जनता कर्फ्यू का असर

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देश में कोरोना का असर बढ़ता ही जा रहा है। अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि संक्रमित लोगों की संख्या पर भी रोक नहीं लग रही है। बहुत पहले से लोगों को हिदायत दी जा रही है कि बिना जरूरत घर से न निकलें, अनावश्यक भीड़ इकठी न करें, जबरन मजमा न लगाएं, लेकिन बहुत से लोगों ने इस सलाह की अनदेखी की। कहीं राजनैतिक कारणों से, कहीं धार्मिक कारणों से तो कहीं मौज मस्ती के लिए लोग जुटते ही रहे। नतीजा कोरोना का फैलाव होता गया। इस बीच संसद भी चलती रही, जिस पर अब सवाल उठ रहे हैं।

इधर कोरोना से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस जनता कर्फ्यू की अपील की थी, उसका असर रविवार को देश भर में देखने मिला। सुबह से ही सड़कों पर सन्नाटा पसरा था, लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे और जहां निकल रहे थे, वहां पुलिस उन्हें वापस भेज रही थी, कहीं प्यार से, कहीं जबरदस्ती से। बाजार, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहें रविवार को सुनसान थीं। मोदीजी की ताली-थाली बजाने वाली अपील का भी व्यापक असर देखने मिला। उन्होंने एक बार फिर एक तीर से दो निशाने लगाए। एक ओर कोरोना से लड़ रहे लोगों के लिए आभार प्रदर्शन करवा दिया, दूसरी ओर जनता के बीच अपनी पैठ और शक्ति को भी परख लिया।

जनता कर्फ्यू का एक अच्छा असर ये हुआ कि सारी मतभिन्नताओं के बीच देश में एकजुटता देखने मिली। एकता की ऐसी मिसालें एक समाज और देश के रूप में हमें सशक्त करती हैं। जनता कर्फ्यू से सोशल डिस्टेसिंग में मदद मिली है, इससे कोरोना के प्रसार में भी कुछ रोक लगी होगी। इसके अलावा अब देश के कई शहरों में अलग-अलग अवधि के लिए लाक डाउन की घोषणा की गई है। एक बीमारी की वजह से ही सही, पर अब देश की जनता शायद उस तकलीफ को महसूस कर सकेगी, जो जम्मू-कश्मीर की जनता ने महीनों भुगती है। बहरहाल, कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए अब ट्रेनों, मेट्रो, लोकल और इंटरसिटी ट्रेनों को भी 31 मार्च तक रोका गया है।

लोग जितना कम घरों से निकलेंगे या आवाजाही जितनी रुकेगी, उतना ज्यादा कोरोना को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिन इसके साथ यह देखना भी जरूरी है कि बंद के इन दिनों में रोजाना खाने-कमाने वालों का जीवन कैसे चलेगा, छोटे व मझोले कारोबारियों को इस वक्त अपने व्यापार में जो नुकसान उठाना पड़ रहा है, उससे वे कैसे पार पाएंगे। सरकार को इनके लिए कर्ज अदायगी की छूट, नकद मदद जैसे राहत पैकेज का ऐलान जल्द से जल्द करना चाहिए। इसके अलावा कोरोना से निपटने के लिए अब जरूरी है कि अधिक से अधिक लोगों का परीक्षण कराया जाए।

130 करोड़ की आबादी में महज कुछ हजार लोगों के परीक्षण से बीमारी को फैलने की आशंका बनी रहेगी। सरकार ने निजी लैब्स को परीक्षण के लिए अधिकतम 45सौ रुपए लेने की सिफारिश की है। लेकिन कोरोना जैसे अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए बेहतर होता कि सरकार आर्थिक हैसियत के मुताबिक परीक्षण की दरें तय करती और कमजोर तबके के लिए परीक्षण पूरी तरह मुफ्त होता। हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश में कहा गया कि दिशा निर्देश का उल्लंघन करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह भी कहा गया है, कि आईसीएमआर राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के इस घड़ी में मुफ्त या रियायती परीक्षण को प्रोत्साहित करता है।

लेकिन सरकार के इस प्रोत्साहन को निजी लैब्स कितना अपनाते हैं, ये देखना होगा। गरीब आदमी के लिए साधारण दवाएं खरीदने के पैसे भी अमूमन नहीं होते हैं, ऐसे में साढ़े चार हजार रुपए का टेस्ट कराने की जगह अगर उसने बीमारी का कष्ट सहना बेहतर समझा, तो न केवल उसकी बल्कि उसके आसपास के लोगों की जिंदगी भी दांव पर लग जाएगी। मोदीजी को इन व्यवहारिक समस्याओं पर गौर फरमाना चाहिए।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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