रसोड़े की बातों में उलझा देश..

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बीते 60 साल की उपलब्धियों पर बीते छह महीने की विफलताएं देश को पीछे खींचकर ले गईं। मार्च में लगे लॉकडाउन के बाद से अब तक एक महीना भी ऐसा नहीं बीता, जब अर्थव्यवस्था को लेकर बुरी खबर न आई हो। देश की जीडीपी कितने नीचे गिर सकती है, देश में कैसी मंदी आ सकती है, कितने करोड़ लोगों ने रोजगार खोया, नौकरी न होने के कारण कितने लोगों ने आत्महत्या कर ली, कितने उद्योग चौपट हो गए, बैंकों का एनपीए कितना बढ़ गया, बैंकों के घोटाले कितने बढ़ गए, महंगाई कितनी बढ़ गई, बस इसी तरह की खबरें आती रहीं। इसके बावजूद मोदी सरकार इस बात को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं दिखा पाई कि उसके गलत फैसलों के कारण देश का ऐसा हाल हुआ। 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का धारावाहिक दिखाकर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण भी खामोश बैठ गईं। मोदीजी तो मोर को दाना खिलाने में ही मगन हैं।

जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम होना अच्छी बात है, लेकिन गरीबों को भी हाड़-मांस का इंसान मानना चाहिए या नहीं। इस सरकार को उन करोड़ों गरीबों का दर्द क्या कभी नजर आया, जो लॉकडाउन के फैसले के बाद एकदम से बेरोजगार और बेघर हो गए थे। विभाजन जैसी विभीषिका उस वक्त भारत की सड़कों पर नजर आ रही थी, लेकिन तब भी केंद्र सरकार यही साबित करने की कोशिश कर रही थी, 21 दिन में वह कोरोना का महाभारत जीत लेगी। अब छह महीने हो चुके हैं और भारत मोदी सरकार की अगुवाई में इतनी बुरी तरह हार चुका है कि दोबारा संभलने में न जाने कितना वक्त लगे। लॉकडाउन के कारण गरीबों के तो रोजगार और जान दोनों पर बन आई थी, लेकिन नौकरीपेशा मध्यमवर्ग की हालत भी बहुत बिगड़ चुकी है।

कई लोग नौकरी से निकाले जा चुके हैं या आधे वेतन पर काम कर रहे हैं। अपने घर, गाड़ी या अन्य जरूरतों के लिए बैंकों से जो ऋण आम जनता ने लिया, उसे चुकाना भी कठिन हो रहा था। नीरव मोदी या विजय माल्या जैसे लोग तो अपने ऐशो-आराम के लिए बैंकों से हजारों करोड़ उठाकर आराम से देश से भाग जाते हैं, लेकिन आम जनता ईमानदारी से ऋण चुकाती है और न चुका पाए तो परेशान होती है। इस वक्त ऐसा ही हो रहा है, लेकिन इसमें सरकार उसकी मदद नहीं कर रही है। इसी बात पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाई है।

केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के दौरान कर्ज वसूली को स्थगित कर दिया था, जिसकी अवधि 31 अगस्त को खत्म हो रही है। लेकिन इस दौरान कर्ज पर लगने वाले ब्याज और ब्याज पर ब्याज को लेकर अपना रुख साफ नहीं किया। जिस पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार के पास आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत पर्याप्त शक्तियां उसके साथ उपलब्ध थीं फिर भी सरकार ने इस मामले में अपना रुख साफ नहीं किया। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि ‘यह समस्या आपके (केंद्र सरकार) लॉकडाउन की वजह से पैदा हुई है। 

यह समय व्यवसाय करने का नहीं है, बल्कि इस वक्त तो लोगों की दुर्दशा पर विचार करना होगा। यानी साफ शब्दों में अदालत ने लॉकडाउन के कारण आम जनता को हुई दिक्कत के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराया। फिर भी केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सालिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना है कि केंद्र सरकार आरबीआई के साथ मिलकर इस विषय पर कोआर्डिनेट कर रही है। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि सभी समस्याओं का एक समान हल नहीं हो सकता। आश्चर्य है कि जो मोदी सरकार एक झटके में नोटबंदी का फैसला ले सकती है, आधी रात को जीएसटी लागू कर सकती है, पूरे देश को लॉकडाउन कर सकती है, वह पांच-छह महीनों में इस मसले का हल नहीं निकाल पाई कि कर्ज स्थगन के दौरान ब्याज की स्थिति कैसी रखनी है। अगर सरकार खुद आरबीआई के साथ इसका फैसला नहीं कर पाई, तो उसे अर्थशास्त्रियों की मदद लेनी चाहिए थी। लेकिन सरकार को शायद इसमें हेठी महसूस होती है। और उसके इस रवैये का खामियाजा जनता को उठाना पड़ता है।

जैसे सरकार कर्ज के ब्याज पर अनिर्णय की स्थिति में रही, वैसे ही परीक्षाओं को लेकर भी असमंजस में दिख रही है और लाखों विद्यार्थी इस वजह से परेशान हो रहे हैं। जेईई और नीट की परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तो साफ कह दिया कि ये परीक्षाएं तय समय पर ही होंगी, लेकिन इस बारे में केंद्र को पहले विचार करना चाहिए था कि आखिर जिंदगी दांव पर लगाकर बच्चों को परीक्षा केंद्रों तक भेजने का क्या अर्थ है।

सरकार भले यह दावा कर ले कि उसके लिए विद्यार्थियों की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता है, लेकिन इस दावे को जमीन पर भी तो दिखना चाहिए। सोशल मीडिया पर हर दिन छात्रों की ओर से यह मांग की जा रही है कि परीक्षाओं को टाला जाए, मगर सरकार चुप ही है। इस मुद्दे पर आज सोनिया गांधी की अगुवाई में गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक भी हुई। जिसमें ममता बनर्जी से लेकर उद्धव ठाकरे, भूपेश बघेल, नारायण सामी, और कैप्टन अमरिंदर सिंह आदि कई मुख्यमंत्रियों ने अपनी बात रखी और इस बात पर चिंता जतलाई कि अगर परीक्षाएं हुईं तो कोरोना फैलने का खतरा बढ़ेगा और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा। इस बैठक में केंद्र द्वारा राज्यों को जीएसटी भुगतान न करने का मामला भी उठा।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया कि 4 महीनों से राज्यों को जीएसटी का मुआवजा न मिलने से आज स्थिति भयावह है, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे मोदी सरकार का विश्वासघात ही करार दिया। इस बैठक की खास बात ये रही कि कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से कतराने वाली ममता बनर्जी न केवल इसमें शामिल हुईं, बल्कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को याद किया और कहा कि आज राजीव गांधी को सम्मान नहीं मिल पा रहा है। उनके नाम पर कोई स्कीम नहीं चलाई जा रही है। एक लंबे अंतराल के बाद देश में इस तरह एकजुट विपक्ष देखने मिला। इसके राजनैतिक मायने और परिणाम क्या होंगे, फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर छात्रों के मसले पर या जनहित के लिए विपक्ष एक साथ आ रहा है, तो यह अच्छी बात है। केंद्र सरकार की मनमानी को रोकने के लिए यह जरूरी है। अन्यथा देश में रसोड़े में कौन था, जैसे मनोरंजक सवालों में खोया रहेगा और सरकार जनहित के मुद्दों को ताक पर डालती रहेगी।

(देशबंधु)

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