जब राजधर्म निभाना नहीं आता, तो राज कैसा.?

जब राजधर्म निभाना नहीं आता, तो राज कैसा.?

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राजधर्म निभाने में फिर चूक..

कोरोना के बढ़ते मामलों से देश का दम घुट रहा है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, प्रशासनिक सक्षमता और लोकतांत्रिक तकाजों का गला तो सात सालों से घोंटा ही जा रहा है, देश के मीडिया के जमीर को भी काफी हद तक मारने में मोदी सरकार सफल रही है। और अब ऐसा लग रहा है कि जो रही-सही कसर थी, वो जनता को तड़पा कर पूरी की जा रही है। अदालतें हर रोज किसी न किसी राज्य सरकार से सवाल पूछ रही हैं कि वो इलाज और कोरोना से सुरक्षा प्रदान के लिए क्या कर रही है।

अधिकारी व्यवस्था के आगे खुद को लाचार मान रहे हैं। सरकारें हाथ खड़ा कर रही हैं कि उनके पास वैक्सीन नहीं हैं और कई बार दूसरों के आगे हाथ जोड़ रही हैं कि किसी तरह आक्सीजन की आपूर्ति हो जाए। इस बीच वैक्सीन और दवाओं की कालाबाजारी करने वाले अपनी पांचों उंगलियां घी में डूबी देख रहे हैं। अगर वे पकड़ा भी जाते हैं तो उन पर देशद्रोह का इल्जाम शायद नहीं लगेगा, क्योंकि उसके लिए सरकार की आलोचना करना या फिर मरी हुई गायों को ले जाना जरूरी होता है।

बहरहाल, केंद्र सरकार समेत कई राज्य सरकारें यही चाहती हैं कि कोरोना से बदहाली की असल तस्वीर जनता तक न पहुंचे। गोदी मीडिया भी कई दिनों से व्यवस्था में गड़बड़ है का राग अलाप कर केंद्र सरकार को बचाने में जुटा है। कुछ दिन पहले ही ट्विटर ने भारत सरकार की मांग पर कई ऐसे ट्वीट को ब्लॉक कर दिया था, जिनमें अस्पताल और चिकित्सा सुविधाओं को लेकर सरकार की आलोचना की गई थी। और अब फेसबुक ने भी ट्विटर के समान कदम उठाया था। दरअसल हैशटैग रिजाइन मोदी नाम से ढेरों पोस्ट ट्विटर और फेसबुक पर आने लगीं थीं, जो लोगों के मोदी सरकार के लिए गुस्से को जाहिर कर रही थीं। फेसबुक ने इस हैशटैग के साथ किए गए पोस्ट्स को छुपाना शुरू कर दिया, जिसके बाद इस हैशटैग पर क्लिक करने पर कोई भी पोस्ट नहीं नजर आ रहा था।

फेसबुक ने अपनी दलील दी कि हम कम्युनिटी स्टैंडर्ड का पालन कर रहे हैं,  इसलिए ये वाले पोस्ट नहीं दिखाएंगे। अब चूंकि पोस्ट छुपी हुई थीं तो यह भी पता नहीं चल पा रहा था कि इन पोस्ट्स में किन कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन किया गया है। हैशटैग को छुपाने की खबर दुनिया में तेजी से फैली, आखिर फेसबुक ने 4 घंटे बाद इस पाबंदी को हटा लिया। फेसबुक के प्रवक्ता एंडी स्टोन ने कहा कि हमने गलती से इस हैशटैग को अस्थायी तौर पर ब्लॉक कर दिया था, न कि हमसे भारत की सरकार ने ऐसा करने के लिए कहा था। इसलिए हमने इसे फिर से बहाल कर दिया है।

फेसबुक की इस सफाई से पता चलता है कि दाल में कुछ काला है। वैसे मोदी सरकार के मीडिया मैनेजमेंट को देखें तो सारी दाल ही काली नजर आती है। इसलिए तो कई नामचीन पत्रकार हालात पर दुख व्यक्त करने के बावजूद खुलकर प्रधानमंत्री मोदी को इन गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं बतला पा रहे। वे अधिकारियों को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं। हालांकि विदेशी मीडिया इस वक्त भारत की तकलीफ पर दुख भी जतला रहा है और खुल कर मोदी सरकार को आईना भी दिखा रहा है। आस्ट्रेलिया के अखबार ‘द ऑस्ट्रेलियन’ ने लिखा कि मोदी की वजह से भारत कयामत की स्थिति में पहुंच गया है। यहां के एक अन्य अखबार ‘फाइनेंशियल रिव्यू’ में एक कार्टून है, जिसमें हाथी की सूंड़ पर भारत का नक़्शा दिखाया गया है और उसके ऊपर पर मोदी माइक लेकर बैठे हैं। शीर्षक है,’निर्बल हाथी पर सवार मौत?’ गल्फ़ न्यूज ने अपने पहले पन्ने पर लिखा ‘सांसों के लिए संघर्ष करता भारत’। वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि इस तबाही से बचा जा सकता था।

संक्रमण के खतरे के बीच स्टेडियम्स, कुंभ और चुनावी रैलियों की भीड़ ने सब बर्बाद कर दिया। टाइम मैगजीन ने लिखा, ‘ये नरक है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की विफलता ने भारत का कोरोना संकट और गहरा कर दिया है।’ ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने पहले पन्ने पर श्मशान में जलती चिताओं, ठंडी पड़ी राख और, लाशों को जलाने की जगह ढूंढते लोगों की तस्वीर के साथ लिखा कि भारत में कोविड-19 के बढ़ते कहर के बीच मौतों की गिनती में बेमानी।’ ब्रिटेन के अखबार गार्जियन ने अपने संपादकीय में सलाह दी कि प्रधानमंत्री मोदी को अपनी गलतियां मानकर उसमें सुधार करना चाहिए। अगर वो अपने पुराने रवैये पर कायम रहते हैं तो इतिहास उनका कठोरता से मूल्यांकन करेगा।

भविष्य में मोदीजी का मूल्यांकन कैसे होगा, ये तो बाद में पता चलेगा। फिलहाल ये नजर आ रहा है कि उन्हें राजधर्म के पालन का दूसरा मौका इतिहास ने दिया है, वो इस बार भी चूक रहे हैं। और जब राजधर्म निभाना नहीं आता, तो राज कैसा।

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