मूर्खताओं की बजाय  वैज्ञानिक नजरिया अपनाया जाए..

मूर्खताओं की बजाय वैज्ञानिक नजरिया अपनाया जाए..

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देश में कोरोना मरीजों की संख्या 3 लाख के करीब पहुंचने वाली है, 8 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंता का दायरा बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर प्रवचन देने की मुद्रा में आ गए हैं। आज इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स 95वें वार्षिक सत्र के उद्घाटन पर भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि मन के हारे हार, मन के जीते जीत, यानी हमारी संकल्पशक्ति, हमारी इच्छाशक्ति ही हमारा आगे का मार्ग तय करती है।

उन्होंने कहा कि मुसीबत की दवाई मजबूती है। इस आपदा को अवसर में परिवर्तित करना है, इसे हमें देश का बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट भी बनाना है। और टर्निंग पॉइंट की बात करते हुए मोदीजी फिर आत्मनिर्भर भारत अभियान के चौराहे पर पहुंच गए। इस तरह की बातें कोई साधु-महात्मा करे तो समझ में आता है, क्योंकि उनका काम ही उपदेश देना होता है, ताकि लोगों को अपनी तकलीफ से थोड़ी देर की राहत मिले और उस तकलीफ से उबरने की कोई राह भी सूझे। लेकिन मोदीजी अपनी तमाम फकीराना प्रवृत्ति के बावजूद देश के प्रधानमंत्री हैं और इस नाते उनकी जिम्मेदारी उपदेश देने से कहीं ज्यादा है। वे केवल संकल्प और इच्छाशक्ति की बात करके लाखों लोगों की तकलीफ दूर नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें ऐसे फैसले भी लेने होंगे, जिससे लोगों में भरोसा जगे।

अफसोस कि कोरोना की आपदा को शुरु से हल्के में लिया गया और इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना कर जो कदम उठाए जा सकते थे, उन्हें दुर्लक्ष्य किया गया। मोदीजी को शुरुआत में ही पांच जरूरी फैसले लेने थे, पहला- दिसंबर-जनवरी में जब कोरोना के बारे में पता चल गया था और राहुल गांधी जैसे नेता इसके खतरों के बारे में आगाह कर रहे थे, तब राजनैतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए इस चेतावनी को गंभीरता से लेना था। दूसरा- जब यह पता चल गया कि कोरोना का खतरा विदेश से आ रहा है, खासकर चीन फिर इटली से, तो हवाई यातायात को तुरंत प्रतिबंधित करना था और जिन देशों को वीजा ऑन अराइवल यानी एयरपोर्ट पर ही वीजा देने की सुविधा दी गई है, उसे कुछ समय के लिए स्थगित कर देना चाहिए था।  

इससे पर्यटन उद्योग पर थोड़ा-बहुत असर पड़ता, लेकिन देश एक बड़े खतरे से बच जाता। तीसरा- विदेशों से जो देशी या विदेशी नागरिक आए, उनकी एयरपोर्ट पर ही सही तरह से स्क्रीनिंग की जानी चाहिए थी। लेकिन देश का वीआईपी कल्चर यहां भारी पड़ा। जिन नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों के बच्चे यूरोप और अमेरिका में उच्चशिक्षा के लिए जाते हैं, वे अपनी पहुंच का लाभ उठाते हुए, न केवल वापस आए, बल्कि टेस्टिंग और क्वांरटीन की प्रक्रिया से भी बचते रहे, और इससे पूरे देश में खतरा बढ़ गया। चौथा- लॉकडाउन जैसे फैसलों को उठाने से पहले अर्थनीति और समाजशास्त्र के जानकारों से सारे पहलुओं पर चर्चा करनी चाहिए थी। इसमें विपक्षी दलों को भी साथ लेना चाहिए था। तब इतने लंबे समय के बंद का कोई सकारात्मक असर नजर आता। संकीर्ण राजनीति के चलते केंद्र सरकार ने किसी को साथ न लेकर चलने का हठ दिखाया, और इसका नुकसान सबसे ज्यादा देश के गरीब तबके ने भुगता।

