व्यवस्था की अभूतपूर्व नाकामयाबी..

व्यवस्था की अभूतपूर्व नाकामयाबी..

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-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तान भी बड़ा अजीब देश है। यहां से आईआईएम से निकले हुए नौजवान दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां चला रहे हैं, यहां के आईआईटी से निकले हुए इंजीनियर दुनिया भर में तकनीक विकसित कर रहे हैं, लेकिन जब देश के भीतर पिछले एक बरस से छाए हुए कोरोना वायरस के खतरे से जूझने की बात आई, तो ऐसे तमाम मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग के जानकार लोगों का हुनर धरे रह गया क्योंकि भारत सरकार ने शायद ऐसे हुनर को छुआ भी नहीं। नतीजा यह निकला कि आज देश में कोरोना से मौतों का जो सिलसिला चल रहा है, न तो उसे रोका जा सक रहा है, और ना ही मौतों के बाद लोगों को एक इज्जत का अंतिम संस्कार नसीब हो रहा है।

कहने के लिए तो इस देश में आपदा प्रबंधन की योजनाएं दिल्ली से निकलकर जिलों तक पहुंचती हैं, और बाढ़ के महीनों में लोगों को बचाने के लिए रबर की बोट तक पहले से खरीदकर रख ली जाती है। लेकिन जिस कोरोना का प्रकोप साल भर पहले शुरू हो चुका है, उस कोरोना से जूझने के लिए इस देश ने इस साल में कोई योजना बनाई हो ऐसा दिख नहीं रहा है। जिस देश में केंद्र सरकार चला रही पार्टी आधा दर्जन प्रदेशों में चुनाव लडऩे की अभूतपूर्व तैयारी कर सकती है, देश के साथ-साथ विदेश तक जाकर प्रचार कर सकती है, तो क्या उस पार्टी की सरकार केंद्र सरकार की सारी ताकत रखते हुए भी हिंदुस्तान के नक्शे को देखकर कोरोना के आज के हाल का अंदाज नहीं लगा सकती थी? क्या वह राज्यों को इस हिसाब से तैयार नहीं कर सकती थी? लेकिन यह सवाल तब अप्रासंगिक हो जाते हैं जब केंद्र सरकार चला रही पार्टी इतनी गैरजिम्मेदारी के साथ चुनावी राज्यों में चुनाव प्रचार करने में लगी है, और करोड़ों लोगों के भीड़ वाले कुंभ को इजाजत दे रही है। यह पूरा सिलसिला इस देश में राजनीतिक मनमानी के सामने सरकारी ढांचे के दंडवत हो जाने का है और ऐसा लगता है कि इस लोकतंत्र में बहुमत से बनी हुई सरकार की राजनीतिक मनमानी सबसे ऊपर है, और शासकीय तंत्र उसके सामने बेबस रह गया है.

बहुत मामूली समझ रखने वाले नौकरशाह भी यह तैयारी कर सकते थे कि कोरोना की पहली लहर के बाद और दूसरी लहर के पहले, किन-किन राज्यों में तैयारियां कैसी हैं, और जहां पर तैयारियों में कमी है वहां पर क्या किया जाना है। वैसे तो एक तरफ महामारी एक्ट के तहत देश के सारे अधिकार अपने हाथों में लेकर केंद्र सरकार ने राज्यों को पिछले बरस के लॉकडाउन के दौरान घंटे-घंटे में हुक्म भेजे, और क्या खुला रहेगा क्या बंद रहेगा, इन नियमों को राज्यों पर लादा। राज्यों से हर घंटे में जवाब मांगे, जानकारी मांगी, उन्हें नोटिस दिए। लेकिन किस राज्य में कोरोना की दूसरी लहर कहां तक पहुंच सकती है उसमें कितने लोग बीमार हो सकते हैं, कितने को ऑक्सीजन लग सकती है, और कितने को वेंटिलेटर लगेंगे, इसका कोई अंदाज भी शायद लगाया नहीं गया। ना तो केंद्र सरकार ने यह अंदाज लगाया, और ना ही महाराष्ट्र जैसे संपन्न और विकसित राज्य से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे नए और छोटे राज्य तक किसी भी राज्य में कोरोना की इस दूसरी लहर से निपटने की तैयारी नहीं की।

