लॉकडाउन 2.0: सिर्फ अपेक्षायें..

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कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए 21 दिनों के लॉकडाउन का पहला चरण पूरा हो गया और मोदीजी ने मंगलवार को लॉकडाउन 2.0 की घोषणा की। वैसे ये काम वे 2-3 दिन पहले भी कर सकते थे, लेकिन उसमें शो बाजी रह जाती।  लिहाजा उन्होंने पहले देश को ये बताया कि वे मंगलवार सुबह 10 बजे फिर कुछ कहने वाले हैं और फिर अपने ऐलान के अनुसार 10 बजे प्रकट होकर वही बातें कहीं, जिनके बारे में देश अनुमान लगा चुका था। अपनी घोषणाओं से ज्यादा अगर मोदीजी देश में बढ़ रही चिंताओं पर ध्यान देते, तो इस देश की ज्यादा सेवा होती। अपने भाषण में उन्होंने फिर से लॉकडाउन का सख्ती से पालन करने, कोरोना के खिलाफ जंग में साथ देने, अनुशासित सिपाही की तरह रहने जैसी बातें कहीं।

मोदीजी को जर्मनी के राष्ट्रपति का सारगर्भित भाषण सुनना चाहिए था, जिसमें उन्होंने कहा कि ये कोई युद्ध नहीं है, जिसमें एक देश, दूसरे देश के खिलाफ खड़ा है, उनके सैनिक आमने-सामने हैं, बल्कि यह मानवता को बचाने का वक्त है। इस समय इंसान का सबसे अच्छा औऱ सबसे बुरा पहलू उजागर होता है। और हमें सबसे अच्छा पहलू सामने लाने की जरूरत है। उन्हें ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जानसन का वह धन्यवाद ज्ञापन भी सुनना चाहिए था, जो उन्होंने नेशनल हेल्थ सर्विस को दिया। इससे पता चलता है कि देश को यूनिवर्सल हेल्थ केयर जैसी व्यवस्था की कितनी जरूरत है, जिसमें इलाज सबके लिए एक समान हो, बीमा कंपनियों का खेल लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने के लिए न हो।

कोरोना जैसी महामारी ने हमें बहुत सारे सबक दिए हैं, और उन्हें याद कर हम बेहतर इंसान बन सकते हैं, बेहतर देश और समाज बना सकते हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि भारत फिलहाल उन सबकों को याद नहीं करना चाहता।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण है समाज में मुसलमानों के लिए बढ़ती नफरत, और दलित, आदिवासियों और सबसे बढ़कर मानवाधिकारों के लिए खड़े होने वाले लोगों के प्रति बदले की भावना का प्रसार। 

अपने भाषण के आिखर में मोदीजी ने देशवासियों से कहा कि वो सात बातों में उनका साथ दें- 1. बुज़ुर्गों का खास खयाल रखें  2. सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह पालन करें 3. अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आयुष मंत्रालय के निर्देश का पालन करें 4. कोरोना संक्रमण रोकने के लिए आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप जरूर डाउनलोड करें 5. जितना हो सके उतना गरीब परिवारों के भोजन की आवश्यकता पूरी करें 6. अपने साथ काम करने वालों को नौकरी से न निकालें 7. कोरोना से लड़ाई में शामिल डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी, पुलिस का खास सम्मान करें।

क्या वे इन में कुछ बातें और नहीं जोड़ सकते थे, जैसे महामारी में धर्मांधता का जहर घोलकर तकलीफें और न बढ़ाएं, गरीबों की भोजन के अलावा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में सहयोग करें, लॉकडाउन का मखौल उड़ाने वाले राजनेताओं के लिए क्या वे कोई कड़ी टिप्पणी नहीं कर सकते थे, क्या वे कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को यह आश्वासन नहीं दे सकते थे कि उनके इलाज के लिए भी सरकार फिक्रमंद है।

मोदीजी ने जनता से अपनी अपेक्षाएं तो बयां कर दीं, पर क्या जनता की तकलीफों का उन्हें अनुमान है। और यहां उन तकलीफों की बात नहीं हो रही, जो घर में रहते हुए बोर हो जाने से हो रही हैं, बल्कि सवाल उन तकलीफों का है, जो जानलेवा साबित हो रही हैं। मोदीजी ने कहा कि जो रोज कमाते हैं रोज की कमाई से अपनी जरूरतें पूरी करते हैं, वो मेरा परिवार है।  मोदीजी ये तो जानते ही होंगे कि उनका ये परिवार कितना बड़ा है और इसकी तकलीफें उससे भी बड़ी हैं।

