विवाद की नौबत ही क्यों आई

विवाद की नौबत ही क्यों आई

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लॉकडाउन के तीसरे चरण के पहले मोदी सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनें चलाने की व्यवस्था की। कायदे से यह फैसला लॉकडाउन शुरु होने के साथ ही यानी मार्च के अंतिम दिनों में ही ले लेना चाहिए था, लेकिन सरकार ने हमेशा की तरह अदूरदर्शिता दिखलाई। गरीबों, लाचारों के हित इस बार भी सरकार की  प्राथमिकता में नजर नहीं आए।

मध्यमवर्ग, उच्च मध्यमवर्ग सरकार की नीतियों का कायल होकर ताली बजाता, दिए जलाता नजर आया, जबकि कामगार खाली पेट, तपती सड़कों पर पैदल घर लौटने को मजबूर हो गए। जब उनकी तकलीफों की कई दर्दनाक तस्वीरें भारत का असल चेहरा दिखाने लगीं तब जाकर सरकार को चेतना आई और मजदूरों के लिए ट्रेन चलाने की घोषणा की गई। लेकिन मोदी सरकार के कई फैसलों की तरह यह भी विवादों में आ गया। क्योंकि हमेशा की तरह इस फैसले में भी स्पष्टता का अभाव रहा। जिन्हें अपने घर पहुंचना है, उन्हें यह साफ-साफ जानकारी ही नहीं मिल पा रही थी कि वे यात्रा किस तरह करेंगे, यानी उनकी यात्रा का खर्च कौन वहन करेगा।

विभिन्न राज्यों में फंसे लोगों को विशेष ट्रेनों से यात्रा करने की इजाजत देने के बाद रेल मंत्रालय ने इस संबंध में बीते शनिवार को कुल 19 तरह के दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें राज्य सरकारों द्वारा मजदूरों, छात्रों इत्यादि से ट्रेन का किराया वसूलने की भी बात शामिल है। लेकिन अब सरकार इस बात से मुकर रही है। बहुत सी जगहों से खबर आई कि मजदूरों को टिकट के पैसे देने पड़ रहे हैं। जिसकी विपक्ष ने आलोचना भी की। राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उमर अब्दुल्ला, समेत कई नेताओं ने मजदूरों से वसूली की निंदा की और सरकार की नीयत पर सवाल उठाए।

जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो कामगारों को तत्काल राहत पहुंचाने के लिए ऐलान भी कर दिया कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की हर इकाई हर जरूरतमंद श्रमिक व कामगार के घर लौटने की रेल यात्रा का टिकट खर्च वहन करेगी व इस बारे जरूरी कदम उठाएगी। साथ ही उन्होंने भाजपा सरकार पर सवाल भी उठाए कि ‘जब हम विदेशों में फंसे भारतीयों को हवाई जहाजों से निशुल्क वापस लेकर आ सकते हैं, जब हम गुजरात के केवल एक कार्यक्रम में सरकारी खजाने से 100 करोड़ रुपये परिवहन व भोजन इत्यादि पर खर्च कर सकते हैं, जब रेल मंत्रालय प्रधानमंत्री के कोरोना फंड में 151 करोड़ रुपये दे सकता है, तो फिर तरक्की के इन ध्वजवाहकों को आपदा की इस घड़ी में निशुल्क रेल यात्रा की सुविधा क्यों नहीं दे सकते?’ 