पांचवा- कोरोना का हौव्वा खड़ा किए बगैर देशवासियों को भरोसे में लेते हुए मोदीजी को बताना चाहिए था कि यह एक वैश्विक महामारी है, जिसका कोई इलाज अब तक नहीं निकला है, इसलिए लोग अपनी सुरक्षा का खुद ख्याल रखें और इस तरह दूसरों को भी सुरक्षित करें। लेकिन मोदीजी ने ऐसा न करके पहले तो कोरोना को हराने की बात कही, जबकि उनके पास इसकी कोई दवा नहीं है और फिर ताली बजाने जैसे अनावश्यक कामों में देश को उलझाया, इससे लोगों ने भी कोरोना को गंभीरता से नहीं लिया। सोशल मीडिया पर मीम्स और चुटकुलेबाजी ठीक है, लेकिन असल जिंदगी में भी यही सब होने लगा। किसी ने गोमूत्र से कोरोना का इलाज बताया, कोई होम्योपैथी, तो कोई आयुर्वेद में इसका शर्तिया इलाज बताने लगा। इस अवैज्ञानिक नजरिए पर सरकार को रोक लगानी चाहिए थी।

कोरोना का खतरा इस वक्त जिन देशों पर अधिक मंडरा रहा है, उन तमाम देशों में राजनैतिक नेतृत्व ने कमोबेश इसी तरह की गलतियां की हैं। रूस, ब्राजील, अमेरिका इन सब देशों में राष्ट्रप्रमुख कोरोना के आगे अपनी हठधर्मिता को तरजीह दे रहे हैं। अमेरिका तो लगातार चीन को इसका षड्यंत्रकारी बता रहा है। हॉलीवुड फिल्मों में इस तरह की कहानियां भले हिट हो जाएं, लेकिन असल में ये गुमराह करने वाली ही साबित होती हैं। 

वैश्विक महामारियों का विश्लेषण और उससे बचाव के लिए काम करने वाली गैर लाभकारी संस्था इकोहेल्थ अलायंस के प्रमुख पीटर दसजाक ने एक लेख में बताया है कि अमेरिका चीन पर जिस साजिश का आरोप लगा रहा है कि कोरोना एक मानवनिर्मित महामारी है, वह गलत है।

इकोहेल्थ अलायंस ने दुनिया भर में महामारियों की उत्पत्ति और उनके प्रसार को लेकर कई तरह के अध्ययन करती है और फिर यह समझने की कोशिश करती है कि किसी भी महामारी का अगला हॉटस्पॉट कौन सा होगा। फिर उस मुताबिक बचाव के रास्ते तलाशती है। पीटर दसजाक के मुताबिक दुनिया में जैवविविधता को मनुष्य द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने के कारण महामारियों का खतरा बढ़ा है। घने जंगलों को काटने के कारण जब वहां के जीव-जंतु बाहर आने लगते हैं, तब उनके साथ वायरस का मानवशरीर में पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। उनका कहना है कि इस वक्त लगभग 17 लाख अनजाने वायरस हैं, जो दक्षिण पूर्वी एशिया के जंगलों में हैं। कोरोना जैसे वायरस पहले भी आए और आगे भी आते रहेंगे। इनसे बचने के लिए वैज्ञानिकों की बात सुननी चाहिए, इस वक्त उन्हें अनसुना करने का परिणाम हम भुगत ही रहे हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल के प्रोफेसर मेथ्यू बेलिस का भी यही मानना है कि बीते पांच सालों में हमारे सामने सार्स, मर्स, इबोला, एविएन इंफ़्लूएंजा और स्वाइन फ़्लू के रूप में पांच बड़े ख़तरे आए हैं। हम पांच बार बचने में कामयाब रहे लेकिन छठवीं बार हम बच नहीं सके। और ये कोई आखरी महामारी नहीं है. ऐसे में हमें वन्यजीवों से जुड़ी बीमारियों पर विशेष अध्ययन करने की जरूरत है।  वैज्ञानिकों की ये सलाह वैश्विक नेताओं को जरूर सुननी चाहिए और महामारी को शक्ति परीक्षण का अवसर बनाने से बाज आना चाहिए।

(देशबन्धु)

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