देश के आजाद होते ही पनपा मीडिया माफिया यानी बनिया मालिक – ब्राह्मण संपादक गठजोड़

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-राजीव मित्तल।।

दूसरे विश्वयुद्ध को खत्म हुए कुछ ही साल हुए थे.. यह विश्वयुद्ध भले ही दुनिया के लिये तबाही लेकर आया हो, लेकिन वरदान साबित हुआ बनियों के लिये, या उन्हीं की तरह पैसे से पैसा बनाने वालों के लिये, जिनकी आटे की चक्की या फुटपाथिया कपड़े की दुकान देखते ही देखते औद्योगिक साम्राज्य में बदल गयी..( और वैसे तो बुद्ध के समय से ही भारतवर्ष की केंद्रीय सत्ता किसी भी देशी – विदेशी के हाथ में रही हो, बनिया – ब्राह्मण प्रजाति पर कभी कोई आंच नहीं आयी..)

बीसवीं सदी के इस धनपति वैश्य समाज ने परम्पराओं का निर्वाह करते हुए किसी तिलकधारी पंडित से साइत निकलवा कर अपने पूर्वजों के नाम पर मंदिर बनवाए, धर्मशालाएं बनवायीं, स्कूल-कॉलेज खोले.. धंधे को चोखा करने को अखबार भी शुरू कर दिये..गुलामी के दौर में दो-चार बैंक बैलेंसियों ने अंग्रेजों तक अपनी बात पहुंचाने को अंग्रेजी के अखबारों के बोर्ड तो पहले से ही मार्केट में टांग दिये थे, आजादी का सदुपयोग करने को हिंदी को लेकर उनमें भी उथल-पथल शुरू हो गयी..

हिंदी बेल्ट वाले राज्यों में घी-तेल-नून-लकड़ी बेचने वाला कोई दिमागी बनिया या तो अपने भाई-बंधुओं या समान विचारों वाले दो दोस्तों के साथ यह ऐतिहासिक कार्य कर रहा था..रात-रात भर ट्रेडिल पर भुजाएं तोड़ कर, लीड वाले अक्षरों में आंखें फोड़ कर, सुबह कोई साइकिल पर, कोई तांगे पर तो कोई ठेले पर अखबार बेच रहा था..चूंकि आजाद देश की सत्ता लोकतांत्रिक थी, जिसके चलते #जनप्रतिनिधि, #जनसेवक और इसी तरह #जन से अन्य शब्द मिलाकर बनीं कई प्रजातियां देश की हरितिमा में चार चांद लगाने में जुट चुकी थीं..

चूंकि इस आजाद लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र को सबल बनाने को चुनाव का युग यानी लोकम्पियाड अब शुरू होने को था, जिसमें खेल बहुत सारे थे.. पहला लोकम्पियाड नजदीक आ गया था..चार-छह राष्ट्रीय टीमें, 30-40 लोकल टीमें उसमें हिस्सा ले रही थीं..इधर, मुख्यधारा में छप रहे अंग्रेजी अखबारों के कई मालिक भी अब हिंदी में भी खुल कर उतर आए थे..उनके तम्बू-कनात पहले से ही विराजमान थे..

आजादी की लड़ाई के दौरान खादी और गांधी टोपी ने पूंजीपतियों के इस वर्ग को वंदेमातरम कहना सिखा दिया था और अक्सर रघुपति राघव राजा राम की धुन उन्हीं के यहां सुनायी पड़ती थी, तो उनकी नींदों और उनके ख्वाबों में गहाराई और संभावनाओं का असीम सागर लहरा रहा था.. कमोबेश यही हाल मीडिया (आधा-अधूरा..क्योंकि तब इलेक्ट्रॉनिक के नाम पर रेडियो था, जिसमें सिलोन शब्द मीठी-मीठी उत्तेजना जगाता) क्षत्रपों का था, जो जल्द ही माफियागिरी में लिप्त होने वाला था..

इधर #जनप्रतिनिधियों का सांस्कृतिक पुनरोद्धार शुरू हो चुका था और इस पुनरोद्धार कार्यक्रम में हिंदी मीडिया बहुत सहायक साबित हुआ..खास कर प्रदेश स्तर पर.. लोकम्पियाड शुरू होने तक वे रिक्शे-तांगे वाले बग्घी और कारों में बेठने की अदा सीख चुके थे..

#जनप्रतिनिधि बन नेताई झाड़ने की शुरुआत 1936 में प्रांतीय चुनावों में हो चुकी थी लेकिन चोला पूरी तरह बदला 1952 के आम चुनावों ने..और #जनप्रतिनिधि नेता बन गया और #जनसेवक अफसर..लेकिन खेला अभी दाल में नमक के बराबर था.. अखबारी क्षत्रप भी डैने फैलाने लगे थे.. पैसा और रसूख दोनों हाथों में थे, तो अब हनक की इच्छा भी जोर मारने लगी..नेता जी को बुला कर नवजात की नाल कटवाने का फैशन चलन में आ चुका था..उस चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन मीडिया क्षत्रपों को लोकल स्तर पर पार्टी में गुटबाजी परोसी हुई मिल गयी..कुल मिला कर अगले तीन लोकम्पियाड कांग्रेस ने अपनी जड़ों में मट्ठा चुआते हुए जीते.. 1977 आते-आते मट्ठे की रासायनिक क्रिया का चक्र शुरू हुआ और छठे लोकम्पियाड में सत्ता बदली और पत्रकारिता में भगवा रंग लहलहाने लगा..जनसंघ ने जनता पार्टी में शामिल होने को छद्मवेष धारण किया और महत्वपूर्ण काम सूचना जनसंपर्क विभाग हथियाने का किया और सुबह की शाखा के बाद स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता पत्रकारिता कर्म में लिप्त हो गए..इसी के साथ चोला बदलने में माहिर बनिया सेठ – ब्राह्मण संपादक गठजोड़ ने भी भगवा में ढलने की शुरुआत कर दी..

#जारी-

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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