थामे महिला का नजारा खत्म करना होगा, तभी इस पीढ़ी का दिमाग ठीक हो पायेगा।

इन दिनों सोशल मीडिया पर महिलाओं को लेकर बहुत किस्म की बहस चल रही है, और कई महिलाओं ने खुलकर इस बात को लिखा है कि उनके परिवार के बुजुर्ग साफ-साफ यह कहते थे कि उन्हें मिक्सी में बनाई हुई चटनी पसंद नहीं है, उन्हें सिलबट्टे पर हाथों से पीसी हुई चटनी ही अच्छी लगती है, या कुछ बुजुर्ग ऐसे भी रहते थे जो कहते थे कि उन्हें कुकर में बनाया हुआ खाना अच्छा नहीं लगता, उनके लिए अलग-अलग बर्तनों में बिना किसी प्रेशर के खाना पकाया जाए, तो ही वे खा सकते हैं। दुनिया के जितने किस्म के उपकरण रसोईघर में महिला के काम में मदद करने के लिए बने हैं, उनसे लोगों का ऐसा लगता है कि स्वाद फीका आता है। जबकि ऐसी कोई वजह नहीं है और सिलबट्टे की जिद करना या बटलोई में दाल पकाने की जिद करना, इन सबका बोझ सीधा-सीधा महिला के ऊपर जाता है। कुछ लोगों को गैस चूल्हे पर बनी रोटी पसंद नहीं आती और अगर उनके सामने विकल्प रहे तो वे घर की महिला से कहें कि लकड़ी के चूल्हे पर बनी हुई रोटी ही सबसे अच्छी रहती है। यह एक अलग बात है कि अकेले हिंदुस्तान में हर बरस 10 लाख से अधिक महिलाएं घरेलू चूल्हे से होने वाले प्रदूषण से मारी जाती हैं। यह आंकड़ा अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ने पिछले 50 वर्षों में भारत आकर लगातार काम करके वैज्ञानिक जांच-पड़ताल के बाद निकाला है।

एक महिला का शोषण करने के जितने तरीके हो सकते हैं उन सबमें हिंदुस्तान ने एक महारत हासिल की हुई है। विख्यात उपन्यासकार और कहानी लेखिका शिवानी की एक कहानी याद पड़ती है जिसमें पहाड़ी पर बसे एक परिवार में बूढ़ा पति अपनी जवान बीवी के सामने खाना खाने के बाद उसी थाली को उसकी तरफ आगे बढ़ा देता था और उम्मीद करता था कि वह जूठन खाए और उसका चेहरा भी देखते रहता था कि थाली उसकी तरफ बढ़ाने पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। घरों में यह आम बात है कि आदमी पहले खा लेते हैं लडक़े खा लेते हैं और लड़कियों और महिलाओं की बारी सबसे आखिर में आती है। घर में अगर एक बच्चे को पढ़ाने की गुंजाइश है तो वह लडक़े को पढ़ाया जाएगा, एक बच्चे के इलाज की गुंजाइश है तो वह लडक़े का इलाज होगा। पहले भी इसी जगह पर हम इस बात को लिख चुके हैं कि किस तरह मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल में एक सर्वे किया था कि वहां पर जिन बच्चों को कैंसर की शिनाख्त होती है उनमें से लडक़ों को तो तकरीबन सभी को इलाज के लिए वापस लाया, लेकिन लड़कियों में से गिनी-चुनी ही ऐसी रहती हैं जिनको मां-बाप इलाज के लिए वापस लाते हैं। लडक़ी को भला खर्च करके क्यों जिन्दा रखें?

लड़कियों और महिलाओं से गैरबराबरी के बर्ताव, और उन पर हिंसा के बारे में लगातार बात करने की जरूरत है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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