क्या फिर साथ आएंगे शिवसेना-भाजपा..

क्या फिर साथ आएंगे शिवसेना-भाजपा..

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महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार में तीनों प्रमुख घटक दलों यानी शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है, सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी, भाजपा का आपरेशन लोटस यहां कामयाब नहीं होगा, ऐसे कई दावे यहां समय-समय पर किए जाते रहे हैं। दरअसल 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भारतीय राजनीति का एक बड़ा फेरबदल देखने मिला। मुख्यमंत्री की कुर्सी के नाम पर शिवसेना और भाजपा का 30 साल पुराना गठबंधन टूट गया था। चुनाव में भाजपा और शिवसेना साथ थे, लेकिन परिणाम आने के बाद जब भाजपा ने शिवसेना को मुख्यमंत्री की कुर्सी देने में आनाकानी दिखलाई और देवेंद्र फड़नवीस ने गुपचुप तरीके से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। तो शिवसेना ने भी भाजपा की इस रणनीति का जवाब देने का मन बना लिया। इसमें संकटमोचक बने शरद पवार।

जिन्होंने न केवल देवेंद्र फड़नवीस के साथ गए अपने भतीजे अजित पवार को वापस बुला लिया, बल्कि कांग्रेस को साथ लेकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनवाई। इस सरकार के मुखिया बने उद्धव ठाकरे। इस तरह शिवसेना की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की हसरत पूरी हुई और राकांपा और कांग्रेस को सत्ता में भागीदारी का मौका मिला। वैचारिक तौर पर शिवसेना राकांपा और कांग्रेस से काफी अलग है, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति के कारण वह सही मायनों में भाजपा की सहयोगी लगती है। लेकिन सरकार चलाने के लिए तीनों दलों ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय किया, जिसमें विचारधारा पर सामंजस्य तीनों दलों को करना पड़ा। मगर एक अरसे के बाद भी शिवसेना और कांग्रेस के बीच सहजता नजर नहीं आ रही है। बीच-बीच में ऐसे बयान दोनों ओर से आते हैं, जिनसे लगता है कि ये गठबंधन टूट जाएगा।

हाल ही में महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने भविष्य में कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने की संभावनाएं व्यक्त कीं, तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की ओर से उन्हें नाम लिए बिना कड़ा जवाब दिया गया कि अगर हम लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं करेंगे और अकेले चुनाव में लड़ने जाने की बात करेंगे तो लोग हमें चप्पलों से पीटेंगे। इस बयान को सुनकर एकबारगी यही लगता है कि महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार को कार्यकाल पूरा होने तक चलाया जाएगा। कोई घटक दल अलग नहीं होगा। लेकिन पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिनसे शिवसेना और भाजपा के बीच बर्फ टूटती दिख रही है।

कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच दिल्ली में 30-35 मिनट की मुलाकात हुई। मुख्यमंत्री ठाकरे ने महाराष्ट्र में मराठों के लिए आरक्षण, नौकरी और कॉलेज सीट में कोटा देने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से चर्चा करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, और इस के बाद प्रधानमंत्री से अलग भी कुछ देर चर्चा की। बताया जा रहा है कि इस निजी चर्चा में शिवसेना-भाजपा गठबंधन के टूटने की परिस्थितियों को नए सिरे से समझने की कोशिश दोनों पक्षों की ओर से हुई होगी। इस मुलाकात के बाद भाजपा के मुखर आलोचक संजय राउत ने मोदीजी को देश का शीर्ष नेता बताया, क्या यह महज संयोग था। और अब शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक ने उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि बहुत देर होने से पहले भाजपा के साथ मेलमिलाप करना ही ठीक रहेगा।

गौरतलब है कि श्री सरनाईक 175 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच का सामना कर रहे हैं। 10 जून को उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में उन्होंने अनुरोध किया है कि वह शिवसेना के नेताओं को केंद्रीय जांच एजेंसियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए भाजपा से हाथ मिला लें। श्री सरनाईक के मुताबिक गठबंधन भले टूट गया है, लेकिन भाजपा-शिवसेना के नेताओं के बीच व्यक्तिगत और सौहार्द्रपूर्ण संबंध बने हुए हैं। बहुत देर होने से पहले मेल-मिलाप करना बेहतर रहेगा। सरनाईक ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा कि , ‘अभिमन्यु और कर्ण की तरह स्वयं का बलिदान करने की जगह मैं अर्जुन की तरह युद्ध लड़ने में विश्वास करता हूं। यही कारण है कि अपने नेताओं या सरकार से कोई मदद लिए बिना मैं पिछले सात महीने से अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहा हूं।’ बता दें कि बीते तीन महीनों में ईडी ने श्री सरनाईक को तीन बार तलब किया है। उनका कहना है कि केंद्रीय एजेंसियां उन्हें बेवजह परेशान कर रही हैं। उन्होंने कहा कि वह बीते सात महीने से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि उन्हें राज्य सरकार से कोई समर्थन नहीं मिला है। ठाणे जिले से विधायक सरनाईक ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस और राकांपा, शिवसेना में दरार डालने का काम कर रही हैं।

जांच से बचने के लिए शिवसेना के एक विधायक अगर फिर से भाजपा के साथ गठबंधन की मांग कर रहे हैं, तो यह मुद्दा देश में जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर गंभीर संकट का द्योतक है। भाजपा पर यह आरोप कई बार लग चुके हैं कि राजनैतिक बदले के लिए वह जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करती है। अब इस पत्र से इस बात की पुष्टि ही हो रही है। वैसे शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा है कि इस पत्र में केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उत्पीड़न पर बात की गई है। अगर उन्होंने इस उत्पीड़न की वजह से यह पत्र लिखा है तो सभी को इस बात का संज्ञान लेने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है।

इस क्यों का जवाब मालूम तो सभी को होगा, लेकिन कोई इसे खुलकर कहेगा या नहीं, ये देखना होगा। वैसे अभी शिवसेना और भाजपा के बीच अगर बर्फ पिघल कर नए रिश्तों की शुरुआत होती भी है, तो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर विवाद कैसे खत्म होगा। शिवसेना तो पांच साल तक यह कुर्सी चाहती है और इसमें राकांपा-कांग्रेस उसकी मदद कर रहे हैं। क्या भाजपा महाराष्ट्र सरकार में शामिल होने के लिए शिवसेना के साथ छोटे भाई की भूमिका में आएगी, ये देखना होगा।

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