देश की सबसे बड़ी और सबसे अमीर पार्टी भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा धक्का था कि कांग्रेस ने इस तरह का बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। लिहाजा अब भाजपा यह साबित करने में लग गई कि मजदूरों से कोई राशि नहीं ली जा रही। भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में दावा किया कि घर लौट रहे प्रवासी कामगारों को किराये का भुगतान नहीं करना होगा, क्योंकि रेल यात्रा निशुल्क होगी। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी कहा कि रेलवे ने टिकट के किराये में 85 प्रतिशत की सब्सिडी दी है और शेष 15 फीसदी किराया राज्य सरकार को देना होगा। रेलवे का भी स्पष्टीकरण आ गया है कि वह प्रवासी मजदूरों को कोई टिकट नहीं बेच रहा है। रेलवे राज्य सरकारों से इस वर्ग के लिए केवल मानक किराया वसूल रहा है जो कुल लागत का महज 15 फीसदी है। भाजपा कांग्रेस पर बेबुनियाद आरोप लगाने का दोष मढ़ रही है।

जबकि कांग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने किराया वसूली के दावे को पुख्तापन देने के लिए अपने ट्विटर हैंडल पर श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के दिशा-निर्देशों से जुड़ा एक प्रपत्र शेयर किया है। प्रपत्र में साफ कहा गया है कि संबंधित राज्य सरकार यात्रियों से टिकट में दर्ज किराया वसूल कर एकत्र हुई धनराशि खेल विभाग को जमा करेंगी। इधर बिहार और मध्यप्रदेश सरकार ने बाकायदा ऐलान कर दिया है कि वे ट्रेन का किराया राज्य सरकार देगी। अगर मोदी सरकार का शुरु से यही उद्देश्य था कि कामगारों की ट्रेन से घरवापसी का सारा खर्च वह खुद उठाएगी, तो अब उन राज्यों को अलग से ऐलान करने की जरूरत क्यों पड़ रही है, जहां भाजपा की ही सरकार है। अगर केंद्र सरकार, रेल मंत्रालय या रेलवे बोर्ड की ओर से शुरु से सारी बातें, निर्देश साफ-साफ दिए जाते तो इस तरह का विवाद ही क्यों खड़ा होता। बिना आग के तो धुआं नहीं निकलता है। अभी जिस तरह भाजपा प्रवक्ता सामने आकर अपनी सरकार का बचाव कर रहे हैं, उससे साफ है कि कहीं कुछ झोल है।

भाजपा को शायद इसी मुगालते में थी कि कामगारों की घरवापसी करा के, उन्हें बीते दिनों हुए कष्टों का जो इल्जाम सरकार पर लगा है, उसके दाग धुल जाएंगे। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि टिकट किराए को लेकर कांग्रेस ऐसा कोई ऐलान कर सकती है जिससे वह पीड़ितों के साथ खड़ी नजर आएगी। अगर कांग्रेस मजदूरों का किराया वहन करने की घोषणा नहीं करती तो शायद यह मुद्दा बढ़ता ही नहीं और इस तरह रेलवे को, भाजपा को सफाई देने के लिए सामने नहीं आना पड़ता। 

राजनीति के लिए ही सही, पर शायद इस विवाद से कामगारों को फायदा पहुंचेगा। अब वे बिना किसी अतिरिक्त भार के अपने घर पहुंच पाएंगे। लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर इस तरह का मसला उत्पन्न ही क्यों हुआ। क्यों मोदी सरकार उन फैसलों को एक बार में साफ-साफ नहीं सुनाती, जिनसे लाखों लोगों का हित जुड़ा होता है। केंद्र 85 प्रतिशत सब्सिडी दे रहा है या शत प्रतिशत, इन नीतिगत बातों को तो प्रशासन के उच्च स्तर पर ही तय होना चाहिए और उलझनें वहीं सुलझ जानी चाहिए। इन बातों से उस मजदूर को क्या मतलब, जो 30-35 दिनों से बिना काम के लाचार बैठा है और बस किसी तरह सुरक्षित अपने घर पहुंचना चाहता है। सवाल ये भी है कि इतने बड़े मामलों पर भी जिम्मेदार मंत्री या प्रधानमंत्री खुद सामने न आकर प्रवक्ताओं के सहारे विवाद क्यों सुलझाना चाहते हैं। क्या देश कोई शतरंज की बिसात है, जहां राजा या वजीर प्यादों की आड़ में आखिर तक बचे रहने की कोशिश करेंगे।

(देशबन्धु)

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