अंकित के हत्‍यारे पकड़े गए, अगला सवाल?

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अभिषेक श्रीवास्तव॥

अंकित सक्‍सेना की ख़बर शाम को मिली। घर लौटकर देखा तो मसला सोशल मीडिया पर गरमाया पड़ा था। हिंदूमना लोग इस लड़के को ऐसे क्‍लेम कर रहे हैं जैसे बिछड़े हुए भाई हों। इस मौत पर हो रही हिंदूवादी राजनीति से ख़फ़ा लोग मृतक से अतिरिक्‍त प्रेम दिखा रहे हैं, जैसे यही मौका हो खुद को पॉलिटिकली करेक्‍ट साबित कर देने का। एक मौत के 24 घंटे के भीतर समाज में दो पाले खिंच गए हैं। क्‍या मज़ाक है! क्‍या इससे पहले प्रेम करने वालों की जान नहीं गई है? प्रेमी युगलों को नहीं मारा गया? मनोज-बबली याद आते हैं। ”लव, सेक्‍स एंड धोखा” की बर्बर ऑनर किलिंग याद आती है। अपने इर्द-गिर्द के कई केस याद आते हैं। फिर तेरह साल पहले अपने ही दिन याद आ जाते हैं। कैसी दहशत थी मन में।

एक कहानी सुनाता हूं। सन् सत्‍तर में हुए एक अंतर्जातीय प्रेम विवाह से सन् अस्‍सी में पैदा एक लड़के ने सन् 2000 में अंतर्जातीय प्रेम कर लिया। उसके मां-बाप को यह नाग़वार गुज़रा। किसी तरह मामला सुलझा। लड़के की बहन ने सन् 2005 में अंतर्जातीय प्रेम कर लिया। अबकी यह लड़के को नाग़वार गुज़रा। उसने जी-जान लगा दिया कि शादी न होने पाए। बड़ी मुश्किल से मामला सुलझा। अब उस परिवार की तीसरी पीढ़ी की एक युवती प्रेम में है। पिछली पीढि़यां मिलकर उसे रोकने में लगी हैं गोकि सभी ने प्रेम विवाह ही किया था। मामला कुल मिला कर यह है कि हमारे समाज में प्रेम की तो पर्याप्‍त अधिकता है लेकिन उसे पनपने और अंजाम तक पहुंचने देने वाले लोकतंत्र की घोर कमी। जब हम कहते हैं कि समाज में असहिष्‍णुता बढ़ रही है, तो इसका मतलब इतना सा है कि हर पीढ़ी के साथ दूसरे के प्रेम को बरदाश्‍त करने की क्षमता कम होती जाती है। तिस पर जाति, धर्म, गोत्र के बंधन तो बने ही हुए हैं जो बहाने का काम करते हैं।

ऐसे मामलों में कभी लड़के को मार दिया जाता है, कभी लड़की को और कभी प्रेमी युगल को। इसमें हिंदू मुस्लिम का सवाल ही नहीं पैदा होता। सब रात में टीवी देखते हैं। सरकार सबको बराबर डराती है। हिंदुओं को मुसलमानों से डराया जाता है। मुसलमानों को हिंदुओं से। दलितों को ब्राह्मण से डराया जाता है। ब्राह्मणों को ठाकुरों से। ठाकुरों को भूमिहारों से। भूमिहारों को यादवों से। यादवों को दलितों से। दलितों को पिछड़ों से। शिया को सुन्‍नी से। सुन्‍नी को शिया से। सब एक-दूसरे से डराए जा रहे हैं। सब एक-दूसरे से डरे हुए हैं। डरा हुआ इंसान प्रेम कैसे सहेगा? जो अब तक नहीं डरा, वह प्रेम कर लेता है। फिर अंकित मारा जाता है। उसकी प्रेमिका का साहस देखिए। सबको अंदर करवा दिया। वह निडर है। उसके मन में प्रेम है। प्रेम उसे निर्भय बनाता है।

अंकित की मौत पर बस एक सवाल बनता है, अलग-अलग शक्‍लों में। कौन है जो हमे डरा रहा है? हमें प्रेम करने से कौन रोक रहा है? हर 14 फरवरी को किसने इश्‍क़ पर पहरेदारी का टेंडर भरा है? लव जैसे खूबसूरत शब्‍द में कौन है जो जिहाद जैसा शब्‍द जोड़े दे रहा है? कौन नहीं चाहता कि लोग प्‍यार से रहें? कौन है जिसे मरने वाले के धर्म से मतलब नहीं जब तक उसकी रोटी सिंकती रहे? प्रेम में अंकित मरता है, हिंसा में चंदन- कौन है जो दोनों की लाश को देखने सबसे पहले इनके घर पहुंचता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे सबसे पहले इनके घर यही सुनिश्चित करने पहुंचते हों कि बंदा ठीक से मरा या नहीं? जिस देश में निर्णयकर्ता को पंच-परमेश्‍वर का दरजा दिया गया है, वहां उसे मारकर कौन उसकी लाश को बाकायदा घर तक छुड़वाता है? कौन है जो फि़ल्‍मी इश्‍क़ से भी सियासी फ़सल काटने की ख्‍वाहिश रखता है? कौन है जो दूसरों के कमरे में झांकने का शौकीन है? कौन है जो दूसरों का पीछा करवाता है? कौन है जो हमें इतना डरा चुका है कि हमें खुद के किए पर शक़ होने लगा है? किसने इस प्राचीन समाज में सहज भरोसे का ताना-बाना तोड़ा? इन सब सवालों के जवाब एक हैं। जवाब खोजिए। इसी में चंदन से लेकर अंकित तक के हत्‍यारों का सुराग़ है।

दूसरा सवाल यह है कि इस हत्‍यारे को शह कौन दे रहा है। पता करने का तरीका आसान है। अगर आज आप वाकई अंकित की मौत पर आंसू बहा रहे हैं, तो ईमानदारी से याद करिए कि क्‍या कभी आपने 14 फरवरी को किसी का मुंह रंगे जाने, बाल काटे जाने, पीटे जाने, पार्क से खदेड़े जाने पर मज़ा लिया है। इसका जवाब बता देगा कि आपका अपना हाथ कहां है- हत्‍यारे की पीठ पर या उसके खिलाफ हवा में उठा हुआ।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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