फिर भी इस परिवार के लोगों के लिए उन्होंने ऐसी कोई घोषणा नहीं की, जिससे उसे थोड़ी राहत मिलती। यह देखना दुखद है कि कोरोना के कारण देश में लगभग 3 सौ मौतें हुई हैं, लेकिन लॉकडाउन के कारण 195 लोग जान गंवा चुके हैं। द प्रिंट की खबर के मुताबिक शोधकर्ताओं तेजेश जीएन, कनिका शर्मा और अमन ने संबंधित आंकड़े देश भर की विश्वसनीय समाचार और सोशल मीडिया रिपोर्टों से एकत्र किए हैं। इनमें से 53 मौतें लॉकडाउन के दौरान थकावट, भूख, चिकित्सा सहायता की अनुपलब्धता अथवा भोजन या आजीविका के अभाव में आत्महत्या से हुई हैं। खुद ही निगरानी दस्ते की भूमिका निभा रहे लोगों द्वारा की गई हिंसा के कारण 7 मौतें हुई हैं।

पैदल घर लौटते 35 प्रवासी मजदूरों की मौत सड़क हादसे में हो गई। शराब न मिलने के कारण कम से कम 40 लोगों की मौत या आत्महत्या के मामले सामने आ चुके हैं, क्योंकि हम शराब को एक आवश्यक वस्तु नहीं मानते। लॉकडाउन के कारण फैली घबराहट के बीच 39 लोगों ने कोरोनावायरस संक्रमण होने की आशंका में, या अकेलेपन या क्वारेंटाइन किए जाने के कारण आत्महत्या कर ली।  इसके अलावा 21 मौतें अन्य विविध कारणों से हुईं। इन मौतों को शायद सरकार इस तरह व्याख्यायित कर सकती है कि वे मारे गए क्योंकि उनकी जान बचाने के लिए हमने उन्हें बंद किया था। खैर, लॉकडाउन के दूसरे चरण की घोषणा करते हुए मोदीजी ने फिर अपनी तारीफ की कि जब देश में एक भी मरीज नहीं था तब ही कोरोना प्रभावित देशों से आने वाले लोगों की स्क्रिनिंग हमने शुरू कर दी थी।

भारत ने समस्या बढ़ने का इंतज़ार नहीं किया। भारत दूसरे देशों की तुलना में बहुत संभली हुई स्थिति में है। सबसे पहली बात तो उन्हें यही समझनी होगी कि ये कोई प्रतियोगिता का दौर नहीं है, जहां हम दूसरे देशों से अपनी तुलना करें। तुलना करने के लिए बहुत सी दूसरी बातें हैं। यह वक्त तो अपने साथ, दूसरों को भी ठीक रखने का है। और जहां तक बात सरकार की मुस्तैदी की है, तो देश ने देखा है कि फरवरी अंत तक, बल्कि मार्च के शुरुआती सप्ताह में भी मोदी सरकार कोरोना को लेकर सचेत नहीं हुई थी। अगर ऐसा होता तो ट्रंप की मेजबानी, मध्यप्रदेश की सरकार गिराने के लिए विधायकों को कर्नाटक ले जाना या संसद को चलते रहने देना जैसे काम नहीं होते। तब राहुल गांधी की बात मोदीजी को सुननी थी, जो उन्होंने नहीं सुनी। यही हाल टेस्टिंग को लेकर भी है। अगर बड़े पैमाने पर टेस्टिंग शुरु में ही की जाती, तो मामलों को बढ़ने से रोका जा सकता था।  

स्वदेशी टेस्टिंग किटों का इंतजाम, पीपीई सुरक्षा उपकरणों के निर्यात के बजाय इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया होता, तो देश को बिना तैयारी के लॉकडाउन से बचाया जा सकता था। मगर अब तो उसका दूसरा चरण भी जरूरी हो गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार अगले 20-25 दिनों में देश के गरीबों पर सबसे ज्यादा ध्यान देगी और स्वास्थ्य के साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे को विवेकपूर्ण, संवेदनशील तरीके से संभालेगी।

(देशबन्धु)

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