असली दोस्त की परख..

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कोरोना वायरस का असर इंसान की सेहत के अलावा अब अन्य चीजों पर भी पड़ना शुरु हो गया है। दुनिया की महाशक्तियां इस वायरस के आगे पस्त नजर आ रही हैं। अर्थशास्त्र को तो पहले ही कोरोना ने चुनौती दे दी है। अब सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन जैसे तरीकों से समाजशास्त्र के नियम बदलने लगे हैं। और इन सबके साथ अब मानवीय संबंधों की परिभाषा, कूटनीति, दोस्ती के कायदे भी शायद बदल रहे हैं। जिसका ताजा उदाहरण डोनाल्ड ट्रंप की वह चेतावनी भरी अपील है, जिसमें वे दवा के निर्यात पर से प्रतिबंध हटाने की बात कह रहे हैं। उनकी धमकी ऐसे नाजुक वक्त में आई है, जब भारत और अमेरिका समेत पूरी दुनिया में मौत का खतरा मंडरा रहा है।

 मोदी और ट्रंप, विश्व राजनीति के ये दो किरदार अपने बयानों, विरोधाभासी फैसलों, लीक से हटकर की जा रही राजनीति, और कूटनीति के नियमों को बदलने के लिए चर्चित हैं, साथ ही अपनी दोस्ती को लेकर भी काफी चर्चा में  रहे  हैं। अभी दो महीने पहले जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे, तो मोदीजी ने उनके लिए नमस्ते ट्रंप का भव्य आयोजन किया। लाखों दर्शकों की मौजूदगी में फिर ये दिखाने की कोशिश की कि डोनाल्ड ट्रंप से उनकी यारी वाले रिश्ते हैं। कुछ वक्त पहले अमेरिका में हाउडी मोदी कार्यक्रम भी यही बताने के लिए था कि भारत और अमेरिका के संबंध चाहे ऊपर-नीचे होते रहें, लेकिन मोदीजी के संबंध ट्रंप महाशय से दोस्ती वाले ही रहेंगे।

भारत-अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर कुछ तनातनी बनी रही। ट्रंप ने बीच में कश्मीर मसले पर मध्यस्थता की बात भी कही। ईरान पर प्रतिबंध को लेकर भी अमेरिका भारत पर दबाव बनाता रहा कि वह उसका साथ दे। कई बार तो ऐसा लगने लगा कि भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता को तिलांजलि दे चुकी है और उस पर अमेरिकी प्रभाव बढ़ने लगा है। डोनाल्ड ट्रंप चतुर व्यापारी हैं, और वे जानते हैं कि भारत को कैसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन मोदीजी में भी तो व्यापार औऱ राजनीति की अच्छी समझ है। फिर वे ये क्यों नहीं समझ पाए कि डोनाल्ड ट्रंप बार-बार उनसे जिस दोस्ती का हवाला देते रहे हैं, उसके पीछे उनका क्या स्वार्थ हो सकता है। 

इस वक्त पूरी दुनिया कोरोना से बचने के लिए जद्दोजहद में लगी है। अमेरिका तो अब कोरोना का नया हाटस्पाट बन चुका है, जहां लाखों जिंदगियां दांव पर हैं। वहां मीडिया का एक धड़ा ट्रंप से सीधे जवाबदेही की मांग कर रहा है, पूछ रहा है कि इस मुसीबत से निकलने के लिए आपके पास क्या योजना है। आप केवल पत्रकारों पर बरसते ही रहेंगे या अपनी लोकप्रियता का ढिंढोरा ही पीटते रहेंगे या देश को बताएंगे कि आप इस महामारी से देश को कैसे बचाने वाले हैं। ट्रंप इन सवालों के जवाब देते हैं या नहीं, ये तो पता नहीं, लेकिन उन्होंने भारत को अपने अंदाज में धमकी जरूर दे दी है। दरअसल भारत में मलेरिया के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को कोरोना के लिए काफी हद तक लाभदायक माना जा रहा है।

इस दवाई के निर्यात पर फिलहाल प्रतिबंध है, क्योंकि घरेलू खपत ही बहुत ज़्यादा है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को फोन कर हाइड्रॉक्सीक्लोरोच्नि भेजने का अनुरोध किया था। और सोमवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अगर भारत ने दवाई नहीं भेजी तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई कर सकता है। ब्राजील जैसे कुछ और देश भी चाहते हैं कि भारत उन्हें यह दवा निर्यात करे।  ट्रंप की इस चेतावनी भरी अपील के बाद सरकार ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के निर्यात पर आंशिक रूप से प्रतिबंध हटा लिया है। सरकार के अनुसार फॉर्मा इंडस्ट्री से विचार-विमर्श के बाद यह फैसला किया गया है। इसके तहत यह पाया गया है कि भारत में इस निर्यात से दवाओं की कोई किल्लत नहीं होने वाली है।

विदेश मंत्रालय के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी की गंभीरता को देखते हुए भारत ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मजबूत एकजुटता और सहयोग दिखाना चाहिए। वसुधैव कुटुंबकम में यकीन रखने वाले भारत ने अपने साथ दूसरे देशों की जनता के लिए सहृदयता दिखलाई यह अच्छी बात है। लेकिन क्या सचमुच भारत में मलेरिया की दवा की कोई किल्लत नहीं होने वाली है। क्या सरकार देश को यह बतला सकती है कि इस वक्त देश में इस दवा की कितनी जरूरत है, स्टाक कितना है और अगर जरूरत पड़ी तो कितने वक्त में दवा तैयार करने की स्थिति में दवा कंपनियां हैं। 

हर साल कारोबार में फायदे को देखते हुए देश के फल, सब्जी, अनाज, मेवे, कच्चा माल जैसी कई चीजों का निर्यात किया जाता है, जबकि देशवासियों को यही सब महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। लेकिन ये सारी चीजें जिंदा रहने के लिए जरूरी नहीं हैं।

जबकि दवाइयों के बिना जान को खतरा रहता है। इसलिए हर सरकार का यह कर्तव्य है कि वह पहले अपने देशवासियों की जान के बारे में सोचे। उम्मीद है मोदी सरकार ने भी आम भारतीय को अपनी प्राथमिकता में रखा होगा। लेकिन इसके साथ अब मोदीजी को दोस्ती की प्राथमिकताओं पर भी गौर फरमाना चाहिए। ट्रंप के इस रवैये से जाहिर हो गया है कि उनके लिए पहले कौन है। संकट में असली दोस्त की परीक्षा हो जाती है, मोदीजी यह तो जानते ही होंगे।

(देशबन्धु)

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