समग्रता में देखी जाए नक्सल समस्या..

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देश में कोरोना की महामारी के बीच छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के 17 जवानों के शहीद होने की दुखद घटना घट गई। यूं तो जब से राज्य में कांग्रेस ने भूपेश बघेल के नेतृत्व में सरकार बनाई है, तब से बस्तर के विकास और आदिवासियों के हितों के लिए कई काम हुए हैं। लोहांडीगुड़ा में किसानों की जमीन वापस करने और मुआवजा देने का फैसला, बस्तर विकास प्राधिकरण में स्थानीय विधायक लखेश्वर बघेल को अध्यक्ष बनाने का निर्णय, आदिवासी इलाकों के विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी, ऐसे तमाम कदमों से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बरसों से संघर्षरत बस्तर को साथ लाने की कोशिशें की हैं। लेकिन हाल की घटना से ऐसा लगता है कि ये कोशिशें नाकाफी हैं।  कुछ मसले ऐसे हैं, जिनकी अनदेखी हो रही है। जैसे नक्सल समस्या को समग्रता में समझे बिना अलग-अलग स्तरों पर उसका हल निकालने की कोशिशें। देशबन्धु ने सुझाव दिया था कि नक्सल समस्या का संपूर्ण अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों का एक समूह बनाया जाए। हमारा सुझाव था कि जस्टिस ए के पटनायक, बीएसएफ के पूर्व डायरेक्टर जनरल एम एल कुमावत, अर्थशास्त्री दीपक नैयर, नृतत्वशास्त्री नदीम हसनैन जैसे लोग इसके सदस्य बनाए जाएं, ताकि बस्तर और नक्सल समस्या के सामाजिक, आर्थिक, न्याय-व्यवस्था, कानूनी पक्ष हर पहलू पर समग्रता में विचार कर नीतियां बनाई जा सकें। जेलों में बंद आदिवासियों पर चल रहे मुकदमों और उनकी रिहाई के बारे में अध्ययन करने के लिए जस्टिस पटनायक की अध्यक्षता में एक कमेटी तो साल भर पहले गठित हुई है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। नक्सल समस्या का पूरी तरह अध्ययन करने से इसका हल तलाशा जा सकता है। भूपेश बघेल अपने कार्यकाल के प्रारंभ से आदिवासियों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब उन्हें अपनी शैली में थोड़ा बदलाव करने की जरूरत है। उग्रवाद उन्मूलन में लगे लोगों का सुझाव रहता है कि यह काम दो स्तरों पर किया जाना चाहिए। पहला स्थानीय लोगों का विश्वास जीतकर, उन्हें साथ लेकर विकास के काम करना और दूसरा हथियारबंद विरोध से सतर्क रहते हुए सुरक्षा के उपाय करना। पहले स्तर पर तो श्री बघेल ने काफी हद तक सफलता पाई है, लेकिन दूसरे स्तर पर शायद उनसे चूक हो गई। इनपुट मिला कि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला सेना की दो इकाइयों के माओवादी एलमागुंडा में जमा थे। जिसके बाद सीआरपीएफ, एसटीएफ और डीआरजी के करीब 550 जवानों को सर्चिंग के लिए भेजा गया। जब ये लौट रहे थे, तब नक्सलियों से उनकी मुठभेड़ हुई, जो करीब 5 घंटे चली और इसमें 17 जवान शहीद हो गए। 
सवाल ये है कि क्या इस वक्त यह गश्ती दल भेजना इतना जरूरी क्यों था, क्या कोरोना के वक्त इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा जवानों का भेजा जाना सही था, क्या खुफिया विभाग से सही सूचना प्राप्त नहीं हुई थी? नक्सलियों के कई गुट, कई दल अलग-अलग स्तर पर काम करते हैं, क्या सुरक्षा बलों को इसे ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने के निर्देश दिए गए थे? इस हमले के बाद फिर नक्सलियों से निपटने की नई रणनीतियों पर चर्चा होगी। क्या इसमें पूर्व भूलों के सुधार की गुंजाइश रहेगी? नक्सलियों के हमले की भर्त्सना से भी उनकी सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे सरकार के बनाए कानून को मानते ही नहीं हैं, उन्होंने विद्रोह करने के लिए ही बंदूक थामी है। ऐसे में सरकार को सोचना होगा कि और किन माध्यमों से वह इस समस्या को सुलझा सकती है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कह चुके हैं कि नक्सलियों के साथ चर्चा नहीं करना चाहते। बेशक वे अपनी फैसले लें, योजनाएं बनाएं, रणनीतियां तैयार करें, लेकिन हर बात का खुलासा पब्लिक फोरम पर हो, यह भी जरूरी नहीं है। नक्सल समस्या के समाधान के लिए वे कौन से चैनल खुले रख रहे हैं, कौन से बंद, यह बात चारदीवारों के भीतर ही तय होनी चाहिए। इस तरह के सुरक्षा संबंधी उपायों से ही ऐसी दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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