खुदा बने बैठे नेताओं से खुदाबख्श लायब्रेरी बचाने की मुहिम..

खुदा बने बैठे नेताओं से खुदाबख्श लायब्रेरी बचाने की मुहिम..

Page Visited: 454
0 0
Read Time:8 Minute, 15 Second

चिकने-चौड़े हाईवे, एक-दूसरे को काटते फ्लाई ओवर, उनके नीचे और ऊपर से गुजरती मेट्रो, चारों ओर सीमेंट और कांक्रीट के बने विशालकाय ढांचे, देश में इसी को विकास का पर्याय मान लिया गया है। कभी कोई नेता सत्ता में आने के बाद किसी शहर को शंघाई बनाने का ऐलान करता है, किसी शहर को क्योटो। इन शहरों की चमक-धमक वाकई निराली है, लेकिन इसके साथ-साथ वहां इतिहास सांस ले सके, इसकी गुंजाइश भी जरूर रखी गई है। दुनिया के अधिकतर विकसित देशों में शहरीकरण और सौंदर्यीकरण के साथ-साथ ऐतिहासिक विरासत को संजोने का काम किया गया। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा है।

भारत में तो प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ऐतिहासिक धरोहरों का अमूल्य खजाना है, लेकिन पूंजीवादी विकास के मॉडल में हम न अपनी प्राकृतिक संपदा को संभाल रहे हैं, न इतिहास की विरासत को। इसका ताजा नमूना है, एक फ्लाईओवर के लिए पटना के ऐतिहासिक खुदाबख्श पुस्तकालय के एक हिस्से को तोड़ने का प्रस्ताव।

करीब 130 साल पुराने खुदाबख्श पुस्तकालय को यूनेस्को ने हेरिटेज बिल्डिंग घोषित कर रखा है। खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी 1891 में खुदाबख्श खां ने खोली थी,  तब अपनी तरह की ऐसी पहली लाइब्रेरी थी जिसमें आम लोग जा सकते थे। करीब 12 साल बाद भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन पटना में गंगा किनारे स्थित इस लाइब्रेरी का दौरा करने पहुंचे थे। इसमें संग्रहित पांडुलिपियों को देखकर वे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसके विकास के लिए धन उपलब्ध कराया। आभार जताने के लिए लाइब्रेरी की तरफ से 1905 में कर्जन रीडिंग हॉल की स्थापना की गई। तब से यह रीडिंग हॉल हमेशा चहल-पहल भरा रहा है, जहां आकर दुनियाभर के छात्र, विद्वान और शोधकर्ता पठन-पाठन करते हैं। यहां हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के राष्ट्रीय व स्थानीय समाचार पत्र और पत्रिकाएं उपलब्ध रहती हैं।

पटना में गंगा नदी और ऐतिहासिक अशोक राजपथ के बीच खड़ी इस विश्वप्रसिद्ध लायब्रेरी में करीब 21 हजार अमूल्य पांडुलिपियों और तीन लाख पुस्तकों का संग्रह है। भारत सरकार ने सन् 1960 में इस लाइब्रेरी को संसद के अधिनियम से राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया था।  यहां महात्मा गांधी, लार्ड कर्जन, वैज्ञानिक सीवी रमण, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और कई गणमान्य लोग आ चुके हैं। लेकिन अब यह ऐतिहासिक पुस्तकालय एक फ्लाईओवर के कारण अपने वजूद को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

दरअसल बिहार के पथ निर्माण विभाग ने पटना के कारगिल चौक से एनआईटी मोड़ तक एक फ्लाई ओवर बनाने के लिए परियोजना तैयार की है, उसे पूरा करने के लिए विभाग को लाइब्रेरी के अगले हिस्से में बने ऐतिहासिक कर्जन रीडिंग रूम का अधिग्रहण चाहिए। पथ निर्माण विभाग इस रीडिंग रूम से 5 गुणा 12 वर्गमीटर की जमीन का अधिग्रहण चाहता है। विभाग के अनुसार लाइब्रेरी के 64 मीटर लंबे और 5 से 6 मीटर चौड़े हिस्से का पुल के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है। यह पुल बिहार राज्य पुल निर्माण निगम को बनाना है। अगर इस पर अमल किया गया तो कर्जन रीडिंग रूम का अस्तित्व तो मिट ही जाएगा, लाइब्रेरी का अगला हिस्सा भी बदनुमा हो जाएगा।

बिहार में डबल इंजन की सरकार विकास की दोगुनी रफ्तार इस तरह भरना चाहती है कि जो उसके रास्ते में आएगा, वो मिट जाएगा। पूरे बिहार में इस वक्त कई पुल-पुलिया बन रहे हैं। आवाजाही की सुविधा लोगों को मिले, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन यह किस कीमत पर मिल रही है, ये भी देखना होगा। 369 करोड़ की लागत से 2.2 किमी लंबा डबल डेकर फ्लाईओवर बनाने के लिए अगर एक ऐतिहासिक इमारत और ज्ञान के केंद्र को तोड़ा जाएगा, तो इससे हम समाज और दुनिया को क्या संदेश देंगे, क्या इस पर नीतीश सरकार ने विचार किया है। या नीतीश कुमार अपनी छवि चमकाने में ऐसे लगे हैं कि हर पुरानी चीज को खत्म कर देना चाहते हैं।

गनीमत है कि बिहार का नागरिक समाज अभी इतना जागरुक है कि वह ऐसे किसी भी अविचारित सरकारी फरमान के खिलाफ आवाज उठा रहा है। ‘इंटैक’ यानी इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अपील की कि एलिवेटेड सड़क के लिए इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी की विरासत को तोड़ने से बचाया जाए।  इंटैक के पटना चैप्टर के संयोजक जे के लाल का कहना है कि इस लाइब्रेरी को टूटने से बचाने के लिए जरूरत पड़ी तो कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा और जन अभियान भी चलाया जाएगा। बिहार विधानसभा की पुस्तकालय समिति के अध्यक्ष सुदामा प्रसाद ने लाइब्रेरी को किसी भी तरह का नु$कसान पहुंचाये जाने के खिलाफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा को पत्र लिखा है। बीते दिनों लाइब्रेरी परिसर में नागरिक समुदाय की बैठक आयोजित की गई जिसमें किसी भी हाल में लाइब्रेरी को तोड़े जाने से बचाने पर बल दिया गया। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ कुमार दास ने लाइब्रेरी के एक हिस्से को तोड़े जाने के $िखला$फअपना मेडल वापस करने की घोषणा की है। वहीं लाइब्रेरी की निदेशक शाइस्ता बेदार ने कहा कि हम विकास का विरोध नहीं कर रहे लेकिन इसके लिए इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी को नु$कसान पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है।

एक ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए उठी ये आवाजें नीतीश कुमार तक जरूर पहुंचनी चाहिए। वे याद रखें कि केवल अंधाधुंध विकास करवा के वे इतिहास में अपना नाम दर्ज नहीं करवाएंगे, अगर ऐतिहासिक विरासत को बचाएंगे, तब भी इतिहास उनका ऋणी होगा और भविष्य आभारी।

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram