साबरमती का संत हो गया हलाल..

Page Visited: 362
0 0
Read Time:9 Minute, 45 Second

-संतोष कुमार झा।।

समाजवादी मित्र रमाशंकर सिंह की चिंता में डालने वाली टिप्पणी है ‘‘लग ही रहा था कि साबरमती आश्रम हथियाते ही जल्दी ही ऐसा कुछ किया जाएगा कि गांधी की रूह वहां से अधिकतम दूरी पर चली जाए। वही हुआ। पुलिस प्रशासन, सरकार के सरंक्षण में बापू के आश्रम में वही हुआ जो अनर्थकारी था। गांधी की सिद्धांतनीति के शरीर में तीन गोलियां फिर से दाग दी गईं। गांधी आश्रम में रैली में नारा लगा ‘‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को।‘‘ नागरिकता कानून के समर्थन में आश्रम परिसर और उसके आसपास यह रैली हुई। मुख्यमंत्री समेत भाजपा व उनके वर्गसंगठनों के लोग शामिल हुए। इसके कुछ दिन पहले वहां आश्रम के अंदर मोदी व शाह के बड़े बड़े पोस्टर लगाकर गांधीजी को चिढ़ाया गया।

आश्रम पर कब्जा कर लिया है। बड़ा दोष कथित गांधीवादियों का है जो मात्र खादी पहनना, शहद चाटना, शरीर पर मिट्टी थोपने को ही गांधीविचार मानते और रीढ़विहीन व्यक्ति थे। सभी दृष्टियों ने सहर्ष (? ?) मोदीजी को समूचा आश्रम सौंपकर प्रस्ताव कर दिया। अब वहां गगनचुंबी, वातानुकूलित पर्यटकप्रेमी विश्व केंद्र बनाकर पुख्ता कर दें कि इसका गांधी से कोई लेना देना नहीं है। मठी गांधीवादियों की रोज़ पोल खुलती ही रहती है। आपातकाल में ये, खादीधारी नंगे हो गए थे और अधिकांश उसे ‘अनुशासन पर्व‘ कहने लग गए थे। आज गांधी होते तो वर्तमान निज़ाम उन्हें पीओके में दरबदी कर चुका होता। या वे स्वयं ही कहीं कमज्ञात स्थानों पर बच्चों को मानवता के साथ साथ सत्याग्रह सिखा रहे होते!‘

इसी आश्रम में गांधी ने कुष्ठ रोगियों का मल अपने हाथों से उठाया। मना करने पर बड़ी बहन और पत्नी को आश्रम से बेदखल किया। मर्दानगी इक्कीसवीं सदी के गुजरात में परवान चढ़ी तो है। कल तक राखी बंधवाई, वह औरत भोग्या नज़र आने लगी थी। पड़ोसी के बच्चे आंखों का ध्रुवतारा थे। उल्कापात की तरह रिश्तों के अंतरिक्ष में गिराए गए। सरकार ढीठ हंसी हंसती रही। निर्दोष गलियों कूचों में गायों, बकरों की तरह आर्तनाद करते दौड़ते रहे। कसाई हाथों में गंडासा लिए रावण, कंस, जिन्ना जाने किनके किनके वंशज ढूंढ़ते रहे। संविधान की आयतें बोलती रहीं कि देश जल रहा है।

पहली बार हुआ था कि एक मुख्यमंत्री की कुर्सी के सामने गांधी का आसन हिलाया गया था। साबरमती आश्रम में युवा भाजपाइयों की वहशी भीड़ कह रही थी, ‘मेधा पाटकर को हमारे हवाले करो।‘ आयोजक कहती रहीं ‘मेधा बिना बुलाए क्यों आ गईं?‘ पत्रकारों के सिर, कमर, कैमरे, हाथपांव पुलिस अधिकारी खुद तोड़ते बताए गए। पत्थर जैसा चेहरा लिए मुख्यमंत्री शांति बहाली का दावा करते रहे। मोदी भारत के पहले प्रधान हैं जिनके चेहरे पर नवरसों में रौद्र और क्रोध रस चढ़ते हैं। अंगरेजी हुकूमत तक ने गांधी के आश्रम में श्रद्धा और खौफ के कारण अन्दर आने की हिमाकत नहीं की। मोदी प्रशासन के लिए वह गरीब की लुगाई बना दी गई। संघ परिवार का आतंक कि राजद के घटक दल गांधी की रक्षा के लिए सामने नहीं आ पाएंगे। उनकी भी आंखें हिन्दू वोटों पर हैं या गांधीजनित मूल्यों पर? गांधी के अनुयायी सरकार के स्वस्तिवाचन के पुरोहित बने घूम रहे हैं। कांग्रेसी भी कहां गांधीवादी तरीकों से विरोध कर रहे हैं।

