जुल्म जब हद से बढ़ जाता है वह बगावत को जन्म देता है, दिल्ली में हुई माहवारी-दावत..

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-सुनील कुमार
जब समाज के किसी तबके पर नाजायज हमला होता है, तो उससे बेइंसाफी के खिलाफ लोगों के खड़े होने की एक संभावना भी खड़ी होती है। अगर गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जा रहे एक महिला कॉलेज की लड़कियों के साथ माहवारी को लेकर बदसलूकी न हुई होती, इस सम्प्रदाय के कॉलेज-इंचार्ज स्वामी ने अगर यह बयान नहीं दिया होता कि माहवारी में खाना पकाने वाली महिला अगले जन्म में कुतिया बनती है, तो माहवारी एक मुद्दा नहीं बनती। लेकिन हफ्ते भर के भीतर यह ऐसा मुद्दा बनी कि दिल्ली में कल एक महिला संगठन ने एक सार्वजनिक आयोजन किया, और उसमें दर्जनों ऐसी महिलाओं ने खाना बनाया जो कि माहवारी से गुजर रही हैं, और तीन सौ से अधिक लोग वहां खाने पहुंचे, जिनमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी थे। इस मौके की तस्वीरें अब चारों तरफ फैल रही हैं जिनमें महिलाएं अपने एप्रन पर यह लिखा हुआ दिखा रही हैं कि वे माहवारी से हैं, और वे खाना बनाते दिख रही हैं। इस आयोजन को माहवारी-दावत नाम दिया गया है, और इसके बैनर-पोस्टर, इसके न्यौते की सूचना चारों तरफ फैल रहे हैं।

सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ सामाजिक जागरूकता वाले कलाकारों ने भी इस बारे में कलाकृतियां बनाई हैं जो कि महिला अधिकारों को लेकर एक नई जागरूकता सामने रख रही है, और पिछले बरसों में समाज में भारी मेहनत से फैलाई गई अवैज्ञानिकता पर हमला भी कर रही हैं। एक पाखंडी स्वामी ने अपनी बकवास से महिलाओं के, और महज महिलाओं के ही क्यों, प्राणियों के एक वैज्ञानिक मुद्दे की तरफ देश का ध्यान खींचा है, और इस पाखंड को ध्वस्त करने के लिए लोग उठ खड़े हुए हैं, चाहे झंडे-डंडे लेकर न सही, महज सोशल मीडिया पर। लेकिन आज कई किस्म की जंग सोशल मीडिया पर ही शुरू होकर वहीं खत्म हो रही है, और यह अच्छा ही हुआ कि एक ओछा हमला हुआ, एक गंदी बात कही गई, और न सिर्फ महिलाएं अपने हक के लिए उठ खड़ी हुई, बल्कि आदमियों ने भी खुलकर उनका साथ दिया।

दरअसल धर्म शुरू से ही मर्दों के कब्जे में रहा है, उनका गुलाम रहा है, और मर्दानी सोच जगह-जगह बेइंसाफी करती है जिसका एक बड़ा शिकार महिलाएं रहती हैं। अभी जब स्वामीनारायण सम्प्रदाय के इस घटिया स्वामी ने ऐसी गंदी बकवास की, तो लोगों ने धर्म की मर्दानी सोच के कुछ और पहलुओं को भी उठाया, और लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया। अगर महिला इतनी ही अछूत है कि देश के कुछ मंदिरों में, और साथ-साथ दूसरे धर्मों की मस्जिदों-दरगाहों जैसी जगहों पर भी, महिलाओं का दाखिला सुप्रीम कोर्ट भी नहीं करा पा रहा है, तो उसके पीछे की कई वजहों में से एक यह वजह भी समझने की जरूरत है कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की जगह नहीं के बराबर है, फौज में महिलाओं को मोर्चे पर लीडरशिप देने से फौज और केन्द्र सरकार कतराती आ रही हैं। ऐसे माहौल में कुतिया बनने का श्राप जब छपा, तो लोगों ने यह सवाल उठाया कि हिन्दू देवी मंदिरों में देवियों के कपड़े बदलने का काम पुरूष पुजारी ही क्यों करते हैं? इस काम के लिए महिला पुजारी क्यों नहीं रखी जाती? और हिन्दू मंदिरों की ही बात अगर करें, तो उनमें महिला की जगह इतिहास में महज देवदासियों की रही है जो कि वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करने वाली महिलाएं थीं, और आज भी कुछ हद तक हैं।

जब समाज में ओछे हमले होते हैं, तो एक सीमा तक ही वे किसी को घायल कर पाते हैं, उसके बाद वे एक बगावत को जन्म देते हैं, और वह बगावत उन हमलों के तमाम हथियारों को मोड़कर रख देती है। आज देश में वैसा ही कुछ हो रहा है। महिलाएं देश के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन करते बैठी हैं, और वे महिलाएं यह कर रही हैं जिनके घर से बाहर निकलने पर भी देश में सत्तारूढ़ कुछ बड़े ओहदे वाले आपत्ति कर रहे हैं कि मानो वे घरेलू सामान की तरह ही ठीक थीं, वे कैसे बाहर निकल आईं। ज्यादती करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वे लोगों के बर्दाश्त का इम्तिहान भी लेते चलते हैं, और किसी भी दिन वह बर्दाश्त जवाब दे सकता है। कहावत और मुहावरों में कई बार समझदारी की बातें भी रहती हैं, और ऐसे ही किसी संदर्भ में किसी ने यह लिखा होगा कि डोर को इतना न खींचो कि वह टूट ही जाए। माहवारी के मुद्दे पर यह डोर अब टूट चुकी है, ठीक उसी तरह जिस तरह की हरिजन कहे जाने वाले दलितों के मंदिर प्रवेश पर डोर एक वक्त टूट चुकी थी, और हिन्दू समाज के शुद्र कहे जाने वाले उन अछूत हरिजन-दलितों ने हिन्दू मंदिरों को खारिज करके बौद्ध धर्म में दाखिला लिया, और बुद्ध-अंबेडकर के अपने मंदिर बना लिए। आज जो लोग महिलाओं पर बिना किसी जरूरत के ऐसे हिंसक और अश्लील हमले करके उन्हें कोंच रहे हैं, वे अब एक बगावत भी झेलेंगे। और बात निकलेगी तो इतने दूर तलक जाएगी कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी महिलाओं पर अपनी नजर भी पडऩे की सीमा से उनको दूर क्यों रखते हैं? क्या वे एक महिला की कोख से नहीं जन्में हैं? और एक सम्प्रदाय अगर महिलाओं को इतनी हिकारत का सामान मानता है, तो उस सम्प्रदाय के लिए तमाम धर्मों के तमाम लोगों के मन में उससे बड़ी हिकारत क्यों नहीं होनी चाहिए?

दिल्ली में जिस महिला संगठन ने यह आयोजन किया है, उसने जागरूकता का एक साहसी काम किया है, और जिस तरह देश भर में शाहीन बाग के मॉडल की नकल हो रही है, जिस तरह देश भर में बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, उसी तरह देश भर में मर्दानी सोच के खिलाफ ऐसे आंदोलन होने चाहिए, और पुरूषों को भी महिलाओं का हौसला बढ़ाना चाहिए कि वे पाखंड में डूबे हुए समाज को झकझोरने का काम करें, और वे उनके साथ हैं, वे उनके पीछे हैं।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 24 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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