नतीजा यह है कि आज बीमार को अस्पताल का बिस्तर नसीब नहीं है, जिसे बिस्तर मिल गया उसे ऑक्सीजन नहीं है, और जिसे ऑक्सीजन के बाद भी बचाया नहीं जा सका उसके अंतिम संस्कार के लिए मरघट में भी जगह नहीं है। ना दवाई है, न ऑक्सीजन है, न वेंटीलेटर हैं, और ना ही एंबुलेंस है। कुल मिलाकर तस्वीर ऐसी है कि कोरोना की पहली लहर के बाद से कोरोना की दूसरी लहर के बीच इस देश और इसके प्रदेशों ने कुछ भी नहीं सीखा। जब कोरोना का दूसरा वार हुआ तो घुटनों पर लगी चोट से बिलबिलाने के अंदाज में सरकारों ने आनन-फानन घटिया, कामचलाऊ इंतजाम किए जो कि नाकाफी तो थे ही, जो जनता के पैसों की बर्बादी भी थे, और इंसानी जिंदगी की बर्बादी तो सबसे ऊपर है ही। आज देश के अधिकतर प्रदेशों का हाल देखें तो केंद्र और राज्य सरकारों ने निजी अस्पतालों को लेकर, कोरोना की जांच से लेकर, वेंटिलेटर तक, किसी इंतजाम को खुद परखा नहीं है। सरकार ने अपने खुद के मरघटों की क्षमता को भी नहीं परखा और अब बदहवास के अंदाज में रातों-रात कहीं भी अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है। यह पूरा सिलसिला बतलाता है कि सरकारों की प्राथमिकताएं महज राजनीतिक रहीं, चुनावी रहीं, आत्मरक्षा की रहीं, जीत की महत्वाकांक्षा की रहीं, लेकिन कोरोना के, सामने खड़े हुए दूसरे दौर से लडऩे की तैयारी की बिल्कुल नहीं रही। आज की यह पूरी नौबत भारत और इसके प्रदेशों की सरकारों की नाकामयाबी की है, और इनसे यह भी पता लगता है कि सरकारों में स्थाई रूप से बसे हुए अफसरों में से अधिक की यह क्षमता नहीं रह गई है कि वह देश-प्रदेश के राजनेताओं की मनमानी को ना कह सके। राष्ट्रीय स्तर पर जो चुने जाने वाले अफसर हैं, उनके बीच 5 बरस के राजनीतिक मुखियाओं की यह दहशत अभूतपूर्व है। किसने यह सोचा था कि अंग्रेजों के वक्त से एक कड़ी शासन व्यवस्था चलाने के लिए नौकरशाही का जो ढांचा खड़ा किया गया था, वह नेताओं के सामने इस तरह दंडवत पड़े रहेगा?

आज हिंदुस्तान के प्रदेशों की शासन की क्षमता को देखें तो यह साफ दिखता है कि क्षमता तो बहुत है, लेकिन उसके इस्तेमाल की कोई तैयारी नहीं थी। जिन अफसरों पर 5 बरस की सरकारों के पहले और बाद भी, सरकार की जिम्मेदारी रहती है, उन्होंने वक्त पर अपना काम नहीं किया, वक्त पर तैयारी नहीं की, ऑक्सीजन की जरूरत का हिसाब नहीं लगाया, अस्पतालों के बिस्तर तैयार नहीं किए, जांच का इंतजाम नहीं किया, टीकों का इंतजाम नहीं किया, और अंतिम संस्कार का इंतजाम भी नहीं किया। राजनीतिक मुखिया तो अपने अच्छे और बुरे कामों से 5 बरस बाद अपनी पार्टी सहित बाहर जा सकते हैं, लेकिन जो अफसर अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी के लिए ऊंचे ओहदों पर आते हैं, उन अफसरों ने इस देश में अपने-आपको पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है।

नेताओं से तो बहुत अच्छी नीयत की उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन जिन अफसरों पर नेहरू और पटेल के वक्त से जिम्मा डाला गया था, उन अफसरों ने अपने-आपको राजनीतिक मनमानी के सामने रबड़ का बबुआ साबित किया है। ऐसा लगता है कि भारत और उसके प्रदेशों की प्रशासनिक व्यवस्था में अपने ही देश के आईआईएम और आईआईटी की विशेषज्ञता को लेकर न सम्मान हैं और न भरोसा। इन संस्थानों से निकले हुए लोग दुनिया भर में बड़े-बड़े कारोबार चला रहे हैं, बड़ी-बड़ी जगहों पर गैर सरकारी काम भी कर रहे हैं और सरकारी काम भी, लेकिन प्रशासन की ताकत अफसरों को इतना बददिमाग कर देती है कि वे हर मामले में अपने-आपको जानकार और विशेषज्ञ मान लेते हैं, और असल जिंदगी की जो असल विशेषज्ञता रहती है उसके लिए इनके मन में एक आला दर्जे की हिकारत बैठी रहती है। यह नौबत कोरोना से निपट जाने के बाद यह सोचने की है कि इस देश की शासन प्रणाली में बड़े अफसरों की कौन सी भूमिका आगे काम में ली जानी चाहिए।

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