भाजपा ने संविधान, संस्कृति और राजनय का घालमेल कर दिया है। भूकम्प, सीमा पार से आतंकवाद, सूखा वगैरह आपदाओं से जूझते गुजरात को धार्मिक उन्माद घुट्टी में पिलाया जाता रहा। गांधी के साथ बारदोली सत्याग्रह के हीरो वल्लभभाई पटेल ने आधुनिक गुजरात के आदर्श गढ़े। उसी गुजरात में उपेक्षित वल्लभभाई पीठ भी है। मोरारजी भाई जैसे रहे, गांधीविचारों के अनन्य समर्थक थे। गुजरात सरकार खुद हिंसा विश्वविद्यालय हो जाती है। पाठ्यक्रम दिल्ली में वे रच रहे हैं जिनके पाठ्यक्रमों को उच्चतम न्यायालय रद्द करता रहा है। षड्यंत्री आत्मा के लोहारखाने में बैठकर औजार गढ़े जाते हैं। गुजरात में भी उनकी सेल लगती रहती है। उनका और गांधी दोनों का इतिहास में रिहर्सल होता है। व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के विद्यार्थी तो पादरियों, मौलवियों, अम्बेडकरवादियों और पुरानी इमारतों पर हाथ साफ करते रहते हैं। संघ परिवार का संविधान में कैसे विश्वास होगा जिसका खुद का संविधान नहीं है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, अनुसूचित जाति जनजाति आयुक्त जैसी संवैधानिक संस्थाएं तथ्यपरक रिपोर्टें प्रस्तुत करती रहें। सरकार उनमें विश्वास ही नहीं करते। ध्रुवीकरण का गुजरात-प्रयोग हाथ से निकल नहीं जाए, इसकी चिन्ता दक्षिणपंथियों को रहती है। पांच सौ बरस से शेक्सपियर का घर जस का तस रखा है। सैकड़ों महापुरुषों के स्मारक इसी तरह हैं। स्वैच्छिक सादगी, स्वैच्छिक किफायतसारी, स्वैच्छिक धीमी गति का मसीहा अमेरिकी नस्ल का माॅडल बनाया जाएगा?

गांधी मोहनदास थे। कृष्ण भागकर गुजरात गए थे। नाम वहां रणछोड़दास पड़ा। गुजरात में लाखों रणछोड़दास होंगे लेकिन महाभारत के योद्धा नहीं। मोदी सेना में कई हैं। महान वह नहीं बनता जो दूसरों की जान जोखिम में डालकर हिन्दू मुस्लिम इत्तहाद की बोटी बोटी काट डाले। देश कश्मीर-कथा का संस्करण हो रहा है! कश्मीरी पंडित, घुसपैठिए मुसलमान-जैसी खानाबदोश संज्ञाएं भारत में हैं! जो आज़ादी के इतिहास में छाती पर अंगरेजों की गोलियां खाने में दुबकते रहे। लाचार, नामालूम इन्सानों की पीठ और गर्दन में छुरे घोंपने आगे आते रहे। गुजरात के स्कूली बच्चे ‘मुंह में राम, बगल में छुरी‘ वाला मुहावरा कभी गलत नहीं लिखेंगे।

गुजराती अमूमन शाकाहारी और मद्यनिषेधी होता है। हर एक को भाई और बहन कहता है। घर के रखरखाव में साफ सुथरा होता है। पाई पाई खर्च करने में मितव्ययी होता है। कलात्मक होता है। धार्मिक होता है। हिंसा उसकी अरुचि होती है। संघ परिवार ने फसल चक्र परिवर्तन की तरह गुजरातियों के चरित्र-परिवर्तन का कोई महायज्ञ शुरू कर दिया है? सफलता के लिए क्या नरबलियां ज़रूरी हैं? हिंसा के अश्वमेध का घोड़ा गुजरात में छोड़ा गया। राजधानी का नाम गांधीनगर रखा। कलकत्ता, बम्बई और मद्रास के नाम जातीय अस्मिता के नाम पर बदले गए हैं तो गुजरात की राजधानी गांधीनगर कैसे है? वह आडवाणीनगर, अमितनगर, नरेन्द्रनगर कुछ भी हो जाए। आत्मा के युद्ध का गांधी शेर था। बकरी की करुणा के लिए उसका दूध पीता रहा। जो अंगरेजों के सामने भीगी बिल्ली बने रहे। वे गांधी विचार से कहते हैं बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! शेर और बकरी एक घाट पानी पीएं, वही लोकतंत्र आदर्श कहलाता है। कायरों के वंशज जनता को बलि का बकरा बनाए पड़े हैं। हिम्मत इतनी बढ़ी कि साबरमती आश्रम में गांधी की गर्दन पर छुरा रखकर उसे ही हलाल कर दिया। इतिहास की गुमनाम बांबियों में दफ्न हो जाने वाले रात के अंधेरे में अपनी ही पार्टी के अल्पसंख्यक गुर्गों से पूछते हैं ‘‘भाईजान! गांधी के लिए झटका और हलाल में क्या बेहतर होगा?

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram